(पाखी, दिसंबर 2025 अंक में प्रकाशित)
इसमें तो इसमें दो मत नहीं है कि प्रेमचंद हिन्दी कथा-साहित्य के शीर्षस्थ कथाकारों में से एक हैं, गो कि उनकी कहानियाँ और उपन्यास अक्सर समाज के उन कोनों-अंतरों को अपना केंद्रीय विषय बनाते हैं, जिन्हें मुख्यधारा का साहित्य अनदेखा करना चाहता है। गरीब किसान, मजदूर, स्त्री और दलित उनके रचना-जगत में प्रमुख पात्र हैं और उन्होंने सामंती समाज, जाति व्यवस्था और आर्थिक शोषण को बड़ी मार्मिकता से चित्रित किया है। यह मान्यता आम है कि प्रेमचंद ने हिन्दी कथा को यथार्थ की ओर मोड़ा; उन्होंने आख्यान को परियों की दुनिया और नैतिक नाटकों से निकालकर धरती के गाँव-खेतों की ओर लाया। यह विरासत इतनी सशक्त है कि उनके बिना हिन्दी कथा-उपन्यास का साहित्य मानो अधूरा लगता है। आलोचक और पाठक दोनों उन्हें संवेदना और नैतिकता के आदर्श के रूप में देखते हैं और कई पीढ़ियों ने उनकी रचनाओं को पाठ्यक्रम में पढ़ते हुए साहित्यिक चेतना की अपूर्व दशा प्राप्त की है।फिर भी किसी भी साहित्यकार की महानता को समझने के लिए केवल उसकी प्रशंसात्मक छवि ही पर्याप्त नहीं मानी जाती; आलोचनात्मक दृष्टि से भी परख आवश्यक होती है। प्रेमचंद की रचनाओं में एक ओर जहाँ सामाजिक यथार्थ का घनत्व अपने पूरे संवेगात्मक आलोड़न के साथ उपस्थित होता हैं, वहीं कुछ कहानियों में वह यथार्थ का ऐसा प्रतिदर्श रचते हैं कि तर्क और विवेक को आघात पहुँचती है। यथार्थ के ऐसे स्थूल रूप में कई बार करुणा का अतिरेक, कथा के संतुलन को बिगाड़ देता है; कहीं-कहीं उनकी अंतर्धाराएँ मनुष्य की नियति को इतना बहने देती हैं कि संघर्ष और प्रतिरोध का स्वर दब जाता है। इस लेख में हम “मंत्र” और पाँच अन्य कहानियों—“सौत”, “निर्मला”, “कफ़न”, “नशा” और “पूस की रात”—के उन पहलुओं पर विचार करेंगे, जहाँ प्रेमचंद का यथार्थ धुँधला, अतिरंजित और कभी-कभी यथार्थ के विलोम जान पड़ता है। हमारा उद्देश्य यह है कि इन कथाओं की वस्तुगत कमज़ोरियों को तार्किक रूप से पाठकों के सम्मुख रखा जाए ताकि प्रेमचंद के साहित्य की सम्पूर्णता को तत्कालीन समाज की व्यापकता और दृश्यता में वस्तुनिष्ठता के साथ गुनी जा सके।
कहानी ‘मंत्र’ दो भागों में घटित होती है। पहले भाग में एक बूढ़ा किसान अपने बच्चे को लेकर डॉक्टर चड्ढा के पास दौड़ता है। बच्चे की हालत गंभीर है; वह अपनी जान बचाने के लिए शहर के एक प्रतिष्ठित चिकित्सक के सामने घिघियाता है। डॉक्टर उस समय गोल्फ़ खेलने जा रहे हैं और बूढ़े की प्रार्थनाओं को बार-बार टाल देते हैं। बूढ़ा सारी सामाजिक दूरी मिटाकर उनके चरणों में अपना सिर रख देता है, लेकिन डॉक्टर उसे “कल सुबह आओ” कहकर बाहर निकाल देते हैं। गाँव से आये हुए उस गरीब की विनती पर डॉक्टर का निर्लज्ज रवैया आधुनिक उच्चवर्गीय संवेदनहीनता का प्रतीक है। कहानी में यह दृश्य पाठक को भीतर तक हिला देता है, क्योंकि बूढ़े की बेबसी और चिकित्सक की घोर उपेक्षा के बीच करुणा और तटस्थता का संघर्ष खुलकर सामने आता है।
इस दृश्य को पढ़ते समय यह स्पष्ट होता है कि प्रेमचंद मध्यवर्गीय सुविधाभोगी वृत्ति की आलोचना करना चाहते हैं। डॉक्टर चड्ढा का ‘कैरिकेचर’ इतना कठोर है कि उनके दायित्वहीन व्यवहार से पूरा शासक वर्ग बेनकाब होता है। परन्तु लेखक यहाँ भी घटनाओं को अतिरंजित करते हैं—डॉक्टर गोल्फ़ खेलने के लिए एक बच्चे की जान पर खेल जाते हैं और वह भी उस समाज में जहाँ डॉक्टरों की प्रतिष्ठा सेवा पर टिकी होती है। यह अतिरंजन प्रेमचंद के उद्देश्य से भटकाव पैदा करता है; पाठक डॉक्टर को एक व्यक्तिगत खलनायक के रूप में देखता है जबकि समस्या व्यवस्था की है। इस तरह कहानी का पहला भाग एक सीमित व्यक्ति-विरोध में बदल जाता है और यथार्थ का सामाजिक आयाम संकुचित हो जाता है।
दूसरे भाग में समय कई वर्ष आगे बढ़ जाता है। डॉक्टर चड्ढा अब वृद्ध हैं; उनके दो बच्चे हैं, जिनमें बेटा कैलाश उनका अभिमान है। एक उत्सव के दौरान कैलाश अपने साँपों के साथ करतब दिखाता है और एक काला गेहुअन उसे काट लेता है। डॉक्टर के घर में हाहाकार मच जाता है। जड़ी-बूटियाँ, पट्टियाँ और आधुनिक चिकित्सा सब व्यर्थ हो जाती है और युवा धीरे-धीरे मृतप्राय होने लगता है। तभी गाँव का वही बूढ़ा भगत, जिसे डॉक्टर ने कभी दुत्कारा था, डॉक्टर के दरवाज़े पर आता है। वह कैलाश को नहलाता है, मंतर पढ़ता है और कुछ जड़ी का लेप लगाता है। उषा की लालिमा के साथ कैलाश की आँखें भी खुल जाती हैं और वह जीवन की ओर लौट आता है।
यहीं से कहानी का नैतिक ताना-बाना बिखरने लगता है। डॉक्टर की लापरवाही के कारण मरने वाला किसान का बेटा तो बच नहीं पाया था, मगर डॉक्टर के बेटे को भगत का मंत्र जीवित कर देता है। यह निर्णय करुणा के नाम पर अंधविश्वास का महिमामंडन करता है। गाँव से आए भगत को प्रेमचंद एक देवदूत की तरह चित्रित करते हैं, जो झाड़-फूँक और जड़ी-बूटी से विष का असर खत्म कर देता है। इस घटना का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है; साँप का जहर आधुनिक चिकित्सा में विषरोधी इंजेक्शन से दूर होता है, मंत्रों से नहीं। मगर कहानी इस चमत्कार को पूर्ण सत्य की तरह प्रस्तुत करती है और पाठक को यह विश्वास दिलाती है कि देहाती मंत्र शहरी ज्ञान से श्रेष्ठ है। यह संकेत तार्किकता के विपरीत है और हमारे समय के लिए घातक सन्देश है, क्योंकि जनता पहले से ही अस्पतालों से दूर झाड़-फूँक की ओर जाती है।
इस विरोधाभास को और भी तीखा बनाता है डॉक्टर का पश्चाताप। कहानी के अंत में डॉक्टर भगत की खोज में निकल पड़ते हैं और कहते हैं कि उनका सब कुछ ले लें; वह लँगोटी बाँधकर घर से निकल जायेंगे, बस उनका बेटा बच जाए। भगत स्वाभिमानी है, कुछ भी नहीं लेता और चुपचाप चला जाता है।
प्रेमचंद यहाँ आधुनिक और देहाती के बीच एक नैतिक समांतर रेखा रख देते हैं—एक ओर डॉक्टर हैं, जो धन और अहं के आवेग में संवेदना खो बैठते हैं; दूसरी ओर वही बूढ़ा ‘भगत’ है, जिसे कभी दुत्कराया गया था, पर वह प्रतिशोध दबाकर दया दिखाता है। समस्या यह नहीं कि वह पहले बच्चे को क्यों न बचा सका—उस समय न उसे बुलाया गया था, न वह प्रसंग सर्पदंश का था—समस्या यह है कि कथा समाधान को चमत्कार से साधती है। सर्पदंश जैसे चिकित्सकीय संकट का ‘मंत्र’ से नाटकीय निष्पादन ‘देउस-एक्स-माकीना’* की तरह अवतरित होता है, जिससे वैज्ञानिक विवेक हाशिए पर चला जाता है और पाठकीय मानस में झाड़-फूँक की वैधता का संकेत बैठता है। नैतिक प्रतिपूर्ति का सौंदर्यशास्त्र इस कहानी में—कि जिसे तुमने ठुकराया, वही तुम्हारा उद्धार करेगा—भले कलात्मक रूप से प्रभावशाली हो, पर जन-स्वास्थ्य की दृष्टि से विवेक-रोधी निष्कर्ष को प्रतिष्ठित कर देता है।
“सौत” कहानी में प्रेमचंद ने एक पारिवारिक त्रिकोण को मंच पर रखा है। कथा का केंद्र है एक पत्नी, जिसका पति किसी कारण दूसरी स्त्री से विवाह करने का निश्चय करता है या उसके साथ संबंध रखता है। पहली पत्नी के मन में जलन, अपमान और दुख का बवंडर उठता है। उसके भीतर वह प्रश्न बार-बार कौंधता है: ‘मेरे रहते पति को दूसरी स्त्री क्यों चाहिए?’ पति का आचरण समाज की पितृसत्तात्मक व्यवस्था की विद्रूपता का अनावरण करता है, जिसमें पुरुष का अधिकार नारी की भावनाओं से ऊपर माना जाता है। प्रेमचंद पत्नी की भावनाओं, उसके आक्रोश और उसकी विवशता को शब्दों में बांधते हैं। स्त्री पात्रों का संवाद और उनके मनोभावों का चित्रण कहानी का आधार है।
यहाँ प्रेमचंद परंपरागत स्त्री-छवि को चुनौती देने के बजाय उसे ही पुष्ट करते दिखते हैं। पहली पत्नी की जलन और क्रोध को लेखक इस तरह नियति का हिस्सा मान लेते हैं कि उसकी कोई स्वतंत्र चेतना नहीं उभरती। वह अपने पति को छोड़कर अपना जीवन नयी राह पर चलने की कल्पना भी नहीं करती, न ही वह दूसरी स्त्री के साथ समझौता या प्रतिरोध की कोई संभावना तलाशती है। कहानी में दोनों स्त्रियों को आपस में प्रतिस्पर्धी बना दिया जाता है; वे एक-दूसरे को नीचा दिखाने में अपनी ऊर्जा खर्च करती हैं। पुरुष पात्र, जो इस परिस्थिति का जनक है, कथानक के परिधि में रहता है; उसकी आलोचना नहीं होती। इस प्रकार “सौत” स्त्री-जीवन की जटिलताओं को गहराई से नहीं, बल्कि सतही ईर्ष्या के रूप में चित्रित करके पितृसत्तात्मक नैतिकता को ही पुन: प्रस्तुत करती दिखती है। हो सकता है यह कथाकार के द्वारा अनायास हुआ हो , लेकिन है तो सही!
कहानी में यह भी परिलक्षित होता है कि प्रेमचंद स्त्री की विकल्पहीनता को सामाजिक तथ्य की तरह पेश करते हैं। कथा के अंत में कोई सचेष्ट परिवर्तन नहीं होता; पति दो स्त्रियों के बीच जिस तरह चाहता है, वही चलता रहता है। लेखक घटनाओं को इस तरह नियति मान लेते हैं कि पाठक अपने समय के समाज में बदलाव की संभावना नहीं खोज पाता। यह बात तब और गंभीर हो जाती है जब प्रेमचंद अपनी कई रचनाओं में सामाजिक अन्याय पर आक्रमण करते हैं; पर “सौत” में वह स्त्री पर अन्याय को मात्र दैविक विधान की तरह दिखाते हैं। इससे कहानी के यथार्थ में कमजोरी आती है और पाठक के समक्ष स्त्री-मुक्ति का कोई मार्ग नहीं प्रशस्त हो पाता है।
प्रेमचंद का उपन्यास “निर्मला” बाल विवाह और दहेज की समस्या को केंद्र में रखता है। लेकिन यहाँ हम उसके कथानक पर आलोचनात्मक दृष्टि डालेंगे। निर्मला एक सुशील युवती है, जिसके पिता उसकी शादी के लिए धन नहीं जुटा पाते, परिणामस्वरूप उसका विवाह उससे कई गुना बड़े अधेड़ आयु के विधुर प्रोफेसर से कर दिया जाता है। ससुराल पहुँचते ही निर्मला के सामने एक विचित्र स्थिति पैदा होती है—उसके पति को उससे इतना अविश्वास है कि वह अपने पुत्रों को उसकी ओर देखते ही संदेह करता है। निर्मला के सम्मानित जीवन में आशंकाएँ, आरोप और आत्म-बलिदान जुड़ जाते हैं। उसकी आवाज किसी को नहीं सुनाई देती; वह लगातार अपने भाग्य को दोष देती है और अपना जीवन पति की संदेहशीलता और समाज की कठोर नैतिकता की भेंट चढ़ा देती है।
इस कथानक में सबसे बड़ी समस्या भाग्यवाद का अतिरेक है। निर्मला अपने जीवन में जो भी हो रहा है, उसे अपने ‘भाग्य’ और ‘किस्मत’ का परिणाम मानती रहती है। पिता, पति और समाज—सभी उसको ‘संस्कारी’ बने रहने की सीख देते हैं और वह किसी भी प्रकार विरोध करने का साहस नहीं जुटा पाती। लेखक पाठक को बार-बार बताता है कि “निर्मला की किस्मत ही ऐसी थी” और घटनाएँ एक के बाद एक दुःखद मोड़ लेती जाती हैं। इस प्रकार कहानी में एक गहरा निराशावाद भर जाता है जो सामाजिक सुधार की संभावनाओं को पंगु कर देता है। पाठक उन व्यवस्थागत कारणों पर विचार नहीं कर पाता जिनके कारण बाल विवाह और दहेज की कुप्रथा फल-फूल रही थी, क्योंकि कथानक उसे एक लड़की की ‘किस्मत’ का किस्सा मानकर समाप्त हो जाता है।
“निर्मला” का दूसरा बड़ा दोष पात्रों का रेखाचित्र है। पति का चरित्र एक संदिग्ध और शंकालु व्यक्ति के रूप में उभरता है, जो हर समय अपनी पत्नी पर गलत नज़र रखता है। वह पत्नी पर नियंत्रण रखने के लिए अपने नौजवान बेटे को घर से निकाल देता है और अंततः एक त्रासदी घटती है। प्रेमचंद की संवेदना यहाँ भी पीड़िता के प्रति है, पर वह पति के मनोविज्ञान को बेहतरी से नहीं खोलते; वह केवल उसे खलनायक के रूप में दिखाते हैं। इसी तरह निर्मला के भीतर कोई विद्रोह, कोई प्रतिरोध फूटता नजर नहीं आता। वह रोती है, सहती है और अंततः मर जाती है। इस प्रकार कथा सवाल छोड़ने के बजाय नियति के सामने आत्मसमर्पण का महाकाव्य बन जाती है, जो समाज में बदलाव की संभावनाओं को स्थगित कर देती है।
कहानी “कफ़न” में प्रेमचंद ने घीसू और माधव नामक बाप-बेटे की कहानी लिखी है। यह दोनों इतने आलसी और कामचोर हैं कि घर में अनाज न होने के बावजूद काम पर नहीं जाते। कहानी की शुरुआत में उनका आलस्य दिखाया जाता है—वे अलाव के सामने आलू भून रहे हैं जबकि घर की बहू बुधिया प्रसव-पीड़ा से तड़प रही है। घीसू बेटे से कहता है, ‘जा देख तो आ’, और माधव चिढ़कर जवाब देता है, ‘मरना ही तो है, जल्दी मर क्यों नहीं जाती?’ बुधिया देर रात दम तोड़ देती है। सुबह दोनों पिता-पुत्र छाती पीटने लगते हैं, गाँव वालों से दो-दो रूपये मांगते हैं और अंततः कफ़न के लिए इकट्ठे किए गए पैसों से शराब पीने जा पहुँचते हैं। घीसू कहता है, ‘कफ़न लाश के साथ जल ही तो जाता है।’यह कहानी अपने समय में चोट और घृणा देने वाली थी, क्योंकि उसने गरीबी और बेरोजगारी के ऐसे चरित्र दिखाए जो नायक नहीं थे। किंतु आज आलोचनात्मक दृष्टि से देखें तो कहानी का यथार्थ विकृत दिखता है। घीसू और माधव का आलस्य इतना अतिरंजित है कि वे प्रसव पीड़ा में कराहती अपनी बहू की भी मदद नहीं करते। फिर दोनों उस स्त्री की लाश पर रोने का नाटक करते हैं, गाँव से पैसा जमा करते हैं और उसका कफ़न लेने के बजाय शराब पी जाते हैं। प्रेमचंद उन्हें दार्शनिक बताते हैं, जो कहते हैं, ‘जब हमारी आत्मा प्रसन्न हो रही है तो क्या उसे पुण्य न होगा?’ यह संवाद आज भी सिहरन पैदा करता है, पर यह भी सच है कि कहानी गरीबी को नैतिक पतन के रूप में चित्रित करती है। पात्रों को कोई विकल्प या संघर्ष करने की जगह नहीं दी जाती; वे केवल पराजय और नैतिक पतन के प्रतीक बन जाते हैं।
आलोचना में यह प्रश्न उठना वाज़िब है कि क्या घीसू और माधव की यह स्थिति केवल व्यक्तिगत निकम्मापन है या सामाजिक शोषण का परिणाम? प्रेमचंद कहानी में इस प्रश्न को गंभीरता से नहीं उठाते। गाँव के जमींदार, बनिया और महाजन थोड़े-बहुत पैसे देते हैं, लेकिन उनका शोषण नंगा नहीं होता। घीसू और माधव को इतना आलसी और संवेदनहीन दिखाया गया है कि पाठक उन पर दया नहीं कर पाता। कहानी सामाजिक व्यवस्था पर वार करने के बजाय गरीबों की हीनता पर ठहाका लगाने जैसी लगती है। प्रेमचंद की करुणा यहाँ विडंबनापूर्ण व्यंग्य में बदल जाती है और यथार्थ केवल नकारात्मक छवि बनकर रह जाता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रेमचंद का यह सृजित यथार्थ तत्कालीन समाज के ‘ओरगनिक रिऐलिटि’ नहीं है जो जीवन में पनपा हुआ यथार्थ से किंचित अलग प्रतीत होता है।
“नशा” कहानी का केंद्र एक शराबी चरित्र है जिसकी शराब की लत उसे परिवार, समाज और आत्मसम्मान से दूर ले जाती है। प्रेमचंद इस पात्र को बारीकी से दिखाते हैं—वह घर से पैसे चुरा लेता है, पत्नी और बच्चों की परवाह नहीं करता और दिनभर मदिरालय में बैठे रहने को अपना अधिकार मानता है। लेखक बताता है कि शराब की बोतल सामने आते ही वह खुद को राजा समझने लगता है, बोतल खाली होती ही वही आदमी गिरकर रोने लगता है। कहानी में उसकी पत्नी, पड़ोसी और समाज सभी उसे समझाते हैं, लेकिन वह सुधरने का नाम नहीं लेता। अंत में जब उसे दारू के पैसे नहीं मिलते, तो वह चोरी करता है और पकड़े जाने पर गाँव वाले उसे पीटते हैं।
यह कहानी पढ़ने में आसान और नैतिक शिक्षा से भरी हुई लग सकती है, लेकिन साहित्यिक दृष्टि से यह सरलता ही इसकी कमजोरी है। प्रेमचंद शराब की बुराइयों को दिखाने के लिए अत्यधिक उपदेशात्मक शैली का उपयोग करते हैं। शराबी पात्र का मनोविज्ञान खोलने के बजाय वह उसे एक काठ के पुतले की तरह व्यवहार करते दिखाते हैं—वह बोतल आने पर नाच उठता है, बोतल खाली होते ही गिर पड़ता है। इस तरह कथानक का उद्देश्य केवल पाठकों को समझाना रह जाता है कि शराब पीना कितना नुकसानदेह है। लेकिन क्या यही साहित्य का काम है? क्या एक लेखक का दायित्व पाठकों को बच्चों की तरह पाठ पढ़ाना है? इस कहानी में प्रेमचंद का नैतिक आग्रह उनकी कथा-कला पर भारी पड़ जाता है और कहानी का यथार्थ एक नैतिक निबंध में तब्दील हो जाता है।
कहानी का पात्र कई संभावनाएँ समेटे हुए था। वह शराबी क्यों हुआ? उसके जीवन में कौन-से तनाव, अभाव या दुख थे? इन प्रश्नों पर विचार करने के बजाय प्रेमचंद उसे सिर्फ एक व्यसन का गुलाम दिखाते हैं। ऐसा लगता है कि लेखक ने पहले से तय कर लिया था कि शराब एक बुराई है और शराबी पात्र को दंडित करना है। परिणाम यह निकलता है कि कहानी में न तो मानवीय गहराई है, न ही विरोधाभास। पात्र की पत्नी भी केवल समझाने वाली भूमिका में आती है और अंत में त्रासदी घट जाती है। इस तरह ‘नशा’ पाठकों को विचारोत्तेजक बनाने के बजाय नैतिक उपदेश का मंच बन जाती है।
“पूस की रात” में प्रेमचंद ने एक गरीब किसान हलकू और उसकी पत्नी मुन्नी की कहानी कही है। कहानी की शुरुआत में हलकू साहूकार का कर्ज चुकाने के लिए अपनी पत्नी से बटुआ मांगता है। उसके पास केवल तीन रुपये हैं, जिससे वह एक कम्बल लेना चाहती है, लेकिन मजबूरी में कर्ज चुकाने पड़ते हैं। ठंड बढ़ती जाती है; पूस की रातें लंबी और सर्द होती हैं। हलकू खेत की रखवाली करने जाता है, लेकिन उसके पास कम्बल नहीं है। वह खेत के किनारे अलाव जलाता है और अपने कुत्ते जबरा को साथ लेकर ठंड से लड़ता है। लेखक ठंड का वर्णन इतने तीव्र शब्दों में करते हैं कि पाठक को हलकू की हड्डियाँ काँपती महसूस होती हैं। अंततः जब हलकू ठंड से हारकर अलाव छोड़ देता है तो जानवर खेत में घुसते हैं और उसकी फसल नष्ट कर देते हैं।
इस कहानी में शोषण और गरीबी की पीड़ा को उभारना प्रेमचंद का उद्देश्य है। साहूकार का कर्ज, किसान की विवशता और ठंड से बचने की जद्दोजहद—ये सब यथार्थ हैं। मगर कहानी में जिस तरह हलकू की निराशा और हताशा दिखाई गई है, वह भी उसकी पूरी कथा को एकालाप में बदल देती है। ठंड से काँपते हुए वह, मन में सोचता है कि शायद इस रात उसकी जान निकल जाए और अंततः वह अपने खेत की नष्ट होती फसल देखकर बगैर किसी प्रयास के सो जाता है। यह चित्रण इतना निराशावादी है कि कहीं भी संघर्ष की संभावना नहीं दिखती। क्या किसान अपनी फसल बचाने के लिए कुछ और उपाय नहीं सोचता? क्या वह साहूकार से लड़ने की सोच भी नहीं पाता? प्रेमचंद ने यहाँ प्रतिरोध की जगह केवल नियति और कमजोरी का गान किया है, जिससे कहानी का यथार्थ एकांगी बन जाता है।
कहानी में मुन्नी का पात्र का भी कुछ इसी प्रकार उपयोग किया गया है, जैसे कई अन्य प्रेमचंद की कहानियों में स्त्री पात्रों का होता है—वह व्यंग्य करती है, गुस्सा होती है और फिर पति को राहत देने की कोशिश करती है। उसका स्वर संघर्ष का है, लेकिन कथा अंत में उसके संघर्ष को अनसुना कर देती है। वह चाहती है कि हलकू कम्बल खरीदे, वह चाहती है कि साहूकार से लड़े, पर दोनों बातें नतीजे तक नहीं पहुँचतीं। इस तरह “पूस की रात” का अन्त बर्फ़-सा ठंडा और अवसादपूर्ण है। प्रेमचंद किसानों की गरीबी दिखाने के लिए इतनी गहनता से हताशा को रखते हैं कि वह समाज में बदलाव की संभावनाओं को गायब कर देते हैं और पाठकों को यह मानने के लिए मजबूर कर देते हैं कि गरीब की नियति दुख है।
इन सभी कहानियों का सामूहिक अध्ययन एक स्पष्ट पैटर्न पाठकों के सामने आता है। प्रेमचंद अपनी रचनाओं में सामाजिक यथार्थ को उभारते हैं, लेकिन इन छह कहानियों में करुणा, निराशा, नियति और उपदेश का ऐसा मिश्रण है कि यथार्थ के कई रंग धूमिल हो जाते हैं। ‘मंत्र’ में वे आधुनिक चिकित्सा और देहाती मंत्र के बीच संघर्ष दिखाते हैं, लेकिन अंत में अंधविश्वास को जीत दिलाकर वैज्ञानिक चेतना को कमजोर करते हैं। ‘सौत’ में वे स्त्री-जीवन की जटिलता दिखाने के बजाय स्त्रियों को आपसी जलन के दायरे में सीमित कर देते हैं। ‘निर्मला’ में वे बाल विवाह और दहेज की जटिल समस्याओं को नियति और भाग्यवाद के पर्दे में छिपा देते हैं। ‘कफ़न’ में वे गरीबी को हास्य और व्यंग्य के माध्यम से इतना विकृत करते हैं कि पात्र मनुष्यता से दूर लगने लगते हैं। ‘नशा’ में वे उपदेशात्मकता से कहानी को बोझिल बना देते हैं और ‘पूस की रात में खेत और किसान के संघर्ष के बजाय केवल निराशा को केंद्र में रख देते हैं।
इन कमियों की ओर संकेत करने का उद्देश्य प्रेमचंद की प्रतिष्ठा को कम करना नहीं है, बल्कि यह दिखाना है कि महान साहित्यकार भी कभी-कभी अपने यथार्थ से भटक सकते हैं। प्रेमचंद की संवेदनाएँ, भाषागत सरलता और करुणा की तीव्रता अद्वितीय हैं, पर आलोचनात्मक दृष्टि से हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि उनकी कुछ रचनाएँ तर्क, वैज्ञानिक सोच और प्रतिरोध के तत्वों को पर्याप्त स्थान नहीं देतीं। साहित्य का काम केवल पाठक को रुलाना नहीं, बल्कि उसे सोचने, सवाल करने और बदलाव की ओर प्रेरित करना भी है। इन कहानियों में जहाँ-जहाँ करुणा ने विवेक को धुँधला किया है, वहाँ हमें सजग रहकर यथार्थ की सूक्ष्मताओं को पुनः पढ़ना होगा। यही आलोचनात्मक दृष्टि प्रेमचंद जैसे लेखक की महानता को और अधिक गहराई से समझने में मदद कर सकती है।
(नोट: देउस-एक्स-माकीना* : ग्रीक रंगमंच से आया शब्द। शाब्दिक अर्थ — “मशीन से उतारा गया देवता।” जब कथा का समाधान असंभव लगता था तो मंच पर ऊपर से देवता को उतारकर नाटक अचानक समाप्त कर दिया जाता था। आधुनिक आलोचना में इसका प्रयोग उस स्थिति के लिए होता है जहाँ कथानक का हल तार्किक विकास से न होकर किसी अप्रत्याशित चमत्कार या बाहरी हस्तक्षेप से हो।)●
सुशील कुमार
13 सितम्बर, 1964, पटना सिटी (बिहार)
कवि-लेखक
• प्रकाशित कृतियाँ:
कविता संग्रह:
कितनी रात उन घावों को सहा है(2004), तुम्हारे शब्दों से अलग (2011 ), जनपद झूठ नहीं बोलता (2012), हाशिये की आवाज (2020), पानी भीतर पनसोखा (2025)
आलोचना: आलोचना का विपक्ष (2019), हिंदी ग़ज़ल का आत्मसंघर्ष (2021)
बाँसलोई में बहत्तर ऋतु (2025)
झारखंड शिक्षा सेवा कैडर में जिला शिक्षा पदाधिकारी के पद से दुमका से सितंबर, 2024 में सेवानिवृत्त।
पता: हंसनिवास, कालीमंडा, दुमका (झारखंड) – 8
14101
ईमेल: sk.dumka@gmail.com
मो. न. 7004353450 और 9006740311
टिप्पणी-प्रकोष्ठ में आपका स्वागत है! रचनाओं पर आपकी गंभीर और समालोचनात्मक टिप्पणियाँ मुझे बेहतर कार्य करने की प्रेरणा देती हैं। अत: कृप्या बेबाक़ी से अपनी राय रखें...