आलोचना का विपक्ष

सुशील कुमार की आलोचना की पुस्तक 'आलोचना का विपक्ष' से उद्धृत -

★“साहित्य में ऐसे बहुत से लेखक-कवि हैं, जिनका जनसंघर्ष से दूर-दूर तक वास्ता नहीं। सरप्लस पूँजी से सैर-सपाटे और मौज-मस्ती करते हैं और अपने कमरे में बैठकर मार्क्स की खूब सारी किताबें पढ़कर जनचेतना का मुलम्मा अपने ऊपर चढ़ाते हैं। गोष्ठियों और मंचों पर खूब भाषण देते हैं। भारतवर्ष में ऐसे नवबुर्जुआ लोकवादियों की कमी नहीं। ये मार्क्सवाद और लोकचेतना का चोला पहनकर अपनी गलत कमाई को सफेद करना चाहते हैं। अपने पक्ष में एक माहौल बनाना चाहते हैं। ये पूँजीपतियों और सामन्तों से कम खतरनाक नहीं हैं। इनका एक प्रमुख अभिलक्षण यह भी है कि ये केवल सत्ता का विरोध करते हैं, शोषक समाज का नहीं, क्योंकि यह उनके ही अंग होते हैं। लोकचेतना और वर्गसंघर्ष उनका मुखौटा है। उनका ‘डी-क्लासीफिकेशन’ एक छलावा है इसलिए हमारी लड़ाई केवल सता और पूँजी से नहीं, इन तथाकथित सफेदपोशों से भी है जो अपने को वर्गविहीन कहकर हमें ठगते हैं।"

"कवि के विचारतत्व से उसके लेखकीय चरित्र का भी उतना ही संबंध है। लेखक अगर अपना जीवन अपनी लेखनी से अलग जीता है तो फिर उसका संपूर्ण लेखन बेमानी है, चाहे उसका लेखन कितना ही महत्वपूर्ण क्यों न हो! समालोचना में भी समालोचक का अपना व्यक्तित्व और चरित्र उतना ही मोल रखता है। अगर सिद्ध भाषा में कहें तो उसकी लेखनी की कीमत का निर्धारण उसकी प्रतिबद्धता से होता है, यहाँ प्रतिबद्धता केवल लेखक का विचार नहीं, उसका जीवन-व्यवहार भी है। साहित्य में अवसरवादिता कवि की साहसहीनता का मूल कारण है। मुक्तिबोध के शब्दों में, “वह हमें सच-सच और साफ-साफ कहने नहीं देता। ‘साफ-साफ’ का अर्थ कलाहीन या गद्यात्मक होना नहीं है।“ इक्कीसवीं सदी की कविताओं के साथ सबसे बड़ा संकट कवियों-समालोचकों के विचलन और कविता-कवि के चरित्र का संकट है। इस विद्रूप समय में कविता को खराब करने का काम केवल रूपवादियों और सुविधाभोगियों ने ही नहीं किया है, बल्कि कई मार्क्सवादियों और लोकवादियों ने भी अपनी वैचारिक दरिद्रता के कारण उसकी अस्मिता-हरण करने में कोर-कसर नहीं छोड़ी- ‘सभ्यता की संयत-नकली भाषा में’। इसलिए अब कविता की दशा-दिशा मात्र उसके सौन्दर्य-शास्त्र और विचार-बोध से नहीं तय की जा सकती ! इससे प्रबल चूक होने की सम्भावना बनती है। बदलते समय में पूँजी और उदारीकरण से ही केवल हमारा सामना और विरोध नहीं, बल्कि इनके विरोधियों के उस सियार-चाल से भी है जो मौका पाकर कभी अवसर भुनाने से नहीं चुकते और सामान्य कवियों को भी अपने करियर व यशोलाभ के लिए महान बनाकर प्रस्तुत करते हैं जिससे उनका पूरा कविता-समय ही सवालों के घेरे में आ जाता है। नयी सदी की कविता की दशा-दिशा का यह पाठ बहुत रुचिकर, किन्तु सचमुच यह कविता का बेहद कठिन और अत्यन्त सचेत होकर चलने का समय है।" ●

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