राहतों के नाम पर बेचैनियाँ

Sushil Kumar
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श्वेतवर्णा प्रकाशन से प्रकाशित।


अनामिका सिंह का ग़ज़ल-संग्रह ‘राहतों के नाम पर बेचैनियाँ’ समकालीन हिंदी-उर्दू कविता की उस संवेदनशील और उत्तरदायी परंपरा से जुड़ता है जहाँ सौंदर्य, शिल्प और भाषिक कौशल जीवन के कठोर यथार्थ से अलग खड़े दिखाई नहीं देते। यह संग्रह किसी तात्कालिक आवेग या क्षणिक प्रतिक्रिया का परिणाम नहीं जान पड़ता। इसमें समय अपनी पूरी ऐतिहासिक और सामाजिक गंभीरता के साथ उपस्थित है—अपने अंतर्विरोधों, अपनी निर्ममताओं और उन चुप्पियों के साथ, जिन्हें व्यवस्था ने आदत में बदल दिया है। यहाँ राहत एक आकर्षक शब्द की तरह आती है, पर उसके भीतर छिपी बेचैनी लगातार पाठक को असहज करती रहती है और यही असहजता इस संग्रह की मूल शक्ति बनती है।


इस पुस्तक की ग़ज़लें किसी वैचारिक घोषणापत्र का रूप नहीं लेतीं। यहाँ अनुभव पहले आता है और विचार उसी अनुभव की तह से उभरता है। झुलसती देह, सूखे होंठ, पिता की सीमित सामर्थ्य, रसोई में खटती स्त्रियाँ, रोज़ी की तलाश में भटकते लोग, जाति और धर्म के नाम पर खिंची रेखाएँ—ये सब दृश्य ऐसे सामने आते हैं जैसे कवयित्री उन्हें रच नहीं रही, जीवन से उठा रही हों। इन ग़ज़लों में करुणा है, पर वह आत्मदया का रूप नहीं लेती। स्वर में प्रतिरोध है, पर वह शोर या उत्तेजना में नहीं बदलता। इसी संयम के कारण यह संग्रह अपनी विश्वसनीयता बनाए रखता है और ग़ज़ल की ग़ज़लियत को सुरक्षित रहती है।

अनामिका सिंह की सामाजिक दृष्टि किसी एक केंद्र से संचालित नहीं होती। सत्ता, समाज और व्यवस्था की आलोचना यहाँ किसी तैयार वैचारिक ढाँचे से नहीं आती, वह छोटे-छोटे अनुभवों से जन्म लेती है। भूख और रोज़गार के बीच फँसा मनुष्य, सपनों की सीमाएँ, अन्याय को सहने की आदत में बदलती चुप्पी—इन सबके माध्यम से कवयित्री उस जीवन को सामने रखती हैं जिसे देखने की दृष्टि समाज ने धीरे-धीरे खो दी है। इन ग़ज़लों की ज़मीन वही है जिस पर जनसाधारण खड़ा है और यही कारण है कि पाठक स्वयं को इन पंक्तियों से अलग नहीं कर पाता।

स्त्री-अनुभव इस संग्रह में किसी अलग खंड या सीमित विषय की तरह उपस्थित नहीं होता। वह सामाजिक संरचना के भीतर अंतर्गुम्फित रूप में सामने आता है—घर, रसोई, सड़क, भीड़ और हिंसा के बीच। अनामिका स्त्री को प्रतीक या विमर्श के नारे में नहीं बदलतीं। वह उसे श्रमरत, प्रश्नाकुल और संघर्षशील मनुष्य के रूप में प्रस्तुत करती हैं। इस दृष्टि के कारण ये ग़ज़लें स्त्री-केंद्रित होते हुए भी व्यापक मानवीय अनुभव का विस्तार बन जाती हैं और किसी संकीर्ण दायरे में बँधती नहीं।

जाति और वर्ग की जटिल संरचना इस संग्रह में बिना किसी भाषिक आडंबर के उभरती है। गाँव यहाँ एक समरस इकाई की तरह दिखाई नहीं देता। रास्ते, टोले, विवाह और श्रम—सब कुछ असमानता के दबाव में आकार लेता है। कवयित्री इन स्थितियों को केवल वर्णन से आगे जाकर उनके भीतर छिपे नैतिक प्रश्नों को सामने लाती हैं। पाठक के सामने यह सवाल स्वतः खड़ा हो जाता है कि जिसे सामान्य जीवन कहा जाता है, उसमें कितनी हिंसा और अन्याय चुपचाप शामिल है और हम उसे कब से स्वाभाविक मानते चले आए हैं।

धर्म और आस्था से जुड़े प्रसंग इस संग्रह को और अधिक प्रासंगिक बनाते हैं। यहाँ आस्था मानवीय संवेदना से कटकर किस तरह भीड़, सत्ता और हिंसा का औज़ार बन जाती है, यह बिना अतिरंजन के सामने आता है। मीडिया, प्रशासन और समाज—तीनों की भूमिका एक व्यापक तंत्र के रूप में उभरती है। दोष किसी एक इकाई तक सीमित नहीं रहता, पूरा ढाँचा प्रश्नों के घेरे में आता है। इस दृष्टि से ये ग़ज़लें हमारे समय के नैतिक संकट का दस्तावेज़ की तरह पढ़ी जानी चाहिए है।

भाषा के स्तर पर भी यह संग्रह विशेष ध्यान आकर्षित करता है। अनामिका की भाषा सहज है, पर उसमें गहराई और अनुशासन दोनों मौजूद हैं। उर्दू-हिंदी की साझा परंपरा में खड़े शब्द यहाँ अपने अर्थ के साथ जीवन का भार भी उठाते हैं। अलंकार या चमत्कार पाठक को चकित करने के लिए नहीं आते, वे तभी उपस्थित होते हैं जब अनुभव उनकी माँग करता है। यही कारण है कि कई शेर पाठक के भीतर देर तक गूँजते रहते हैं—

“बहुत छोटी-सी चादर है, ढँके जो पाँव, सर खुलता
पिता औलाद की ख़ातिर भला सपने भी क्या पाले”

“जो चुप रहे वे पच गए लेकिन मुखर हैं जो
वे ही समाज को बड़े अकसर खले हैं लोग”

“सब ही ईमानदार हैं तो बेईमान कौन
ये जानने को इक करे दुनिया जहान कौन”

इन शेरों में जीवन का अनुभव किसी टिप्पणी या उपदेश की तरह नहीं आता, वह भीतर तक उतर जाता है और पाठक को अपनी भूमिका पर सोचने के लिए विवश करता है। यहाँ प्रश्न सजावट के बजाय ज़रूरत बनकर सामने आते हैं।

ग़ज़ल की परंपरागत संरचना के भीतर रहते हुए अनामिका सिंह समकालीन यथार्थ को पूरी दृढ़ता से रखती हैं। शेरों में संवाद की प्रवृत्ति दिखाई देती है—कभी समाज से, कभी सत्ता से, कभी स्वयं से। यह संवाद आत्मकेंद्रित नहीं होता, उसका विस्तार सामाजिक और नैतिक धरातल तक फैला रहता है। संग्रह की ग़ज़लें मनोरंजन या शिल्पाभ्यास से आगे जाकर हस्तक्षेप का माध्यम बनती हैं और अपनी प्रासंगिकता सिद्ध करती हैं।

पुस्तक की बेचैनी में किसी निराशा की व्याप्ति नहीं है। वह सजगता की माँग करती है। कवयित्री पाठक को यह एहसास कराने का उपक्रम करती नज़र आती हैं कि प्रश्न पूछने की आवश्यकता अब भी बनी हुई है, चुप्पी अब भी सबसे बड़ा संकट है और संवेदनहीनता सबसे गहरा नैतिक पतन। यही भाव इन ग़ज़लों को आंतरिक ऊर्जा प्रदान करता है और उन्हें समय और समकालीनता से जोड़ता है।

इस तरह 'राहतों के नाम पर बेचैनियाँ’ समकालीन हिंदी-उर्दू ग़ज़ल में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में सामने आती है। पुस्तक उन पाठकों के लिए विशेष अर्थ रखती है जो कविता से केवल भाषिक कौशल नहीं, अपने समय की गहरी समझ चाहते हैं। कहना चाहिए कि अनामिका सिंह की ग़ज़लें समय से आँख मिलाकर संवाद करती हैं और उसी कारण देर तक स्मृति में बनी रहती हैं। संग्रह यह भरोसा जगाता है कि ग़ज़ल आज भी हमारे समय की एक सजग, संवेदनशील और प्रभावशाली काव्य-विधा बनी रह सकती है, जब वह जीवन के यथार्थ से अपना रिश्ता बनाए रखती हो।
— सुशील कुमार
अनामिका सिंह की कुछ ग़ज़लें 
         [[इसी संग्रह से ]]
(1)

झुलसती देह, सूखे होंठ, पैरों में पड़े छाले
न दिखते हैं उन्हें जिनकी लगे हैं आँख पर जाले

सवालों पर बड़े पहरे, बड़े पहरे सवालों पर
नहीं खुलने हैं यानी अब कभी भी राज़ कुछ काले

बहुत छोटी-सी चादर है, ढँके जो पाँव, सर खुलता
पिता औलाद की ख़ातिर भला सपने भी क्या पाले

वो चंदा चाहती है, काश इक दिन हो कभी ऐसा
ज़रा रफ्तार अपने हौसले को दे, उछल पा ले

तबीयत है बड़ी नासाज़ जल, जंगल, पहाड़ों की
हमारी बदसलूकी ने गगन में छेद कर डाले

चुभी होगी सुई कितनी किसी उँगली में कब सोचा
ख़रीदे मोल कर-करके कभी गजरे, कभी माले

उड़ाकर ले गई है साथ बच्चों की जुराबें तक
हवा थोड़ी-सी माथे पर तो अपने सलवटें डाले

लगाई रेस, साँसे रोककर सीने फुलाए रोज़
सड़क पर नौजवानों ने हुए वे आर्मी वाले

वो अपनी सलवटें माथे की सारी खींचकर रख दे
मकानों में 'अना' अब वो रहे ही हैं नहीं आले

(2)

बदनाम जो गली वहाँ जाते भले हैं लोग
सुनकर दबाते उँगलियाँ दाँतों तले हैं लोग

इक शख़्सियत महज़ जिन्हें है देह भर हुई
किरचें वजूद की हुईं क्या मनचले हैं लोग

जो चुप रहे वे पच गए लेकिन मुखर हैं जो
वे ही समाज को बड़े अकसर खले हैं लोग

हालात से दुखी हुए, दुख से बिखर गये
छत से लटक गए कहीं ज़िंदा जले हैं लोग

बदलाव के लिए वे जो तनहा ही थे चले
उन बा-कमाल लोगों के पीछे चले हैं लोग

चलते तिराहे, चौक पे या बोगियों में देख
रोज़ी की खोज़ में यहाँ कितने गले हैं लोग

कमरा तो एक ही था मगर जितने भी हुए
इक साथ ही सभी वहाँ खाए-पले हैं लोग

ढलते ही शाम घर में मिलें सारी लड़कियाँ
यानी कि साफ है यहाँ कितने भले हैं लोग



(3)

सवाल सौ हैं सामने कोई तो इक जवाब हो
जवाब हो सवाल का न हो तो इंकलाब हो

मगर तमाम डूबकर मरेंगे बोलो किस जगह
यूँ झूठ-मूठ रोओ मत कि आप तो नवाब हो

कमाए क्या, खिलाए क्या है सोचता ये शख्स वो
समय की मार पड़ गई कि जिसपे बेहिसाब हो

सुबह से आधी रात तक खटी हैं जो रसोई में
'किया है क्या' की बात पर हिसाब से हिसाब हो

'अना' अगरचे बोल दे तो होगा कुछ नया नहीं
जनाब आप पहले ही से पूरे बेनकाब हो

गया है भीग वो जो सूखने की एक आस में
सड़क पे जो अनाज उसपे और मत अजाब हो

'अना' भरोसा तोड़कर जो लौटने को कह रहा
ये तुझपे है किसी भी तौर वो न कामयाब हो



(4)

इस आस्था के नाम पे क्या-क्या नहीं हुआ
जो भी हुआ *ये* जान लें अच्छा नहीं हुआ
 
कितने ही आग में जले कितने कुचल मरे
पर मीडिया ने यह कहा- 'ऐसा नहीं हुआ'
 
छह औरतों को रौंद *दिया एक कार ने*
लेकिन हुजूम में कोई ज़िन्दा नहीं हुआ
 
सिर पर उठाए पोटली जो लोग आ गए
वो जा सकेंगे लौट ये वादा नहीं हुआ
 
जो मर गए वो लोग *सभी* मोक्ष पा गए
*ये कहने वालों को* ज़रा सदमा नहीं हुआ!
 
सब इंतज़ाम कर दिए हैं कुंभ आइए"
कोई भी आपसे बड़ा झूठा नहीं हुआ
 
क्या पाप, *क्या है पुण्य ये* समझे हैं लोग कब
धर्मान्धता के मोल पे घाटा नहीं हुआ
 
दरवाज़े खोल हैं दिए लंगर चला रहे
इन्सां इलाहाबाद में उन-सा नहीं हुआ



(5)

सबने देखे हैं नाचते किन्नर
नहीं देखे तो बस थके किन्नर

कोई सूरज सुबह नहीं लाता
फिर भी करते हैं रतजगे किन्नर

देने आते दुआएँ हर घर में
यानी हैं भेद से परे किन्नर

भेद कुनबे सहित करे दुनिया
फिर भी हँसते हैं बावरे किन्नर

देह का क्या कुसूर है बोलो
सोचते होंगे अधबने किन्नर

कितने खाली हैं देते गाली हम
पर दुआओं से हैं भरे किन्नर

आँख की किरकिरी लगें जब भी
आते हैं नेग माँगने किन्नर

भौंहे तानी हैं सारी दुनिया ने
जब भी हक़ के लिए लड़े किन्नर

कितना ख़ुद से लड़ें अकेले वे
कोई बोला क्या, हम खड़े किन्नर

माना हैं चिड़चिड़े, मगर सोचो
तोड़ते हैं क्यों दायरे किन्नर

देह के ये तिलिस्म वश में कब
सोच से हैं कहीं बड़े किन्नर


(6)

लाश पर न्याय माँगने बैठे
इससे पहले कहाँ रहे बैठे!

जो थी ज़िन्दा तो मुँह सिले थे सब
बाद मरने के सब गले बैठे

खड़ी इक पाँव पे वो सदियों से
कोई आदम है जो कहे- बैठे?

साथ देता कोई ज़रूरत पर
उस समय सब रहे सगे, बैठे

ज़ुल्म की दी ख़बर थी बेटी ने
चुप्पियों ने कहा सहे,बैठे

उठ खड़े होंगे जब भी चाहेंगे
आज हम मौज में भले बैठे 

ये ‘अना‘ यों नहीं कमाई है
इससे सहमे हैं जलजले बैठे



(7)

जो दीवारों के सर पे कान होते
भरोसे तब कहाँ आसान होते

समझदारी दिखाई दिल ने मेरे
बड़े वरना यहाँ नुक़सान होते

हमें कोई गणित आता नहीं था
अगर आता, किसी की जान होते

तबाही कर हुआ अफ़सोस होगा 
नहीं तो क्यों थमे तूफान होते

इलेक्शन की टसल होती नहीं तो
जले न गाँव के खलिहान होते 

हमें फ्लैटों में कैसे नींद आती
अगर सो ही गये दरबान होते

बड़ा गाढ़ा है वो चुप ही रहेगा
रहें कब तक हमीं हलकान होते

लुभातीं ख़ुशबुएँ उसको अगर तो
'अना' हम भी हुए लोबान होते

हमें इन मुश्किलों ने टफ किया है
नहीं तो हम 'अना' आसान होते



(8)

सब ही ईमानदार हैं तो बेईमान कौन
ये जानने को इक करे दुनिया जहान कौन

इसमें छिपाने की है भला बात क्या बता
मत दे सफाई है पता कि किसकी जान कौन

जो देखते हैं ध्यान से हर ज़ुल्म, हर सितम
वो सोचते हैं बेवजह खोले जुबान कौन

हम रस्सियों पे झूल गये ज़िंदगी से हार
तो हौसले के नाम पे देगा बयान कौन

पंखों को टोह रोज़ नए हौसले के साथ
देखें कि रोक पाता है तेरी उड़ान कौन

सुख-दुख रहे हैं साथ ही जीवन में इस तरह
पकड़े हुए पता नहीं किसकी कमान कौन

होगी वजह कुछ और भी मन में दबी हुई
रखता है दोस्तों का भला इतना ध्यान कौन

हर कोई दूसरों की तरह चाहे दीखना
होना है चाहता ‘अना' अपने समान कौन



(9)

जाहिल हैं, नीच हैं कहें बिल्कुल गँवार हैं।
वामन, अहीर को जहाँ दिखते च मार हैं।

ठाकुर खड़े हैं रास्तों को रोक-रोक कर,
दूल्हे कहीं जो भूल से घोड़ी सवार हैं।

पत्तल उठाएँ और जनावर मरे हुए ,
ये सिर्फ़ और सिर्फ़ सिर्फ़ कामदार हैं।

टोले अलग बसे हैं भले गाँव एक है,
बिटिया के ब्याह में रहे सूने दुआर हैं।

अब आप ये कहेंगे कि अब ऐसा कुछ नहीं,
तो मानिए कि आपके वो ही विचार हैं।

दावे सभी हैं झूठ, सभी झूठ आँकड़े,
सच है ज़मीर हम सभी के दागदार हैं।

तुझको मिलेगी दाद नहीं, है ये तय 'अना',
सच और उसपे तुर्रा ये तीखे अश'आर हैं।

(10)

नसीबों की हुई चर्चा जहाँ भी बात आयी
किसी के हिस्से दिन आया किसी के रात आयी

कभी जो भूल से होंठों पे हक़ की बात आयी
हथेली की दो गालों पर छपी सौगात आयी

कठिन ही था उसे जब प्यास लेकर और जीना
घड़े और आदमी के बीच फिर-फिर जात आयी

मुहब्बत किस तरह परवान चढ़ती ऐ ज़माने!
कहीं मज़हब कहीं भौंहें सिकोड़े जात आयी

निवालों पर न रोज़ी पर हुई चर्चा अभी तक
मगर नागा बिना हाकिम के मन की बात आयी

जहाँ तुम भी न आये थे, जहाँ हम भी न आए
वहाँ पर भी हुए हैं दिन, वहाँ भी रात आयी



(11)

जो कर रहे सवाल वे हैं सब रडार पर 
हम आ गये हैं देख लो कैसे कगार पर

संगीन ज़ुर्म होते रहे जिसपे ही सदा
फोड़े गये हैं ठीकरे उसके कपार पर

जीते जी रो सकी न है अश्लील हर वो आँख
फिर झूठ-मूठ रोये जो जाकर मजार पर 

बूँदें बिखर के भी ये बड़ा काम कर गयीं
रख दी तपी ज़मीन की सूरत सँवारकर

हमको लगा था होगा वो पक्का ज़ुबान का
अफ़सोस! वो भी आ गया चेहरा उतारकर

आँखें कभी जो हो गयीं नम फ्लैशबैक से
यादें हैं आ गिरीं मेरे मन के कछार पर

रोटी, ज़मीन, नौकरी सबकुछ निगल लिया
सत्तानशीन लेते नहीं हैं डकार पर

हासिल किसी को है यहाँ भरपूर तामझाम
कुछ जी रहे हैं आज भी रोटी-अचार पर

कोई तड़प रहा भी हो तो वीडियो बने
सम्वेदनाएँ मौन हैं क्यों चीत्कार पर

- अनामिका सिंह


परिचय -
अनामिका सिंह

 
परिचय -
 
नाम- अनामिका सिंह 


जन्म तारीख - 09 अक्टूबर 1978
जन्मस्थान -इन्दरगढ़ जिला कन्नौज 
वतर्मान निवास - शिकोहाबाद, फिरोजाबाद
माता – श्रीमती देशरानी 
पिता – श्री श्रीकृष्ण यादव 
शिक्षा - परास्नातक विज्ञान एवं समाज-शास्त्र, बी.एड.
संप्रति -शिक्षा विभाग उत्तर प्रदेश में कार्यरत
अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में नियमित ग़ज़लें / नवगीत प्रकाशन




प्रकाशित कृतियाँ
_____________
 
'न बहुरे लोक के दिन’ नवगीत संग्रह (बोधि प्रकाशन -(2021)
 
नवगीत संग्रह-अँधेरा कुछ तो होगा दूर ( बिम्ब प्रतिबिम्ब प्रकाशन )
 
'अक्षर अक्षर हव्य 'दोहा संग्रह’श्वेतवर्णा प्रकाशन (2024)
 
‘ उम्मीदों के गीत-पंख ‘ गीत संग्रह (2024) श्वेतवर्णा प्रकाशन 
 
‘ राहतों के नाम पर बेचैनियाँ ‘ ग़ज़ल संग्रह

सम्पादन-
————-
 
‘आलाप’ समवेत नवगीत संकलन (2023) शुभदा बुक्स प्रकाशन
 
' सुरसरि के स्वर' समवेत छंद संकलन , श्वेतवर्णा प्रकाशन (2020)

सम्पादन -
'अंतर्नाद' साहित्यिक पत्रिका  
सह-सम्पादन ‘कल्लोलिनी’ साहित्यिक पत्रिका
 
सम्पादक/ संचालक ‘ कंदील ‘ समकालीन कविता पर एकाग्र साहित्यिक समूह
 
लेखन विधा – ग़ज़ल एवं नवगीत
 
पता -
अनामिका सिंह
स्टेशन रोड गणेश नगर , शिकोहाबाद
जिला –फिरोजाबाद, पिन 283135 (उ.प्र.)
yanamika0081@gmail.com
सम्पर्क सूत्र-9639700081


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