'काकुलम' : पहचान, विचारधारा और अस्तित्व के द्वंद्व की गाथा

Sushil Kumar
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     [[साहित्य की सुप्रतिष्ठित पत्रिका ' सरस्वती ' के हालिया अंक जुलाई - सितंबर 2025 में प्रकाशित]]

भरत प्रसाद ने अपने पहले ही उपन्यास 'काकुलम' से भारतीय साहित्य में कथावस्तु, शिल्प और वैचारिकी के स्तर पर अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। यह इस मायने में एक प्रयोगधर्मी और नूतन पहल माना जा सकता है कि इसने कथा के पारंपरिक ढांचे के मिथक को तोड़कर उसे विचार और दर्शन का ऐसा दस्तावेज बना दिया है, जिसमें अस्तित्ववादियों की तरह न कोई स्वप्न, न नींद, न अकेलेपन की गुरुगंभीर त्रासदी है और न ही 'ऑर्गैनिक रियलिटी' का वीभत्स सामाजिक चित्रण।

इसका अर्थ यह भी नहीं लिया जाना चाहिए कि उपन्यास किसी एक विचारधारा का समर्थन करता है, बल्कि यह पाठक को सोचने और स्वयं का उत्तर खोजने के लिए उद्वेलित करता है। वह मनुष्य की पहचान और उसके अस्तित्व के संकट का संधान उस तरह नहीं करता, जिस तरह “लघु मानववादी” अपनी रचना में करते रहे हैं। यहाँ आत्मालाप कोई रुदन या निनाद नहीं है जो निराश मनस्तत्व की कुंठा या दु:ख से उपजा हो। गोकि उपन्यास में सबसे बड़ा सवाल यही है—"हम कौन हैं?" और "हमारा अस्तित्व किस आधार पर है?" यह केवल कथा-पात्र धवल का सवाल नहीं, बल्कि पूरे समाज से जुड़ा प्रश्न है। यह एक चिरंतन प्रश्न है। विश्वविद्यालयी राजनीति, जातीय संघर्ष और विचारधाराओं के द्वंद्व के बीच धवल के बहाने भरत प्रसाद का उपन्यासकार पहचान की खोज की प्रक्रिया से गुजरता है।

"काकुलम... काकुलम!" वह पक्षी धवल से पूछता है। वह स्तब्ध खड़ा है। क्या जवाब दे? कौन है वह? क्या है उसकी पहचान?"
 
- यह प्रतीकात्मक संवाद दिखाता है कि पहचान का संकट केवल एक व्यक्ति की समस्या नहीं, बल्कि पूरे समाज की व्याप्ति है। लब्धप्रतिष्ठ कथाकार एस.आर. हरनोट इस किताब के आमुख में सही लिखते हैं कि “आज के समय में प्रश्न पूछना अपराध की श्रेणी में लाया जा चुका है... आपको घोर चुप्पियों की ओर धकेला जा रहा है। आपको मनुष्य होने से गायब कर दिया गया है और आपकी पहचान मात्र आधारकार्ड भर है। इसमें भोर का वह पक्षी धवल या विश्वविद्यालय कैम्पस में अनेकों विचारधाराओं के छात्र नेताओं से बार-बार यही प्रश्न करता है कि ...... ‘‘काकुलम..... काकुलम !’’.... और शायद आज इसका उत्तर देना अत्यन्त कठिन हो गया है। उपन्यास इन्हीं अनेक प्रश्नों, द्वन्द्वों, कई विचारधाराओं के रंगों में रंगते छात्र आंदोलन के बीच एक ऐसी यात्रा में हैं जहां पहले प्यार के बहुत मीठे और गहरे स्पर्श हैं, बिछोह हैं, गाँव और शहर के बीच बचती-मिटती परम्पराएँ और संस्कृतियाँ हैं... बुद्ध, मार्क्स, प्रेमचंद, गांधी, अम्बेडकर, नेहरू और इन सबसे ऊपर आज के हिन्दुत्व को बहुत बारीकी से समझने-परखने की जद्दोजहद् भी है।”
       
भारतीय साहित्य में उपन्यास लेखन ने हमेशा समाज, राजनीति और व्यक्तिगत मनोभावनाओं के द्वंद्व को व्यक्त करने की परंपरा को आगे बढ़ाया है। इस क्रम में यह व्यक्त करना समीचीन है कि भरत प्रसाद अपनी कृति में उस परंपरा का निर्वहन करते हुए उसके और आगे बढ़कर उसे वैचारिक मंथन का हिस्सा बना देते हैं। उपन्यास में कला का यह उत्कर्ष केवल कथावस्तु के निर्धारण से फलित नहीं होता, बल्कि इसमें उसके लेखक का जीवनानुभव भी काम करता है जो उसके शिल्प और पात्रों की संवाद शैली में व्यक्त होते हैं। इसलिए यहाँ यह कहना जरूरी है कि केवल शोध और बाहरी दुनिया की परिघटनाओं के निरीक्षण से कथाकार उसे अर्जित नहीं कर सकता, जबतक कि वह कुछ अंश तक पात्रों को स्वजीवन में अन्तर्भूत नहीं कर लेता हो। केवल समकालीन यथार्थ के साथ स्वप्न, फैंटेसी या कल्पना के योग और “फ्यूजन” से प्राय: यह हासिल नहीं होता। भरत प्रसाद के इस उपन्यास को पढ़ने से मुझे यह प्रतीति होती है।
यह उपन्यास न केवल एक युवा छात्र के जीवन और उसकी यात्रा का चित्रण करता है, बल्कि समकालीन विश्वविद्यालयी राजनीति, जातीय पूर्वाग्रह, विचारधाराओं के संघर्ष और व्यक्तिगत पहचान की जटिलताओं को भी उसकी द्वंद्वात्मकता में गहराई से उभारता है।

हालांकि उपन्यास का नाम “काकुलम” स्वयं में एक रहस्य, प्रतीक और विचारोत्तेजक प्रश्न की तरह, पंछी के प्रश्नांकित बोली ( जैसे कोयल की कुहु-कुहु के तर्ज़ पर) “काकु-काकु...” की तरह है जिसमें “लम” प्रत्यय को जोड़कर लेखक ने इसे एक पहेली की तरह बना दिया है, जो पाठक से पूछता है कि “कौन हैं हम?” और “हमारा अस्तित्व किस आधार पर है?” यही सवाल उपन्यास की समग्र भावना में समाहित है।

आपको उपन्यास से गुजरते हुए यह तीव्रता से महसूस होगा कि 'काकुलम' उपन्यास का शीर्षक पाठक को आरंभ से अंत तक अपनी व्याख्या खोजने के लिए प्रेरित करता है। यह कथा का मूल स्वर है जो इसमें निहित वैचारिक मंथन और पहचान की खोज को भी व्यक्त करता है। यह शब्द किसी विशिष्ट स्थान, व्यक्ति या वस्तु का संकेत नहीं देता, वरन् एक मानसिक और दार्शनिक स्थिति को प्रतिबिंबित करता है और यही इसका सौंदर्य और इसकी विशिष्टता है। कथा-पात्र धवल का संघर्ष केवल बाहरी दुनिया से नहीं, यह अपने भीतर की पहचान को लेकर भी है और यह शीर्षक इसी आंतरिक और बाहरी टकराव को रेखांकित करता है। उपन्यास के भीतर यह शब्द कई संदर्भों में प्रयुक्त होता है, लेकिन इसका कोई निश्चित अर्थ नहीं दिया गया है जिससे यह और अधिक रहस्यमय तथा बहुआयामी (मल्टीडाइमेंशनल) बन जाता है।

यह शीर्षक एक ओर व्यक्ति की आत्म-परिभाषा और अस्तित्व संबंधी प्रश्नों से जुड़ा है तो दूसरी ओर यह एक व्यापक सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ में भी प्रासंगिक रहता है। काकुलम केवल एक पंछी-स्वर ही नहीं, रचना का केवल एक नाम नहीं, बल्कि मन को प्रकंपित करने वाला एक विमर्श है, जो पाठक को सोचने और अपनी व्याख्या करने के लिए बाध्य करता है। यही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है।

कथानक और सामाजिक संदर्भ
      
काकुलम की कथा मुख्य रूप से धवल नामक एक निम्न-मध्यवर्गीय छात्र के इर्द-गिर्द घूमती है। धवल का गाँव से निकलना, शहर के विश्वविद्यालय में प्रवेश करना और वहाँ के राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक वातावरण से उसका सामना करना, इस उपन्यास की रूपरेखा का मूल आधार है। उपन्यास में यह दिखाया गया है कि किस प्रकार एक युवा अपने व्यक्तिगत संघर्ष के साथ-साथ उस व्यापक सामाजिक विमर्श में उलझ जाता है जिसमें विभिन्न विचारधाराएँ, राजनीतिक दल और जातीय पहचान आपस में टकराती हैं।

उपन्यास के प्रारम्भ में लेखक ने ग्रामीण परिवेश का चित्रण किया है जहाँ जीवन की सरलता और पारंपरिक मूल्य स्पष्ट रूप से झलकते हैं। लेखक कहता है :
"बुढ़वा तालाब बगल में ही तो है। कब बना, पता नहीं, किसने खुदवाया, कौन बताए? बुढ़ापा झेल रहा है अब, अकेला तन्हा।"
- इस चित्रण में लेखक न केवल प्रकृति की विडंबना को अंकित करता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि जीवन के मूल तत्व - परंपरा, समय और बदलते सामाजिक ढांचे में एक गहरा विरोधाभास छिपा हुआ है। गाँव से लेकर विश्वविद्यालय तक का यह संक्रमण, आधुनिकता और परंपरा के बीच चल रही संघर्ष की अप्रतिम बानगी है। विश्वविद्यालयी परिसर में धवल के अनुभवों का वर्णन करते हुए लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि यह माहौल आजकल शैक्षिक संस्थान का हिस्सा तो ही, साथ ही एक जीवंत राजनीतिक मंच है जहाँ विभिन्न विचारधाराएँ एक-दूसरे से टकराती हैं। उपन्यास में विश्वविद्यालयी राजनीति का वर्णन करते हुए लेखक कहता है:
 
"यहाँ हर विचारधारा एक-दूसरे को निगल जाने के लिए तैयार बैठी है। कोई मार्क्स की बात कर रहा है, कोई गांधी को उद्धृत कर रहा है, कोई हिंदुत्व की दुहाई दे रहा है। लेकिन असल में, सब अपनी-अपनी सत्ता के लिए लड़ रहे हैं।"
- यह संवाद इस विडम्बना को खोलता है कि कैसे विश्वविद्यालय में केवल शैक्षिक चर्चा नहीं होती, बल्कि यह एक विशाल राजनीतिक एरिना (arena) भी बन जाती है, जहाँ युवा मन अपनी पहचान और भविष्य के लिए संघर्षरत होता है। धवल का इस राजनीतिक और वैचारिक संघर्ष में फँस जाना केवल उसके व्यक्तिगत विकास को प्रभावित ही नहीं करता, पूरे समाज में चल रही उस विभाजनकारी राजनीति की ओर भी इशारा करता है।

 संवाद एवं मनोवैज्ञानिक गहराई

उपन्यास के बनक (टेक्सचर) की निर्मिति में इसकी सहज संवाद शैली का कम योग नहीं है। भरत प्रसाद ने संवादों के भीतर पात्रों की आंतरिक भावनाओं, आशंकाओं और उम्मीदों को निखार कर उसे दो-टूक प्रस्तुत किया है। एक संवाद में धवल और भूमिका के बीच चलती बातचीत के लहज़े को देखिए कि कैसे विचारधारा, प्रेम और व्यक्तिगत अस्तित्व की खोज एक ही धारा में एकमेक होकर न्यस्त होते और बहते हैं।
"तुम्हें क्या लगता है, विचारधारा कोई स्थायी चीज़ होती है?"
"विचारधारा वह होती है, जो हमें हमारे वर्तमान से लड़ने की ताकत देती है।"
- इस संवाद में दोनों पात्रों के बीच विचारों के आदान-प्रदान में जो संगति दिखलाई देती है वह अपूर्व है। यह भी कि युवा पीढ़ी अपनी पहचान के लिए किस प्रकार वैचारिक संघर्ष में शामिल है। यहाँ विचारधारा को स्थायित्व से परे, एक निरंतर परिवर्तनशील कारक के रूप में जानने का उपक्रम किया गया है। इसके अलावा, एक अन्य संवाद में लेखक ने यह सवाल उठाया है कि क्या एक छात्र के कैरियर में केवल पढ़ाई ही महत्वपूर्ण है या उसके भीतर छिपे प्रेम, आकांक्षा और सामाजिक संघर्ष भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं:
 
"क्या केवल किताबें पढ़कर हम अपनी क्रांति ला सकते हैं? या हमें अपने भीतर की जंग भी लड़नी होगी?"
- यह प्रश्न पाठक को यह सोचने पर मजबूर करता है कि आधुनिक शिक्षा को केवल ज्ञान का संचय नहीं होना चाहिए। उसे व्यापक सामाजिक और मनोवैज्ञानिक परिवर्तन का भी साधन बनना चाहिए। उपन्यास के अधिकतर संवाद इस तथ्य को इंगित करते हैं कि वास्तविक क्रांति केवल बाहरी दुनिया में नहीं हो रही। हमारे अंदर भी हो रही है। इस तरह इन संवादों से गुजरने पर हमें सहसा नोबेल पुरस्कार विजेता जर्मन-स्विस उपन्यासकार हरमन हेस के उपन्यास “सिद्धार्थ” की याद हो आती है जिसके पात्र वासुदेव, सिद्धार्थ और नदी के आपसी संवाद हमें आत्मज्ञान, ब्रह्मांडीय एकता और अस्तित्व के गहरे अर्थ की ओर ले चलते हैं।   
       भरत प्रसाद स्वयं एक सिद्ध कवि हैं। इसका प्रभाव उनके उपन्यास पर गहराई से दृष्टिगत होता है। उपन्यास “काकुलम” भाषा और शिल्प की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण कृति है। यहाँ उनकी भाषा बहुआयामी है और उनमें लोक-संवाद, बौद्धिक विमर्श और काव्यात्मक प्रवाह का संतुलित समावेश है। कहन का यह शिल्प परंपरागत कथा-शैली से भिन्न है, जो इसे एक विशिष्ट बौद्धिक कृति के रूप में पाठकों के सामने लाता है। गोकि, भाषा - शैली की काव्यात्मकता उनके उपन्यास ‘काकुलम’ को पठनीय और सुरुचिपूर्ण बनाती है। भाषा में प्रवाह, सूक्ष्मता और चित्रण की भंगिमा देखने के लायक है। धवल के ग्रामीण परिवेश के चित्रण में लेखक की भाषा सरल, सहज और लोकधर्मी है। जब लेखक ग्रामीण परिवेश का वर्णन करता है तो उनके शब्द न केवल उसे दृश्यमान करते हैं, बल्कि उसकी सुवास, ध्वनि और पात्रों के मनोभावों को भी पाठक के सामने उतारकर रख देते हैं:
 
 "निपट झनझन जमी रहती है वहाँ। चरवाहे गाय, भैंस, बकरी चराने या दुपहरिया मनाने बैठ गये तो नीरवता में कुछ मीठी-मीठी कुलकुलाहट दौड़ गयी, नहीं तो शाम होते ही वहाँ जुगनू भी चमकने से भय खाते हैं। अलमस्त, बेतरह उलझे झाड़-झंखाड़ उसके किनारे पर झुके घिरे रहते हैं। थोड़ा ऊपर ही आम, शीशम, महुआ, जामुन और भी न जाने कौन-कौन बालतरु वहाँ जमे हुए हैं। वे दूर-दिशाओं से बहक कर आती हवाओं से जी भरकर खेलते हैं। यही इन सबका परिवार है, यही बच्चे भी हैं, और जीवन-साथी भी यही।“
“पूरब और पश्चिम दिशाओं से तनिक तिरछा रास्ता बनाती एक भीड़- भाड़ सड़क दूर बहुत दूर तक चली गयी है शायद। इसके शरीर से कच्ची राहों वाली टेढ़ी-मेढ़ी नसें दाएँ-बाएँ निकलती चली गयी हैं। कोई दुबली, कोई मोटी, कोई जरा समतल, कोई धँसी-धँसी सी अटपटी और लहरदार। तालाब से करीब सौ कदम का फासला रखती एक ईंटदार सड़क गँवई दुनिया में निहायत भीतर तक घुस गयी है। अब सड़क को छोड़ो, इसी लटपट राह पर उतर चलो। यह देखो, दोनों तरफ खेतों का हरियल मायाजाल। एक साल में ही ये बचपन, जवानी और बुढ़ापा झेल लेते हैं, पर मरते कभी नहीं। देखो, थोड़ा खेतों के उस पार तो देखो, पेड़ों की आदिम चौकसी में अपने गाँव रह-रहकर झाँक रहे हैं, कि नहीं ? अच्छा वो जो उत्तर-पश्चिम के बीचोंबीच देख रहे हो न, वह कान्हापुर है। यादवों का मनमाना गाँव। धुपवाँ उसी के बाद ही तो पड़ता है। अरे, रे, रे, दिखाई तो पड़ा- कान्हापुर की आड़ में शीतल कुहरे की चद्दर लपेटे कैसा चैन से सो रहा है ? अपने दायें घुमाव पर कुछ नहीं है क्या ? हथेली से आँखों पर झांप देकर, मन-मस्तिष्क को आँखों में बुलाकर एकदम से देखो तो। वे-वे तरकुल के लहरिया पेड़ दिखे न ? दो चार ही तो हैं- बीचोंबीच गाँव में अविचल पहरेदार की तरह।"
 
- यह अभिव्यक्ति व्यक्त करती है कि कैसे लेखक ने न केवल दृश्यात्मक विवरण दिया है, बल्कि उस दृश्य में गुप्त भावों को भी भाषा में बिंद्ध दिया है। उनकी भाषा में प्रतीकों और रूपकों का विरल संयोजन है, जिससे ग्रामीण जीवन की साधारणता और विश्वविद्यालयी जीवन की जटिलता दोनों एक दूसरे के विपरीत होते हुए भी एक तारतम्यता में व्यक्त होते हैं। इसमें ग्रामीण संवेदनाओं, विश्वविद्यालयी विमर्श और सामाजिक संघर्ष को गहराई से उकेरा गया है। लेखक की भाषा कहीं लोकजीवन की सहजता लिए हुए है तो कहीं दार्शनिक और बौद्धिक विमर्श से ओतप्रोत दिखती है। कथा की प्रस्तुति घटनाओं पर केंद्रित होते हुए भी विचारों, भावनाओं और सामाजिक चेतना को उद्घाटित करती है। इस तरह यह उपन्यास भाषा और शिल्प दोनों स्तरों पर एक विशिष्ट साहित्यिक प्रयोग के रूप में सामने आता है-
 
"सूरज जाग चुका है। दिशाएं, आसमान, बाग-बगीचे, तालाब, खेत, मैदान सभी तो जगते हैं उसके आने पर। आज ही क्यों, आस्था तो सूर्य को बराबर सजल आँखों से जल देती हैं। अपने अचल के कदम कहीं रुक न जाएं, वाणी को अच्छा दुल्हा मिले, धवल हर दर्जा फर्स्ट पास हो, कलम की नौकरी मिले। उन्होंने आज भी लोटे में कुएँ से जल भर लिया है।"
       यह अंश प्रकृति और मानवीय आशाओं का मेल है। यहाँ सूर्योदय को एक प्राकृतिक घटना से अधिक आस्था और आशाओं के प्रतीक के रूप में दिखाया गया है। भाषा में लयात्मकता और काव्यात्मक प्रवाह दिखता है, जिससे यह पाठक के मन में एक जीवंत चित्र बनाता है। साथ ही, शिक्षा और राजनीति के अंतर्विरोध को तीव्रता से प्रस्तुत किया गया है। उसी प्रकार लेखक ने विश्वविद्यालयों के वातावरण में बौद्धिकता और सत्ता संघर्ष के बीच के विरोधाभास को करीने से व्यक्त किया है। भाषा में जो तीक्ष्णता है, उससे यह सामाजिक विमर्श का हिस्सा बन जाता है-
 
"आज के विश्वविद्यालय शिक्षा के रंग में कम और राजनीति के रंगों में ज्यादा रंगे हुए हैं। अब शिक्षा संस्थान विचारों के मंथन केंद्र नहीं, बल्कि वोट बैंक बनते जा रहे हैं। ... लेकिन क्या ये विचारधाराएँ वास्तव में ज्ञान की ओर ले जा रही हैं या सत्ता के लिए टकरा रही हैं?"
 
- तो दूसरी ओर पारिवारिक प्रेम और भारतीय परंपरा का समन्वय भी परिलक्षित होता है। भाषा में सरलता और भावुकता स्पष्ट रूप से दिखती है, जो पारिवारिक जीवन की सहजता को अभिव्यक्त करती है-
 
"राखी-बंधे हाथों से बेजोड़ स्नेह और चमक का हल्का आभास फूट रहा था। उसके मुँह में एक लड्डू आया, वाणी के पैरों के पास दस रुपये का एक नोट गया। पुलक को तो बस लड्डू निपटाने की देरी थी; वह मुँह में आते ही दस रुपये दीदी के ऊपर फेंककर ग्राम जनपथ की ओर भागा। माँ आंगन में खड़ी होकर धूप की अनहद फुहार का आनंद पी रही थी। स्वस्थ पौधों की तरह बढ़ते भाई-बहन का यह स्नेह उसके आनंद का उत्प्रेरक था।"
 
साथ ही, यह कृति विद्यार्थी जीवन के संघर्ष और अनुशासन को भी दर्शाती है। यहाँ भाषा में यथार्थ और आत्मनिरीक्षण का गहरा मिश्रण देखने को मिलता है, जिससे धवल का चरित्र और उसकी सोच उभरकर पाठकों के सामने आ जाता है-
 
"धवल दिन में पढ़ने का वक्त ज्यादातर नहीं निकाल पाता। पर रात में दो-तीन घंटों की झपकियों भरी पढ़ाई जरूर हो जाती है। विद्या हेतु यह रात्रि-जागरण तीन चरणों में सम्पन्न होता है। एक घंटा भोजन के पहले, एक घंटा भोजन के बाद और एक घंटा, सुबह के पहले। इसमें पूर्व-रात की पढ़ाई सोती आँखों से और उत्तर-रात की पढ़ाई जगती आँखों एवं कनकन मस्तिष्क से होती है।"
 
इस तरह काकुलम की भाषा शैली ग्रामीण संवेदनाओं, बौद्धिक विमर्श, प्रकृति के चित्रण और सामाजिक आलोचना की अनूठी संपृक्ति बन जाती है। कहा जा सकता है कि भरत प्रसाद ने लोकजीवन की सहजता, बौद्धिक विमर्श की जटिलता और अन्तर्मन की भावनाओं की गहराई को अपनी भाषा में बड़ी कुशलता से पिरोया है।
 
यहीं नहीं, काकुलम का शिल्प और संरचना उपन्यास के विमर्शात्मक पहलुओं को सशक्त बनाती है। उपन्यास में फ्लैशबैक और वर्तमान समय के बीच की आवाजाही इंगित करती है कि कहानी केवल एक रैखिक पथ पर नहीं चलती, बल्कि इसमें विभिन्न कालखंडों और दृष्टिकोणों का समागम होता है। यह विधा पाठक को यह अनुभव कराती है कि समय और स्थान के बंधनों से परे भी जीवन की गूढ़ सच्चाइयाँ मौजूद हैं।
 
उपन्यास के एक भाग में पात्रों की आंतरिक यात्रा और मनोवैज्ञानिक संघर्ष को विस्तार से दिखाया गया है। देखिए, एक अंश में धवल के मन में उठते सवालों को किस तरह दर्शाया गया है:
 
"मैं स्वयं को समझने की कोशिश कर रहा हूँ, पर हर मोड़ पर एक नई उलझन है। क्या यह संघर्ष केवल मेरा है या हर उस व्यक्ति का है जो इस बदलते समाज में अपनी पहचान बनाने का प्रयास करता है?"
यह आत्म-चिंतन इस बात का सूचक है कि कैसे व्यक्ति अपने भीतर छिपी भावनाओं, आशंकाओं और आकांक्षाओं के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता है। इसी बीच उपन्यास में विभिन्न पात्रों के संवाद और घटनाक्रम से यह भी उत्प्रेरणा मिलती है कि व्यक्ति का संघर्ष केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक और वैचारिक भी होता है।
अतः हम कह सकते हैं कि भरत प्रसाद का उपन्यास काकुलम पहचान और अस्तित्व के संकट पर केंद्रित एक वैचारिक कृति है, जो छात्र-जीवन और विश्वविद्यालयी राजनीति के बहाने व्यापक सामाजिक द्वंद्व को उद्घाटित करती है। धवल का संघर्ष इस प्रश्न में सिमटता है—“हम कौन हैं?” यही प्रश्न उपन्यास की आत्मा बन जाता है। शीर्षक स्वयं प्रतीक और रहस्य की तरह पाठक को निरंतर आत्ममंथन के लिए विवश करता है। भाषा में ग्रामीण सहजता, बौद्धिक विमर्श और काव्यात्मकता का संगम है, जिससे कथ्य में सघनता और विचार में गहराई आती है। यह उपन्यास समकालीन यथार्थ को महज़ कथात्मक स्तर पर नहीं, बल्कि आलोचनात्मक और दार्शनिक स्तर पर रूपायित करता है। काकुलम इस दृष्टि से हिंदी उपन्यास परंपरा में एक महत्त्वपूर्ण वैचारिक पड़ाव सिद्ध होता है।●

भरत प्रसाद  हिंदी साहित्य के लब्धप्रतिष्ठ कवि, कथाकार उपन्यासकार, और आलोचक हैं।

मो. 9863076138 एसोसिएट प्रोफेसर,  हिन्दी विभाग पूर्वोत्तर पर्वतीय विश्वविद्यालय शिलांग- 793022 (मेघालय)



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