मोछू नेटुआ / संतोष कुमार चतुर्वेदी
हरखम दरखम गोने नाझा मारे फू
परेछेत केलस कोता जेनेमेजा घाते छू
अलकम बलकम बिल कतेरा नारे कू
मेरेस नाते घोर कराते छाड़े छू
अबूझ भाषा के इस
सांप पकड़ने वाले मऩ्त्र को बुदबुदाने के बाद
एक रसम जैसे वह किरिया खाता था
माई किरिया, बाप किरिया, बेटा किरिया
बेटी किरिया, दामाद किरिया
गाँव किरिया, सीवान किरिया
डीह किरिया, डिहवार किरिया...
और तब एक सधे अन्दाज में डण्डा नचाते
घुस जाता वह घर में सांप पकड़ने
सांप से बाहर निकलने की गुहार करते हुए
मान-मनुहार करते हुए
कि निकलि आओ जहां भी छुपे बैठे हो वहां से
निकलि आओ कोने से अंतरे से
धरनि से, सरदर से, कोरो से, मलिकथम से
निकलि आओ पटनी से, डेहर से, दियरखा से
खपरा से, नरिया से
बिल से, बिलवार से
निकलि आओ जहां कहीं छुपे हुए हो
वहीं से जल्दी से जल्दी
भरे गलमुच्छों वाले मोछू नेटुआ के करतब के स्थापत्य को
हम आश्चर्य के शिल्प की तरह निहारते
कुछ ही देर में हम तब वाकई
अपने पास ही मोछू नेटुआ के डण्डा फटकारने
और सांप के फुंफकार की आवाज साथ-साथ सुनते
और तब मोछू के हथेलियों के कसाव में
अपने फन को और चौड़ा करने की नाकाम कोशिश करते
आंखें लाल-पीला करते विवश पडे सांप को पाते
जिसे ला कर रख देता वह सुरक्षित अपनी झॅपोली में
अपने वादे के मुताबिक जंगल में छोड़ने के लिए
उसी की जुबान से तमाम बातें
तभी जाने हमने साँपों के बारे में
मसलन यह कि गेहॅुवन का डॅंसा नहीं बच पाता कभी
कि अजगर तो लील लेता है हिरन तक को समूचा
कि नाग के जहर का कोई
तोड़ नहीं खोज पाया अभी तक आदमी
कि अपनी पर आ जाय तो
करैत भी कम खतरनाक नहीं होता
कि एक दोमॅुहा सांप भी होता है थुत्थुर
जो छह महीने एक तरफ से सांस लेता है
तो छह महीने दूसरी तरफ से
भारी भरकम विशेषणों से संवार कर
जितना बतलाता वह किसी सांप के बारे में
उतना ही डरावना नजर आता तब वह सांप हमें
डाक्यूमेन्ट्री फिल्मों से बाहर निकल कर
सरकारी दस्तावेजों से इतर
ठेठ अपनी जिन्दगी जीते हुए
गावों की गलियों की खाक छानते हुए
जोर-जोर से आवाज लगाता मोछू नेटुआ
कोवे जैसा महक रहा है मालिक इस घर में
कोवे की इस महक को सूंघ पाता केवल मोछू नेटुआ
जिसके बारे में वह इतराते हुए बतलाता
कि जिसे साध पाते हैं
कठिनाइयों को झेलने वाले
केवल कुछ लोग ही इस दुनिया में
वही सूंघ पाते हैं कोवे की इस गंध को
कोवे की इस तथाकथित महक से घबराये घर वाले
कुछ कदम आगे बढ़ गये
मोछू नेटुआ को फौरन बुलाते फरमाते
मोछू नेटुआ तब किसी ज्योतिषी के अन्दाज में बतलाता
बहुत खतरनाक है बड़ा जहरीला
बाबूजी जान की बाजी लगा कर निकालना पड़ेगा
सौ रुपये और एक धोती से कम न लूँगा
मोल तोल के बाद आखिर मामला फिर
बीस कम सौ पर पट जाता
मोछू नेटुआ तब फौरन अपने काम पर जुट जाता
अपने सिर पर पगड़ी बांधते
कान में जड़ी खोसते
डण्डा फटकारते... अबूझ सा मन्त्र पढ़ते
तमाम संबंधों की कसमें खाते
वह घुस जाता तब किसी एक कमरे में
और निकाल लाता सचमुच
अपने हाथों की पकड़ में सांप
अक्सर जो उसके मुताबिक
पुराना और बहुत जहरीला हुआ करता
तब सहज ही यकीन कर लिया करते थे लोग
मोछू नेटुआ की बातों और उसके इस करतब पर
घर के लोगों को पड़ती थी उस रात चैन की नींद
और ठीक उसी दिन
मोछू नेटुआ का घर भी जगमगाता
बहुत दिनों के बाद
उसका पूरा घर जी भर खाता-पीता-सोता
ठमक जाता ठिठक जाता अक्सर भीड़ देख कर वह
फिर घर की ओर जा कर बतलाता विशेषज्ञ मुद्रा में
भीड़ से बिदक कर
पास-पड़ोस में हवा खाने कहीं निकल गये नागराज
और इस तरह बढ़ जाता वह कन्नी काट कर आगे
किसी ऐसे घर की तलाश में
जहां कम से कम लोगों के बीच
अपना हुनर दिखा कर
कोई सांप पकड़ सके वह
वैसे कुछ जानकार लोग यह बतलाते
कि मोछू नेटुआ के कमाई-धमाई का जरिया है यह
और जहां तक सांप की बात है
खोसे रहता है उसे वह अपनी कमर
या धोती के पोछिटे में पहले से ही
कुछ लोग सांप पकड़ने के इस उपक्रम को
जांचने-परखने के लिए
घर के जंगलों-रोशनदानों से
ताक-झांक करने की तमाम कोशिशें करते
और फिर अपने अपने अनुभव सुनाते बतलाते
फिर भी रहस्य का एक पर्दा तना रहता
पूरी खामोशी के साथ अपनी जगह
जस का तस
कुछ लोगों का यह भी कहना था
कि सांप के बहाने घरों में घुस कर
सामानों की थाह लेता फिरता है मोछू
और फिर रात-बिरात
अपने साथियों समेत सेंध मार कर
चुरा ले जाता है सारा मालो-असबाब
एक बार जब हमने पूछा मोछू से
उसके गाम-धाम के बारे में
तब उसने बताया कि हम खानाबदोश हैं बाबूजी
पीढ़ियों से हमारे पास नहीं कोई घर
नहीं एक भी धुर जगह जमीन कहीं कोई
जहां रूक गये वहीं बसेरा
जब जग गये तभी सबेरा
हमीं हैं असली रमता जोगी बहता पानी
कभी हमारे देश् को गुलाम बनाने वाल फिरंगियों ने
हम जैसी तमाम घुमन्तू जातियों को
घोषित कर दिया था अपराधी
और तब से यह लेबेल अपने चेहरे पर लगाये
मरते हुए जीने की कोशिशों में
लगातार लगे हुए हैं हम
एक समय तो आलम यह था कि
चाहें जहां चोरी-डकैती पड़े जिला-जवार में
हम ही पकड़ लिये जाते पूरे कुनबे समेत
तब पिछउॅड़ चढा कर बांध दिया जाता था हमें खंभे में
और बेरहमी से तब तक इतना मारा पीटा जाता
जब तक बेसुध न हो जाते
बेहोश न पड़ जाते हम मार से
मालिक सही बताऊं आपको
मुझे तो लगता है कि
आज के समय में सबसे बड़ा अपराध है गरीबी
और तुलसी बाबा भी बहुत पहिलवे
केतना सही कह गये हैं मालिक
समरथ को नहीं दोष गोसाईं
और आज अपने जिस लोकतन्त्र पर
गर्व करते हम नहीं अघाते
उसी की पहरूआ अपनी यह सरकार भी
राई-रत्ती कम नहीं फिरंगियों से
बातचीत में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए
जब यह कहा मैने मोछू से
तो लगा कि जैसे
उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया हो मैने
तब बेसाख्ता बोल पड़ा वह
हाँ मालिक यह ससुरी सरकार तो
कभी हमें आतंकवादी बताती है
तो कभी घोषित कर देती है नक्सलवादी
पता नहीं कहाँ से
ढूढ लाती है एक से एक शब्द
अपनी भाषा में
हमें तो सूझी नहीं रहा कुछ
अब आपे बताइए मालिक
कि कैसे धोये हम
अपने माथे पर जबरिया लादा गया
बेमतलब का कलंक
दिक्कत की बात तो यह कि
कभी कोई समझ ही नहीं पाया हमें
अब देखिए न आपे हमारी नियति
कि पुराने जमाने का अछूत मैं
इस जमाने का अपराधी हो गया हूँ
होता रहा हमारे साथ
हमेशा बदतर सलूक
उठती रही बराबर मन में
एक अजीब सी हूक
छेड़ने के अन्दाज में
अपनी बात रखते हुए कहा मैने
हकीकत में अपराधी तो हैं
लाखों-करोड़
बिना किसी आवाज के घोट जाने वाले
हमारे नेता और अधिकारी
तमाम अपराधों के बावजूद बने रहते हैं
नेता और अधिकारी ही जो जीवनपर्यन्त
मेरा इतना कहना था कि
तिलमिलाते हुए बोल पड़ा मोछू नेटुआ
मुहँ देखी बात नहीं
आप बिल्कुल सांचे कह रहे हैं मालिक
कभी इनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं दिखायी पड़ता
लाज-शरम तो जैसे घोल कर पी गये हैं ये
दरअसल असली विषधर हैं ये समाज के
अमिट कलंक हैं ये हमारे आज के
जिन्हें बाहर नहीं निकाल पा रहा कोई तन्त्र-मन्त्र
इन मायावियों के सामने
सारे हरवा-हथियार पड़ते जा रहे हैं बेअसर
तन्त्र-मन्त्र पड़ते जा रहे हैं बांझ
और सरकार भी तो इन्हीं के पास गिरवी होती है
अब तो खोजना ही पड़ेगा हमीं लोगों को
इनसे निपटने के लिए
जमाने के मुताबिक कोई नया ब्रह्मास्त्र
एक बात बताये मालिक
अच्छा जाने दीजिए छोड़िए
यह कह कर अचानक
चुप्पी के समन्दर में डूब गया मोछू नेटुआ
मैंने फिर बहुत कुरेदा उसे
तब हमारे बीच पसरी हुई खामोशी को
चीरते हुए बोल पड़ा वह
दरअसल अपने समय की हॅसमुख दुनिया का ही
एक उदास चेहरा हैं हम
अपनी उदासी के लिए जैसे हमेशा से अभिशप्त
अब देखिए ना कि
तरह तरह की तरकीबों से
नहीं जुटा पा रहे हम आज भी
तमाम लोगों की ही तरह दूसरे टैम का भोजन
कपड़ा लत्ता भी मुश्किलें से चढ़ पाता है तन पर
हमारे बाल-बच्चे जान नहीं पाये कि
जीवन का कोई अनुभव होता है बचपन
अपनी फांकाकशी में भटकते-फिरते हम
सोच ही नहीं पाते कोई फितूर
और होते रहते हैं लगातार दर-बदर
घूमते फिरते हैं रोज इधर उधर
यही देख समझ कर आखिर एक दिन
अपना कांवर अपनी झॅंपोली फेक-फांक कर
भाग गये हमारे दोनो बेटुए
बाहर कहीं मेहनत मजूरी करने
बाबूजी अब तो दोनो हो गये एकदमे से बहरवांसू
मोछू नेटुआ फख्र से बतलाते
चलो अच्छे से गुजर-बसर तो हो जाती है न उनकी
ठीक ही तो किया उन दोनो ने
दर-दर भटकना तो नहीं पड़ेगा उन्हें हमारी तरह
दो जून की रोटी जुटाने के लिए
और हम बूढ़ा-बूढ़ी की जिनगी ही कितनी बची है
कट ही जायेगी जैसे-तैसे
फिर मोछू की आँखों में एक चमक दिखायी पड़ी
बोल उठा वह अपने पर गर्व करते हुए जैसे
तमाम तंगहाली के बावजूद भी
मालिक हमरा एक पक्का उसूल है
आज भी जिस सांप को पकड़ते हैं हम अपने हाथों
बुलाते-बझाते हैं जिन्हें पुचकार कर
अपने सगे-संबंधियों की किरिया खा-खा कर
उन्हें छोड़ आते हैं दूर जंगल में
अपने वादे के मुताबिक
कि मालिक एक जगह कहीं सुना हमने कि
खतम होते जा रहे हैं बड़ी तेजी से सांप भी
अब तो नहीं रहे वे सांप
ना ही रहे वो सॅपधरवे
प्रश्न की शक्ल में पूछे गये
जिओ-खाओ घूमो-फिरो आजाद हो कर
जंगल की इस दुनिया में नागराजा
किसी को डॅंसने-मारने से बहुत बेहतर है
जिनगी जीने का यह सलीका
उसकी बात को बीच में ही काटते हुए बोल पड़ा मैं
जानते हो अब तो
एक मशीन ईजाद हो गयी है सांप पकड़ने की
जो बड़ी आसानी से खोज लेती है
सांपों को दूरदराज से ही
हाँ मालिक हमने भी सुना है कहीं कि
साँपों को पकड़ कर
बड़ी बेरहमी से निकाल लिया जाता है उसका जहर
सुना है कि उस जहर से बनायी जाती हैं
एक से बढ़ कर एक महॅगी दवाइयां
फिर वे अपने कहर के जहर से मार डालते हैं सांप को
महज उसकी खाल के लिए
सुना है जिससे तैयार होते हैं कारखानों में
महॅगे-महॅगे कोट
महॅगे-महॅगे बैग
बाजारों में बेचने के लिए
जैसे खूंटों से एक-एक कर गायब होते गये बैल
गायों से खाली होते गये दुआर
अपनी सख्त कवच के बावजूद
कछुए नहीं बचा पाये खुद को
और हमारे देखते-देखते गायब होते गये
दूर तक नजर रखने वाले गिद्ध
ठीक उसी तरीके से गायब होते जा रहे हैं सांप
दुनिया जहान से एक-एक कर
मेरी इस बात को पूरा करते हुए बोल पड़ा वह
देखिए ना अब तो हालत यह है कि
किसी गाँव घर से
एक अरसे से
नहीं हो रही कोई बुलाहट
और मेरी परेशानी है कि
बढ़ती ही जा रही है दिन-ब-दिन
और अब वे जंगल भी तो नहीं रहे अब
जिसमे बिना किसी डर भय के आजादी से
विचरते फिरते थे सांप अपने संगी साथियों के साथ
और जहां हम भी अपने वादे के मुताबिक
छोड़ आते थे पकड़े गये सांपोंप को
खांसते-खखारते
देह का ही अब अंग बन गये अपने दर्द से कराहते
बूढ़े हो चले मोछू नेटुआ
अब पूछते फिरते हैं एक ही सवाल
पागलपन की हद तक जा कर
गायब करते-करते सारे जीवों को वनस्पतियों को
क्या कायम रख पायेगा आदमी
धरती के अपने इस ठिकाने पर खुद को सही सलामत
कहीं से नहीं मिलता उसे कोई जवाब
कोई जहमत नहीं उठाता अब
इस मुददे पर कुछ भी सोचने की विचारने की
सब जगह दिखायी पड़ता है उसे
मरघट सा सन्नाटा
पीढ़ियों से धन्धा करते आये मोछू नेटुआ
चिन्तित है अब इस बात पर
कि बेअसर पड़ता जा रहा है सांप का जहर
और लगातार जहरीला हो़ता जा रहा है आदमी
मोछू खुद भी तस्दीक करते हैं इस बात की
कि सापों को तो आसानी से चीन्ह लेते थे हम
कि कौन गेहुवन है कौन करैत
लेकिन आदमी को आदमी की भीड़ से बीन कर
जहरीले तौर पर अलगा पाना
एकदमे से असंभव है मालिक
और सबसे दिक्कत तलब यह कि
अभी तक के सारे तन्त्र-मन्त्रों को धता बताता
कांइयां किस्म का आदमी ऊपर से कुछ और
अन्दर से कुछ और हुआ जा रहा है
अब मोछू किसका खाये किसका गाये
का ले के परदेस जाये
बदलती हुई परिस्थितियों में
उसकी समस्या अब यह है कि
लगातार जहरीली होती जा रही इस दुनिया में से
कुछ बेजहर लोगों को वह कैसे सामने लाये
कैसे इन्हें बचा कर सुरक्षित रखे छोड़े कहीं
किस तरह अपना वचन निभाये
कैसे वह अपनी चाहत का कुछ रंग जुटा कर
अपने समय की
एक सुखद तस्वीर बनाये।
लोकजीवन की स्मृतियों, सामाजिक विसंगतियों और मनुष्य की संवेदना के क्षरण को एक साथ समेटने वाली संतोष चतुर्वेदी की यह कविता हमारे समय के एक ऐसे उपेक्षित चरित्र का चित्रण करती है, जिसकी नियति में सदियों का विस्थापन, अभाव और अपमान दर्ज है। मोछू नेटुआ महज साँप पकड़ने वाला एक धूमंतु व्यक्ति नहीं है। वह उस लोकसभ्यता का साकार रूप है, जिसकी पारंपरिक ज्ञान-संपदा को आधुनिक सभ्यता ने धीरे-धीरे हाशिये पर धकेल दिया है। कविता की बड़ी विशेषता यह है कि एक मामूली दिखने वाला लोकचरित्र के जीवन-संघर्ष से आरंभ होकर इसकी संवेदना मनुष्य, समाज, सत्ता और समूची पृथ्वी के अस्तित्वगत संकट तक फैल जाती है।कविता का आरंभ एक अबूझ लोकमंत्र से होता है। मंत्र की ध्वनि-संरचना पाठक को तत्काल उस लोकविश्वास के रहस्यमय संसार में ले जातीहै, जहाँ मनुष्य की आजीविका जादू, कौतुक और विश्वास के मायाजाल में फँसा है। 'माई किरिया, बाप किरिया, बेटा किरिया' जैसी अभिव्यक्तियाँ लोकभाषा की सहजता के साथ उस सांस्कृतिक मनोविज्ञान को उद्घाटित करती हैं, जिसमें मनुष्य अपने कर्म की विश्वसनीयता पारिवारिक संबंधों की सौगंध से अर्जित करता है। मोछू का डंडा फटकारना, साँप को पुचकारना, उसकी गंध पहचानने का दावा करना और फिर उसे झँपोली में सुरक्षित रखना कविता के अंदर उस जादुई मिथकीय दृश्य को पैदा करता है जहाँ लोकजीवन अपनी पूरी देह, सुबास, ध्वनि और गति के साथ विद्यमान है।
मोछू के चरित्र की सबसे मार्मिक विशेषता उसका अंतर्विरोधों से भरा जीवन है। वह अपने हुनर से रोजी कमाता है, उसके करतब पर संदेह भी किया जाता है, किंतु उसकी निर्धनता और जीवित रहने की जद्दोजहद पाठक को उसके मानवीय धरातल तक ले जाती है। इस क्रम में कविता उस अन्याय को भी सामने लाती है, जिसके अंतर्गत घुमंतू समुदायों पर अंग्रेजी शासन ने अपराधी होने का कलंक मढ़ दिया था। स्वतंत्रता के बाद भी सामाजिक संदेह और प्रशासनिक उत्पीड़न से उनका पीछा छूटना कितना कठिन रहा है, मोछू की पीड़ा इसका मर्मस्पर्शी साक्ष्य है। उसका कथन—'पुराने जमाने का अछूत मैं / इस जमाने का अपराधी हो गया हूँ'—लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक असुविधाजनक प्रश्न है।
कविता का वैचारिक उत्कर्ष उस क्षण सामने आता है, जब मोछू वास्तविक साँपों और समाज में छिपे विषधरों के बीच अंतर स्थापित करता है। साँप का विष उसकी जैविक प्रकृति है, जबकि मनुष्य का विष उसकी सत्ता-लिप्सा, लोभ, छल और नैतिक पतन से उत्पन्न होता है। इसी अर्थ में कविता का साँप एक विराट सामाजिक रूपक बन जाता है। 'दरअसल असली विषधर हैं ये समाज के' जैसी पंक्ति लोकानुभव से अर्जित उस राजनीतिक चेतना को व्यक्त करती है, जो बड़े-बड़े वैचारिक प्रतिपादनों से अधिक प्रभावशाली हो उठती है।
इस कविता का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण आयाम उसकी पर्यावरणीय चेतना है। गायब होते साँप, गिद्ध, कछुए, उजड़ते जंगल और समाप्त होती पारंपरिक आजीविकाएँ एक ही विनाशकारी सभ्यतागत प्रक्रिया के अलग-अलग दृश्य हैं। मोछू की चिंता अपने रोजगार के समाप्त होने तक सीमित नहीं रहती। वह मनुष्य और प्रकृति के टूटते सहजीवी संबंधों की गवाह बन जाता है। यहाँ उसकी करुणा का विस्तार समूचे जीवजगत तक पहुँचता है।
कविता की भाषा में देशज शब्दों, लोकमुहावरों और बोलचाल की लय का अद्भुत सामर्थ्य है। वर्णन और संवाद के बीच विकसित इसका कथात्मक शिल्प इस कविता को गहराई प्रदान करता है।
अंतिम हिस्से में कुछ 'बेजहर लोगों' को बचाकर रखने की उसकी आकांक्षा मनुष्यता के भविष्य की सबसे सुंदर संभावना बनकर उभरती है। यही इस कविता की आधारतल है।
मोछू नेटुआ अंततः उस मनुष्य की आवाज है, जिसे सभ्यता ने बहुत कुछ सिखाने का दावा किया, किंतु जिसकी सहज करुणा, जीवदया और जीवनबोध से स्वयं बहुत कुछ सीखना अभी बाकी है। ऐसी कविताएँ हमारे समय की सामाजिक स्मृति और नैतिक विवेक को समृद्ध करती हैं।•
संतोष चतुर्वेदी : २–११–१९७१, बलिया (उत्तर–प्रदेश)
कवि – संपादक
पहली बार (कविता संग्रह २००९), भारतीय ज्ञानपीठ से
भारतीय संस्कृति (२०११), लोक भारती से प्रकाशित
अनहद का संपादन
असोसिएट प्रोफेसर (इतिहास)




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