‘हाशिये की आवाज़’ कवि सुशील कुमार का कविता-संग्रह है, जो समकालीन हिंदी कविता में वंचित, उपेक्षित और श्रमशील समाज की संवेदनाओं को सशक्त स्वर देता है। यह संग्रह उन लोगों की पीड़ा, संघर्ष और आत्मसम्मान की अभिव्यक्ति है, जो विकास और सत्ता की मुख्यधारा से बाहर रखे गए हैं, लेकिन जिनके श्रम पर समाज की संरचना टिकी है।
सुशील कुमार जन-सरोकारों के कवि हैं। उनकी कविता जीवन से उपजती है और सामाजिक यथार्थ से सीधा संवाद करती है। प्रगतिशील चेतना उनकी कविताओं में किसी वैचारिक नारे की तरह नहीं, बल्कि अनुभव और संवेदना के स्तर पर विन्यस्त दिखाई देती है। सामान्य जन, स्त्री, प्रकृति और पर्यावरण उनकी काव्य-दृष्टि के स्थायी आधार हैं। इस संग्रह में यह दृष्टि और अधिक स्पष्ट और मुखर होकर सामने आती है।
‘हाशिये की आवाज़’ की कविताएँ असंतुलित विकास, विस्थापन, श्रम की अवमानना, धार्मिक पाखंड, अधिनायकवादी मानसिकता और सत्ता की अहंकारी संरचनाओं पर प्रश्न उठाती हैं। श्रम की गरिमा, मेहनतकश हाथों की ताक़त और शोषण के विरुद्ध प्रतिरोध इन कविताओं का केन्द्रीय स्वर है। कवि यह संकेत करता है कि सत्ता की शक्ति जनता से ही जन्म लेती है, लेकिन उसी जनता को हाशिये पर धकेल दिया जाता है।
संग्रह का उत्तरार्ध मानवीय संबंधों, स्मृति, प्रेम, प्रकृति और पर्यावरण की ओर उन्मुख होता है। पहाड़, जंगल, नदी, आदिवासी जीवन और ग्राम्य संस्कृति यहाँ जीवंत बिंबों में उपस्थित हैं। कविताएँ यह रेखांकित करती हैं कि मनुष्य का अस्तित्व प्रकृति और अन्य जीवों के साथ सहअस्तित्व पर आधारित है। प्रेम-कविताएँ भी इसी जीवन-बोध से जुड़ी हैं, जहाँ प्रेम संवेदना, स्मृति और जिम्मेदारी का विस्तार बनता है।
‘हाशिये की आवाज़’ कथ्य की प्रासंगिकता, भाषा की सादगी और शिल्प की सहजता के साथ सुशील कुमार की कविताई को एक सशक्त और भरोसेमंद पहचान देता है। यह संग्रह आज के समय में कविता को सामाजिक हस्तक्षेप के रूप में देखने वालों के लिए एक महत्वपूर्ण कृति है।
लोकोदय प्रकाशन, लखनऊ से वर्ष 2020 में प्रकाशित यह कविता-संग्रह सुधी पाठकों के लिए अमेज़न पर उपलब्ध है।
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— प्रशांत जैन की कलम से
