[वागर्थ पत्रिका के अप्रैल 2026 अंक में प्रकाशित]
1 — टिकट
सात मंजिले मॉल में समय का कोई अर्थ नहीं था। ऊपर से नीचे तक सब कुछ तेज रोशनी में ऐसे जवान हो रही थी मानो दिन और रात की दूरी मिट गई हो। विज्ञापन की स्क्रीनें चेहरों पर नाचती हुई रंगीन झिलमिलाहट छोड़तीं और स्पीकरों से रह-रहकर घोषणा होती — “अब शांति भी अनुभव करें… बेसमेंट लेवल पर।”
आर्या ठंडी कॉफ़ी पीते हुए वही आवाज़ सुन रही थी। उसे लगा, दिन भी विज्ञापन की तरह बार-बार दोहराया जा रहा है — वही मीटिंगें, वही मुस्कराहटें, वही नकली गर्मजोशी। एस्केलेटर के पास पहुँचकर उसने दिशा-संकेत पर बिजली की धारियों में घूमता एक बड़ा सा साइनबोर्ड देखा — पीस लाउंज – लेवल -1. वह अनायास रुक गई, जैसे शांति (पीस) शब्द ने उसे भीतर हल्का सा छू लिया हो।
नीचे उतरते ही शोर छँटने लगा — कदमों की आहट, बच्चों की हँसी, दुकानों के कनफोड़ संगीत — सब पीछे छूट गए। बेसमेंट में हल्की ठंडक थी और दीवारों पर नीली धुँधली रोशनी फैल रही थी। बीचों-बीच एक पारदर्शी केबिन था, जिस पर लिखा था — शांति लाउंज – पाँच मिनट का पूर्ण मौन अनुभव; नीचे छोटे अक्षरों में लिखा था — कृपया अपनी आवाज़ अपने भीतर रखें। शीशे के पार दो-तीन आकृतियाँ धुँधली दिखीं। उसने फोन साइलेंट किया और काउंटर की ओर बढ़ी।
काउंटर के पीछे बैठी युवती ने बिना मुस्कराए नियम बताया —
“अंदर पाँच मिनट का मौन रहेगा। फोन, घड़ी या कोई भी आवाज़ की चीज बाहर छोड़नी होगी। कमरे में ध्वनि-अवशोषक पैनल लगे हैं, बाहर की कोई आवाज़ अंदर नहीं आएगी। अंदर एक आईना और एक टाइमर है ।जब बीप बजेगा, दरवाज़ा अपने आप खुल जाएगा।”
“और टिकट?”
“तीन सौ रुपये।”
आर्या ने कार्ड बढ़ाया। मशीन ने सफ़ेद पर्ची उगली — कोने में नीला अंक, 5 मिनिट्स की शांति। युवती ने वह पर्ची उसके हाथ में रखते हुए कहा, “सेशन 23. दाहिनी ओर।”
काँच के दरवाज़े के पार हल्की रोशनी थी। उसने हैंडल दबाया और भीतर गई। अंदर जाते ही सब आवाज़ें थम गईं। ग्रे दीवारें, फर्श पर गोल रोशनी, बीच में एक कुर्सी और सामने बड़ा आईना। उसके किनारे छोटी डिजिटल घड़ी झपक रही थी।
वह कुर्सी पर बैठ गई। पाँच मिनट की उलटी गिनती 5:00 से नीचे उतरने लगी। हर सेकंड में उसे लगा, भीतर कुछ खुलता जा रहा है। पहले मिनट में उसने खुद को देखने की कोशिश की; दूसरे में आँखें झुका लीं; तीसरे में अंदर जैसे बहुत धीमी फुसफुसाहट सुनी — एक ऐसा स्वर, जिसे उसने बहुत समय से दबा रखा था। वह चौंकी नहीं, बस मौन में उस आवाज़ को सुनती रही। तभी बीप हुई और दरवाज़ा खुल गया।
बाहर की हवा हल्की गर्म थी और उसी स्पीकर से फिर वही घोषणा हुई। युवती ने औपचारिक स्वर में पूछा — “कैसा अनुभव रहा?”
आर्या ने उत्तर नहीं दिया; बस मुड़ी हुई पर्ची को हथेली में दबा लिया। कागज़ की सलवटों में उसे लगा — शायद यही शांति का असली रूप है: जिसे पकड़ना मुश्किल है, पर छोड़ना असंभव। एस्केलेटर से ऊपर जाते हुए उसकी नज़र फिर नीचे के साइनबोर्ड पर जा टिकी — शांति लाउंज – पाँच मिनट का मौन अनुभव।
काँच से उसका चेहरा नीली रोशनी में कुछ देर धुँधला दिखा, फिर उसके आगे बढ़ने के साथ धीरे-धीरे ओझल हो गया।
2 — कतार
अगले हफ़्ते वह फिर शाम को उसी मॉल में लौटी। एस्केलेटर से नीचे उतरते ही बेसमेंट की ठंडी हवा उसकी त्वचा को छू गई। काउंटर से कुछ कदम पहले एक पीली पट्टी थी, जिसके साथ लगे डिस्प्ले पर क्रमांक चमक रहे थे। कतार स्क्रीन बोर्ड के नीचे से मुड़कर उस कोने तक पहुँचती थी जहाँ एक छोटा संकेत था — साइलेंट जोन। लोग अपने टिकटों को थामे खड़े थे। कोई आँखें मींचे था, कोई फर्श की टाइलों की रेखाएँ गिन रहा था, कोई दीवार पर लगे साइनबोर्ड को पढ़ रहा था। फोन एक मेज़ पर जमा हो रहे थे और लेज़र स्कैनर टिकटों पर आयतें बना रही थी।
आर्या कतार के मध्य हिस्से में थी। सामने एक लंबा, दुबला आदमी खड़ा था — वही, जिसे उसने पहली बार नीचे जाते समय देखा था। चेहरे पर नींद की कमी थी, आँखों के नीचे हल्की नीलापन और हाथों में स्थिरता। वह बिना हिले-डुले खड़ा था, जैसे उसकी पूरी उपस्थिति उन पाँच मिनिट्स के इंतज़ार में केंद्रित हो।
आर्या को लगा वह चेहरा पहले कहीं देखा है। अचानक ही एक पुराना दृश्य उसकी स्मृति में कौंध गया — एक ऑफिस, जहाँ काँच की दीवारों के पार नीऑन लाइट की ठंडी सफ़ेदी फैली थी। एक लंबी टेबल पर अधूरे डिज़ाइन बिखरे थे और उन पर झुके हुए थे दो लोग — वह खुद और अमित।
वे दोनों कभी एक ही विज्ञापन एजेंसी में संपादक थे — आर्या तेज़ और स्पष्ट बोलने वाली, अमित संकोची और संयत। उनके बीच शब्दों की बहस चलती रहती, पर उसमें आपसी सम्मान भी था। फिर एक दिन किसी अभियान को लेकर विवाद हुआ। आर्या ने कहा था —
“खामोशी बेचने से कुछ हासिल नहीं होगा। विज्ञापन में आवाज़ चाहिए — ऊँची और असरदार।”
अमित ने उत्तर दिया —
“कभी-कभी मौन भी विचार होता है, आर्या। हर शोर अर्थ नहीं देता।”
उस दिन जो बहस शुरू हुई, वहीं पर खत्म भी हो गई। मीटिंग स्थगित हुई और उनके बीच संवाद रुक गया। धीरे-धीरे दोनों अलग दिशाओं में चले गए, जैसे दो शब्द किसी एक वाक्य से बाहर निकलकर अपना अर्थ खो दें।
अब वही अमित इस शांति लाउंज की कतार में खड़ा था। वह दृश्य आर्या को अजीब लगा — जिस व्यक्ति ने कभी मौन को अर्थ कहा था, वह अब उसी मौन को अनुभव करने यहाँ आया है। जब स्क्रीन पर उसका नंबर चमका, उसने दरवाज़े की ओर कदम बढ़ाए। क्षणभर के लिए सिर उठा और उनकी नज़र मिली। उस एक पल में कुछ अनकहा लौट आया — पुराना विवाद, अधूरी बातें और वह खिंचा हुआ मौन जो दोनों के बीच अब तक विद्यमान था।
कतार धीरे-धीरे सरकती रही। लोग शब्दों से नहीं, आँखों और साँसों से संवाद कर रहे थे। मॉल की छत से आती मशीनों की मंद आहट उस क्षेत्र में एक पृष्ठभूमि बनाती रही। सुरक्षा-गार्ड हर थोड़ी देर में दोहराता, “मोबाइल बाहर, घड़ी बाहर, आवाज की कोई भी चीज अंदर नहीं ले जानी है।” लोग चुपचाप पॉलीथिन में सब रखकर आगे बढ़ते। काउंटर के पीछे बैठी युवती पुराने अभ्यास से कार्ड खींचती, टिकट काटती और बारी-बारी से नंबर पुकारती रही। उसके पीछे काँच की दीवार के पार लगी रोशनी में अंदर का कमरा हल्की सफ़ेद रोशनी में डूबा दिख रहा था।
सामने खड़े अमित ने अपनी पर्ची उलट दी। कोने में छपा नंबर था — 19. आर्या के हाथ में 20. उस क्षण दोनों की नज़र मिली और फिर एक अनकही पहचान-सी बन गई, जैसे वे दोनों अब किसी एक ही इंतज़ार का हिस्सा हों। कतार में सबसे आगे सूट पहने एक व्यक्ति अपने कागज़ पर कुछ लिख रहा था। किसी औरत ने बाँह में छोटा बैग दबा रखा था और एक युवा लड़के के कान में ईयरफ़ोन लगे थे। पर किसी ने कोई बात नहीं की। इस मौन में भी हर चेहरे की अपनी लय और धुन थी।
कुछ देर बाद अमित काउंटर तक पहुँचा। स्क्रीन पर उसका नंबर उभरा और हरी बत्ती ने रास्ता दिखा दिया। उसने टिकट स्कैन कराया और दरवाज़े की ओर बढ़ते हुए एक क्षण सिर उठाया। आर्या की नज़र उस पल दुबारा उससे मिली। उन आँखों में उसने अपना पुराना झगड़ा, अधूरी बातें और लंबा ठहराव देख लिया। फिर दरवाज़ा खुला और वह भीतर चला गया। एक मिनट बीता, फिर दूसरा। बाहर खड़े चेहरों पर हल्की बेचैनी और उत्सुकता फैलती रही। अचानक कमरे से बीप की हल्की ध्वनि आई; हरी बत्ती जली और दरवाज़ा खुला। अमित बाहर आया। चेहरे में वही गहराई थी, पर उसकी चाल मंद हो गई थी जैसे किसी भार से मुक्त हो। उसने टिकट स्कैन कराया और बिना इधर-उधर देखे आगे बढ़ गया। आर्या की आँखें उसके पीछे कुछ क्षण तक ठहरी रहीं।
अब आर्या का नंबर चमका। युवती ने उसकी ओर सिर हिलाया। आर्या ने टिकट पकड़ा और दरवाज़े के पास पहुँची। काँच के पार कमरे की ग्रे दीवार में शांति सिमटी लग रही थी, जिस पर किसी शब्द की ज़रूरत नहीं थी। वह अंदर जाने से पहले पल भर को मुड़ी। कतार में खड़े चेहरे अलग-अलग थे, पर उनके भीतर एक ही तरह की चुप्पी थी — जैसे सब किसी अनदेखी दहलीज़ पर खड़े हों। उसने महसूस किया कि इस जगह का सबसे बड़ा रहस्य कमरे के भीतर नहीं, दरवाज़े की दहलीज़ पर है — जहाँ बाहर का शोर और भीतर का मौन एक-दूसरे को लगभग छूते हैं। फिर उसने हैंडल दबाया और भीतर चली गई।
3 — आईना
कमरे की हवा ठंडी और स्थिर थी। इस बार जब आर्या भीतर आई, उसने तुरंत आईने में नहीं देखा। कुर्सी पर बैठते हुए उसे लगा जैसे भीतर कोई हल्की तरंग उतर रही थी। बाहर का शोर मिट चुका था, पर भीतर कुछ था जो धीमे स्वर में बोल रहा था। उसे महसूस हुआ — मौन के भीतर भी आवाज़ें हैं, वे जो हम हर दिन दबाते रहते हैं। उसने हाथ बढ़ाकर काँच छुआ; उँगलियों की नमी से एक हल्की रेखा उभरी और वह उस निशान को देखती रही, जो अदृश्यता और उपस्थिति के बीच ठहरा हुआ था।
टाइमर की लाल रोशनी पाँच मिनिट्स से नीचे उतरती रही। हर सेकंड किसी स्मृति जैसा लग रहा था। उसके मन में बारिश और पिता की थकी साँसों की याद लौटी — वह पुराना कमरा, जहाँ उसने पहली बार महसूस किया था कि चुप्पी शब्दों से भारी हो सकती है। उसे लगा आईने में एक और छाया है — जैसे कोई पीछे खड़ा हो, जबकि वह जानती थी कि वह अकेली है। तभी टाइमर पर चार मिनिट्स बारी बारी से चमके और पांचवें मिनट के बाद बीप हुई, पर दरवाज़ा नहीं खुला। कुछ देर बाद दूसरी बीप सुनाई दी, जिसमें कोई लय थी — मानो कोई भीतर से कह रहा हो, “रुको।” उसने आँखें बंद कर लीं। भीतर किसी ने फुसफुसाया — “यादें सिर्फ वही नहीं होतीं जो बची रहती हैं, वह भी होती हैं जो लौट आती हैं।”
उसने आँखें खोलीं तो उसके चेहरे पर एक शांति जैसी आभा उतर आई थी। उसने अपने आप से पूछा—“क्या मैं अब भी किसी को ढूँढ रही हूँ?” आईना चुप रहा, पर दीवार पर गिरती रोशनी का रुख बदल गया। फिर बीप हुई और दरवाज़ा खुल गया। बाहर आते ही युवती ने पूछा — “कैसा अनुभव रहा?”
आर्या मुस्कराई — “थोड़ा लंबा।”
युवती ने सिर उठाया, फिर झुका लिया — “कभी-कभी सिस्टम रुक जाता है।”
एस्केलेटर के पास रुककर आर्या ने मुड़ा हुआ टिकट खोला। ऊपर की भीड़ की आवाज़ें लौट आईं, पर उसे लगा, शांति कोई बाहर की जगह नहीं, बल्कि उसके भीतर ही उसके अक्स रहते हैं। ।
4 — अन्य चेहरे
इस बार आर्या थोड़ी जल्दी आई थी। शाम अभी पूरी तरह ढली नहीं थी और मॉल की दीवारों पर सुनहरी रोशनी ठहरी हुई थी। बेसमेंट की हवा अब परिचित लगती थी — ठंडी और स्थिर। प्रतीक्षा-कक्ष में कुछ कुर्सियाँ थीं, जिन पर लोग अपने पाँच मिनट का इंतज़ार कर रहे थे। निगाहें सबकी अलग-अलग थीं, पर भीतर एक ही उत्सुकता थी; मौन और शांति अभी से उनके बीच उतरने लगे थे। कुर्सियों के पास श्रीवास्तव अंकल बैठे थे — सफ़ेद शर्ट, मोटा चश्मा और मुस्कान में आदत का सा ठहराव। उनकी पत्नी को गुज़रे पाँच साल हो चुके थे। उन्होंने कहा —
“हर बार वही पाँच मिनट, पर लगता है कुछ छूट गया।” आर्या ने उत्तर दिया —
“शायद हम जिसे भूलना चाहते हैं, वही लौट आता है।”
वे मुस्कराए नहीं; बोले — “मैं अपनी पत्नी की हँसी भूल गया हूँ। अंदर जाता हूँ तो बस वही याद दिलाती है।”
उनके शब्दों ने आर्या को भीतर तक छू लिया।उसे लगा, यह जगह भूलने आए लोगों की नहीं, बल्कि उनकी है जो भूल नहीं पा रहे।
एक कोने में एक बच्ची बैठी थी — गोद में पुराना रिकॉर्डर लिए। उसकी उँगलियाँ बार-बार बटन पर टिकतीं, पर कोई आवाज़ नहीं उठती। पास ही उसकी माँ मोबाइल में कुछ भर रही थी। कुछ देर बाद माँ भीतर चली गई और कुछ मिनटों बाद लाल आँखों और शांत चेहरे के साथ लौटी। उसने बच्ची का हाथ थामा और कहा —
“चलो, घर चलते हैं।”
बच्ची ने सिर झुकाया, रिकॉर्डर बंद किया और माँ के साथ बाहर चली गई।
आर्या यह सब देखती रही। उसे लगा, मौन सिर्फ कमरे के भीतर नहीं, प्रतीक्षा-कक्ष में भी मौजूद है — यहाँ मौन खुद उतर आता है। अपने नंबर से पहले उसने दीवार पर लिखा वाक्य पढ़ा — “प्लीज़ कीप योर वॉइस इनसाइड।” अब यह उसे आदेश नहीं, एक रूपक लगा; अपनी आवाज़ को भीतर रखने का मतलब अब बदल चुका था।
अंदर कुर्सी पर बैठकर उसने महसूस किया — यह मौन सिर्फ़ उसका नहीं, सबके भीतर फैला हुआ एक साझा सन्नाटा है, जो शांति का रूपक है। शोर से थके लोग यहाँ आकर अपने भीतर की आवाज़ सुनते हैं — कुछ भूलने, कुछ याद करने और कुछ यह समझने कि भूलना भी एक स्मृति है।
पाँच मिनट बाद जब वह बाहर आई, प्रतीक्षा-कक्ष खाली था। कुर्सियाँ व्यवस्थित पंक्ति में थीं, हवा शांत थी। उसने बिना कुछ सोचे एस्केलेटर की ओर कदम बढ़ाए — इस बार भीतर की शांति उसके साथ चल रही थी। जाते हुए उसे लगा — लाउंज के भीतर जितनी शांति थी, उससे ज़्यादा अर्थ उन चेहरों में था जो बाहर बैठे कुछ सुनने की कोशिश कर रहे थे।
मसलन, वह बच्ची बाहर बैठकर भी भीतर से जितनी शांत लग रही थी, उतनी शांत आर्या शायद भीतर कभी नहीं हो पाई।
5 — टाइमर
उस दिन मॉल का उजास कुछ और था — बल्बों की दूधिया रोशनी आँखों पर ठहरती-सी लग रही थी, पर बेसमेंट में उतरते ही प्रकाश मद्धम पड़ गया। काउंटर पर टिकट लेते हुए उसने देखा कि मशीन की नीली रेखा कुछ पल झपकी, फिर स्थिर हो गई। युवती ने सिर उठाया — “सिस्टम थोड़ा धीमा है आज।” उसने टिकट लिया — नंबर 17 — और भीतर चली गई।
कमरे की दीवारों पर हल्की, स्थिर रोशनी थी — ठंडी पर साफ़, जैसे सब कुछ थम गया हो। वह कुर्सी पर बैठी। सामने वही आईना, किनारे पर वही रोशनी। टाइमर चमकने लगा — 5:00… 4:59… 4:58… हर बीतता सेकंड उसके भीतर उतरने लगा। तीसरे मिनट में अचानक एक झिलमिलाहट उठी — जैसे कमरे की छत में लगी लाइट ने पलक झपकी हो। टाइमर की रेखाएँ ठहर गईं। 4:12 पर अंक जम गए। न बीप, न टिक। हवा में कोई गति नहीं रही। कमरे की नमी गाढ़ी लगने लगी। उसने धीरे से श्वास छोड़ी और हथेली कुर्सी की बाँह पर रख दी। पहले उसे लगा यह मशीन का दोष है। फिर भीतर कहीं एक अस्पष्ट स्वर फूटा — कोई वाक्य नहीं, बस धीमी ध्वनि। उसने उस स्वर को सुना — “अब लौट सकती हो।” उसी क्षण उसे याद आया — “कभी-कभी मौन भी विचार होता है।” उसी आवाज़ के साथ कमरे की हवा हल्के से हिली। टाइमर की रेखाएँ फिर चमकने लगीं — 4:11, 4:10, 4:09… बीप हुई — हल्की, पर स्पष्ट — और दरवाज़ा खुल गया।
बाहर आते ही युवती ने स्क्रीन से सिर उठाया — “अंदर थोड़ी देर के लिए सिस्टम फ्रीज़ हो गया था, पर अब सब ठीक है। डरने की ज़रूरत नहीं।”
आर्या ने मुस्कराकर कहा — “मैं डरी नहीं।”
वह एस्केलेटर की ओर बढ़ी। टिकट उसकी हथेली में था और कागज़ की सतह पर उसकी उँगलियों की हल्की गरमाहट रह गई थी — जैसे किसी ने अभी-अभी उसे थामा हो। उसने मुड़कर लाउंज के काँच की ओर देखा। भीतर की रोशनी अब स्थिर थी, पर उसकी सतह पर एक पतली लकीर चमक रही थी — ठीक उसी बिंदु पर जहाँ टाइमर रुका था। उसने धीरे से कहा — “समय जितना रुका, शांति उतनी सच्ची लगी।”
उसने टिकट मोड़कर जेब में रख लिया। ऊपर जाते हुए भीड़ की आवाज़ें लौट आईं, पर उनमें अब कोई लय नहीं थी। उसके भीतर जो ठहराव था, वही अब उसकी असली ध्वनि बन चुका था।
6— दरवाज़े के पार
बेसमेंट की हवा अब पहले जैसी ठंडी नहीं लग रही थी। आर्या फिर उसी एस्केलेटर से नीचे उतरी; इस बार कतार छोटी थी, कुछ परिचित चेहरे गायब थे। उसने बिना सवाल के टिकट लिया — सेशन 45 — और महसूस किया कि यह पर्ची अब बीते सत्रों की स्मृति है। उसने उसे हथेली में दबाया और दाहिने दरवाज़े की ओर बढ़ी।
कमरे के भीतर सब वैसा ही था — धुँधली रोशनी, बीच में कुर्सी, सामने आईना — पर इस बार उसने आँखें बंद नहीं कीं। हवा हल्की थी। कुर्सी पर बैठते हुए उसने अपनी छाया आईने में देखी; अब मुस्कान प्रयास नहीं थी और आँखों की गहराई बदल चुकी थी। टाइमर टिमटिमा रहा था, पर वह उसे न देख रही थी, न सुन रही थी — अब समय उसके लिए बहाव था, मानो दीवारों का रंग धीरे-धीरे बदल रहा था और सीमाएँ धुँधली हो रही थीं। आईना पारदर्शी होता गया। भीतर से एक स्वर उठा — “तुम्हें अब कुछ सुनने की ज़रूरत नहीं। जो सुनना था, वह तुम्हारे भीतर ही है।”बीप हुई। दरवाज़ा खुला, पर वह तुरंत उठी नहीं; कुछ क्षण वह वहीं बैठी रही, जैसे एक ही समय में बाहर भी थी और अपने भीतर भी। जब वह उठी, कमरे का रंग लगभग पारदर्शी हो चुका था। उसने आईने की ओर देखा — वहाँ अब कोई चेहरा नहीं था, सिर्फ़ एक रोशनी थी जो उसकी आँखों की रेखा से दीवार तक फैल रही थी। वह बाहर आ गई।
बाहर कतार में दो लोग थे। युवती ने पहली बार मुस्कराकर पूछा — “सब ठीक रहा?”
“हाँ,” आर्या ने कहा और टिकट उसके सामने रख दिया।
एस्केलेटर की ओर बढ़ते हुए उसने ऊपर से आती आवाज़ों को एक नई लय में सुना — कॉफ़ी मशीन की फुफकार, जूतों की आहट, दूर गिटार की धुन — सब किसी अदृश्य संगीत में घुल रहे थे। मॉल की दीवार में अपना प्रतिबिंब देखते हुए उसने पाया कि चेहरा अब साफ़ और स्थिर था, पर पीछे अब भी एक हल्की छाया थी। उसने मुस्कराहट को काँच पर टिकते और फिर धुंध में घुलते देखा।
बाहर कदम रखते ही नमी भरी हवा और दूर गाड़ियों की गूँज थी, पर वे उसे छूती नहीं थीं। उसने जेब से एक पुराना टिकट निकाला — सेशन 17 — जिसकी स्याही अब धुँधली पड़ चुकी थी। उसने उसे उँगलियों के बीच मरोड़ा; कागज़ के चटकने की हल्की आवाज़ किसी पुराने द्वार के बंद होने जैसी लगी। उसने पर्ची हवा में छोड़ दी; वह धीरे-धीरे एस्केलेटर से उतर गई। चलते-चलते उसने एक बार पीछे देखा — काँच के पार नीली रोशनी अब भी जल रही थी। उसे लगा, वहाँ कोई बैठा है — शायद वह खुद, या वह मौन जो कभी समाप्त नहीं होता। वह आगे बढ़ी; मॉल की रोशनियाँ पीछे छूट गईं। रात खुल चुकी थी और शहर की आवाज़ें अब शांति जैसी लग रही थीं।
बाहर सब कुछ वैसा ही था; गाड़ियों का शोर, लोगों की भीड़... पर अब ये सभी आवाज़ें उसके भीतर मौजूद उस गहरी शांति को भंग नहीं कर पा रही थीं। बस उसके भीतर का शोर थम चुका था। उसके भीतर अब कोई आवाज़ नहीं थी।●
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सुशील कुमार
13 सितम्बर, 1964, पटना सिटी (बिहार)
कवि-लेखक
निरंतर राष्ट्रीय स्तर की प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशन ।
प्रकाशित कृतियाँ:
– कविता संग्रह: कितनी रात उन घावों को सहा है (2004), तुम्हारे शब्दों से अलग (2011, हिंद युग्म, दिल्ली), जनपद झूठ नहीं बोलता (2012, हिंद युग्म, दिल्ली), हाशिये की आवाज (2020, लोकोदय प्रकाशन, लखनऊ), पानी भीतर पनसोखा (2025, लोकोदय प्रकाशन, लखनऊ)
– आलोचना: आलोचना का विपक्ष (2019, लोकोदय प्रकाशन, लखनऊ), हिंदी ग़ज़ल का आत्मसंघर्ष (2021, प्रलेक प्रकाशन, दिल्ली)
– पर्यावरणीय कृति: बाँसलोई में बहत्तर ऋतु (2025, हिंद युग्म, दिल्ली)
जिला शिक्षा पदाधिकारी, दुमका के पद से 30 सितंबर 2024 में सेवानिवृत्त।
डाक-पता: हंसनिवास, कालीमंडा, दुमका (झारखंड) – 814101
ई-मेल: sk.dumka@gmail.com
मोबाइल न.: 7004353450 / 9006740311










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