हिंदी ग़ज़ल का आत्मसंघर्ष

हिंदी ग़ज़ल की विकास-यात्रा पर किताब।


हिंदी में ग़ज़ल जैसे जनप्रिय काव्यरूप की विकास-यात्रा के कई पड़ाव हैं । खुसरो , कबीर , भारतेंदु , निराला , त्रिलोचन , शमशेर , दुष्यंत और अदम । लेकिन यह सिलसिला यहीं आकर ठहर नहीं जाता , बल्कि हिंदी की प्रगतिशील- जनवादी काव्य - परंपरा के साथ पहचान कराते हुए आगे बढ़ता है । कहना चाहिए कि सुपरिचित कवि और समालोचक सुशील कुमार की यह आलोचनात्मक कृति 'हिंदी ग़ज़ल का आत्मसंघर्ष' हिंदी ग़ज़ल की इसी विकास यात्रा और उसके वस्तुगत आधारों का व्यापक विश्लेषण करती है। उनका मानना है कि किसी भी जीवित विधा को उसकी अपनी सुदीर्घ काव्य - परंपरा से काटकर नहीं देखा जा सकता ।

आकस्मिक नहीं कि ऐसा करते हुए लेखक को हिंदी ग़ज़ल में मौजूद छद्म प्रगतिशीलता से भी टकराना पड़ा है । यहां वे इस काव्यरूप की परंपरागत रूमानी संस्कृति से जन - संस्कृति तक की यात्रा करते हुए उन जड़ताओं पर प्रहार करते हैं , जिनके कारण यह मूल्यवान काव्यविधा हिंदी के प्रगतिशील - जनवादी काव्येतिहास और परंपरा का हिस्सा नहीं बन पाई।  इसीलिए वे अभिजनवादी सोच - सरोकार और उसके मनोरंजनवादी कलावाद को नकारते हुए कहते हैं कि हिंदी ग़ज़ल अब "दरबारी बंधनों से मुक्त होकर समाजशास्त्रीय आलोचना के वृत्त में शामिल हो गई है ।"

उल्लेखनीय है कि सुशील कुमार का आलोचकीय अंदाज , उनकी भाषा , शिल्प और सरोकार ; सभी कुछ पारदर्शी है । इसीलिए उसमें तर्कपूर्ण साहसिकता है तो साफगोई भी ।

 प्रलेक प्रकाशन से छपी यह किताब सुधी पाठकों के लिए amazon पर उपलब्ध है, जिसका लिंक नीचे दिया गया है - 

https://amzn.in/d/im1yQ8E