इस दास्तान का नैरेटर इसे 'कहानी' का दर्जा देने से साफ़ इनकार करता है। उसकी दलील है कि इसके मुख्य पात्र में नायकत्व की कोई पात्रता नहीं, न ही वे किसी बंधी-बंधाई भूमिका का निर्वाह करते हैं। गोया यह किरदार कहानी के तयशुदा फ्रेम को तोड़कर, कथावस्तु की हदों को लांघकर, कहीं दूर छिटक जाना चाहता है। यहाँ घटनाएँ घटित होने से कतराती हैं; वे बस एक सन्नाटे की तरह पसर जाती हैं। दृश्य बेरंग हैं, उदास हैं, क्योंकि यहाँ समय की कोई आमद-ओ-रफ़्त नहीं; जैसे समय को अब इस कोने की कोई सुध ही न रही हो।
नैरेटर जानता है कि यही जड़ता, यही बेरूखी इसे एक 'किस्सा' बनने से रोकती है, फिर भी वह इसे आकार देने पर तुला है—ठीक उस ठूँठ वृक्ष की तरह, जो वर्षों से वीराने में कंकाल-सा, अपनी ही जिद पर खड़ा हो। जहाँ न कोई पंछी सुस्ताता है, न कोई बटोही छाँव की आस में रुकता है, मगर उसका हठ है कि उसे 'वृक्ष' ही माना जाए!
सच कहूँ तो यहाँ बसंत ने कभी दस्तक़ दी ही नहीं। ऋतुएँ आईं और इसे अनछुआ छोड़कर, बेहद करीब से गुज़र गईं। यह अफ़साना ही अजीब है। वे पिता तो थे, मगर 'पिता' की किसी भी परिभाषा में कभी अँट नहीं पाए। उनकी संतानें थीं, पत्नी थीं, भरा-पूरा परिवार था, फिर भी वे नितांत अकेले रहे। हमेशा समय से निर्वासित, और पिछले पचास वर्षों से—स्वयं से भी।
जिस चौराहे को मैं बचपन से ट्रकों, टेम्पो, रिक्शों और सब्ज़ीवालों के कोलाहल के लिए जानता था, अब वहाँ एक और चीज़ स्थायी हो चुकी है—पिता की चुप्पी। उस ठूँठ पेड़ की तरह अविचल।
गाँव के रास्ते पर शहर से आने वाली मुख्य सड़क जैसे ही मोड़ काटकर हमारे कस्बे की पसलियों में उतरती है, वहीं लोटन चाय वाले की पुरानी गुमटी है। टीन की टेढ़ी छत, धुएँ से स्याह पड़े खंभे और सामने पड़ी दो लकड़ी की बेंचें। बरसों से कितने लोग इन बेंचों पर बैठते और उठते रहे कि लकड़ी घिसकर बीच से थोड़ी धँस गई है। उन्हीं बेंचों में एक पर पिता दिन में सात–आठ बार आकर बैठते हैं। इतने सालों में मैंने कभी उन्हें चाय का गिलास थामे नहीं देखा। वे बस बैठते हैं—कभी किनारे, कभी बीच में—और अपनी पथरायी आँखों से सड़क को ताकते रहते हैं। उन आँखों में प्रतीक्षा तो है, पर चेहरा किसी भाव की गवाही नहीं देता।
दुकानदार उन्हें पहचानता है, पर संवाद का सेतु टूट चुका है। उसने कोशिश की थी, बहुत पहले, जब इस सिलसिले की शुरुआत हुई थी।
“बाबूजी, क्या हाल है?”
उस दिन पिता ने सिर उठाकर उसे देखा, होंठों पर हरकत हुई, पर शब्द मौन रहे। थोड़ी देर बाद सड़क को घूरते हुए बोले— “आज शोर बहुत है।”
दुकानदार ने हँस दिया था— “शोर तो रोज़ रहता है।”
पिता ने उसे दोबारा देखा, मानो पहचानने की कोशिश कर रहे हों, फिर नज़रें बचाकर सड़क पर लौट गए। उस दिन के बाद से दुकानदार ने सवाल पूछना छोड़ दिया। अब वह चौराहे की रोज़ की भीड़ में उन्हें ऐसी परिचित उपस्थिति मानने लगा है जिस पर किसी की नजर अलग से नहीं टिकती।
मैं जब भी घर लौटता हूँ, मेरी नज़र सबसे पहले उसी चाय की दुकान को टटोलती है। अगर पिता वहाँ बैठे दिख जाएँ, तो साँस में साँस आती है—शुक्र है, वे कहीं गायब नहीं हुए! अगर नहीं दिखते, तो कलेजा मुँह को आ जाता है—कहीं इस बार उन्होंने कोई और, अनजाना रास्ता तो नहीं पकड़ लिया?
माँ हमेशा हिदायत देती हैं— “उन्हें टोकना मत। जब मन भरेगा तो खुद लौट आएँगे।”
मैं झुंझलाता हूँ— “आखिर दिन में सात-आठ बार क्यों? चाय-पान का तो शौक है नहीं उन्हें!”
माँ की आवाज़ में बेबसी होती है— “उन्हें गिनती कहाँ याद रहती है कि कितनी बार गए, कितनी बार आए।”
उनका यह आना-जाना अब घर की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है—एक ऐसा चलन जिसकी वजह कोई समझ नहीं पाता, पर जो हर दिन वैसे ही बना रहता है।
पिता पहले ऐसे नहीं थे। मैं बहुत छोटा था, फिर भी मुझे इतना तो याद है वह दौर, जब सुबह पाँच बजे वे हैंडपंप की चरमराहट के साथ जग जाते थे। फिर खुले आँगन की बुहार, स्टील के लोटे की खनक, दूर किसी कुकर की सीटी, बकरियों की मिमियाहट—इन सबके बीच पिता की आवाज़ सबसे बुलंद और सजीव होती थी। वे माँ को पुकारते, हम भाइयों को हड़काते, खेत का हाल सुनाते। दूधवाले और सब्ज़ीवाले से एक-एक पैसे पर बहस करते, हिसाब लेते और अख़बार पटकते हुए कहते— “दुनिया नहीं बदलेगी। सब झूठ का पुलिंदा है।” तब उनकी हर बात पर घर में एक जीवंत बहस छिड़ती थी।
उन दिनों मुफलिसी थी, मगर पिता की आँखों में एक अजीब-सी आँच थी। दुनिया चाहे जैसा सुलूक करे, उन्हें यकीन था कि पसीने से तकदीर की इबारत सँभाली जा सकती है। वे अपने दम पर जूझते रहे।
फिर वक्त ने करवट ली।
मंडी में अनाज के दाम गिरे, कर्ज़ का फंदा कसने लगा। छोटे किसान ज़मीनें बेचकर शहरों की ओर पलायन करने लगे। लेकिन पिता ने कस्बे में ही खूँटा गाड़ने की ठानी। नगरपालिका में अस्थायी नौकरी कर ली—कभी सफ़ाई की निगरानी, कभी पानी की लाइन की मरम्मत, कभी चुनाव ड्यूटी। तनख़्वाह मामूली थी, पर घर किसी तरह चलता रहा।
इसी जद्दोजहद में बड़ा भाई इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए शहर गया। फीस भरने के लिए पिता ने माँ की वह सोने की बाली बेच दी जो उनकी शादी की निशानी थी। उस दिन पहली बार मैंने पिता को चुप देखा। वह चुप्पी, जिसके आगे उम्मीद की कोई रोशनी नहीं दिखती; बस 'स्वीकार' का एक भारी पत्थर उनके सीने में आ धँसा। पिता की आँखों का वह आत्मविश्वास दरकने लगा था, वहाँ एक झीनी लकीर खिंच गई थी। लेकिन वे चलते रहे—दफ़्तर, कतारें, बिल, राशन, फीस—सबको अपने कंधों पर लादे हुए। अनवरत अभावों से लड़ते हुए।
फिर वह साल आया जो हमारे परिवार के इतिहास में काले अक्षरों से दर्ज हो गया। भाई का रिज़ल्ट खराब हो गया, नौकरी नहीं लगी। दूसरा भाई बीमार पड़ा। मेरी पढ़ाई भी छूटने की कगार पर आ गई। तकादे, गालियाँ, दबाव और शिकायतें घर की चौखट लांघकर भीतर आ गईं।
उसी साल नगरपालिका ने अस्थायी नियुक्त कर्मियों की छँटनी की। नया अफ़सर आया, पुरानी नियुक्तियाँ रद्द हुईं और पिता अचानक सड़क पर आ गए।
लेकिन असली हादसा यह नहीं था।
असली हादसा वह शाम थी, जब वे घर लौटते समय रास्ते में ही 'खो' गए।
माँ देहरी पर दीया जलाकर इंतज़ार करती रहीं। रात गहरा गई, पिता नहीं आए। हमने हर संभावित जगह छान मारी। भोर की पहली किरण के साथ वे लौटे। कपड़ों पर धूल जमी थी, चेहरा राख जैसा सफ़ेद और मटमैला, जैसे किसी गहरी चिंता ने उन्हें भीतर से खोखला कर दिया हो।
माँ ने काँपते स्वर में पूछा— “कहाँ थे?”
वे शून्य में ताकते रहे, फिर बोले— “पता नहीं... बस बैठा रहा।”
“कहाँ?”
“उधर, सड़क के किनारे... लोग गुजरते रहे... लगा कोई अपना बुलाएगा, कहेगा—चलो घर।”
माँ अवाक रह गईं— “कौन बुलाता? घर तो यही है।”
पिता ने घर की दीवारों को ऐसे देखा जैसे किसी सराय में खड़े हों, सब कुछ अनजाना। कुछ पल बाद, बहुत मद्धम आवाज़ में स्वीकारोक्ति आई— “हाँ... अब पहचान में आ रहा है।”
उस शाम उनके भीतर कुछ ऐसा खिसक गया, जो फिर कभी अपनी जगह पर नहीं लौटा। 'सिजोफ्रेनिया' शब्द हमारी शब्दावली में बहुत बाद में दाखिल हुआ। शुरू में हमें लगा, यह सिर्फ उदासी है। गरीबी और बेकारी का अवसाद। पर फिर, वे ऐसे व्यवहार करने लगे जो हमारी समझ से परे थे।
कभी आधी रात को उठकर बरामदे में बैठ जाते और शून्य से संवाद करने लगते।
“खेत की मेड़ ठीक करवा लेना।”
“बीज मोटा रखना, वरना फसल मारी जाएगी।”
“कुएँ के पास से घास हटाओ, साँप छिपता है वहाँ।”
हम जाग जाते। माँ घबराकर उन्हें झकझोरतीं— “किससे बातें कर रहे हैं?”
वे चौंकते, माँ को अजनबी की तरह देखते, पहचान और भ्रम के बीच कुछ पल झूलते, और फिर चुपचाप लेट जाते जैसे कुछ हुआ ही न हो।
एक-दो बार हमने उन्हें हवा में मुट्ठियाँ भींचते, किसी अदृश्य दुश्मन से लड़ते देखा—
“तुमने कभी पूछा भी कि घर का हाल क्या है? बस अपना हिसाब रखते रहे!”
जब ऐसा होता, माँ हमें इशारे से कमरे में लौटा देतीं। अगले दिन वे बिल्कुल शांत होते, जैसे कोई तूफ़ान उनके भीतर से गुज़र चुका हो।
समय के साथ यह 'हालत' दिनचर्या बन गई।
चौराहे की वह चाय की दुकान धीरे-धीरे उनका शरणस्थल बन गई। घर में जरा-सी खटपट होती तो वे बाहर निकल जाते। दुनिया वहाँ चाय पीती, सिगरेट फूँकती, राजनीति बतियाती, मगर पिता इन सबसे निरपेक्ष, बस सड़क को ताकते रहते।
एक बार छुट्टियों में घर आया, तो मैंने पूछ ही लिया— “आप वहाँ दिनभर क्या खोजते हैं?”
उनकी आँखों में एक पल के लिए गजब की स्पष्टता कौंधी। बोले— “रास्ता। आदमी को सब कुछ छोड़ देना चाहिए, पर रास्ता नहीं छोड़ना चाहिए।”
मैंने बात को हलका करने के लिए मुस्कुराकर कहा — “पर वहाँ से जाने वाली गाड़ियाँ हमारे गाँव नहीं जातीं।”
वे फीका मुस्कुराए— “अब कौन-सा गाँव बचा है?”
फिर वही सन्नाटा। मैं कई बार टटोलता कि वे किस उधेड़बुन में हैं, किसका डर है उन्हें? पर वे या तो चुप रहते या बात का रुख मोड़ देते।
एक दिन माँ ने कहा— “डॉक्टर को दिखाना होगा। यह उदासी नहीं, कुछ और है।”
सरकारी अस्पताल की वह लंबी, उबाऊ कतार। सीलन भरी दीवारें और दुनिया से ऊबा हुआ कंपाउंडर।
डॉक्टर ने पूछा— “जन्म का साल?”
पिता ने सोचा, फिर बोले— “जब बाढ़ सबसे ज़ोर की आई थी, उसी साल।”
तारीख़ नदारद थी।
“आज दिन कौन-सा है?”
“मंगलवार। हनुमान जी का दिन।” (जबकि वह शुक्रवार का दिन था)।
डॉक्टर ने माँ से उनका इतिहास पूछा, नींद और तनाव का ब्यौरा लिया। फिर पर्चे पर घसीटमार अक्षरों में दवाइयाँ लिखीं और कहा—
“ये दवाइयाँ नियमित दीजिए। वक्त लगेगा। यह मन की बीमारी है। नाम भारी है—सिजोफ्रेनिया। पर मरीज को ‘पागल’ मत कहिएगा, मन टूट जाता है।”
‘सिजोफ्रेनिया’—शब्द पहले तो किसी विदेशी फल जैसा लगा, सुना तो था पर चखा नहीं। अब पता चला कि गंभीर मानसिक रोग है। धीरे-धीरे वह हमारे घर के राशन, बिजली बिल और कर्ज़ के बीच एक और अदृश्य बोझ-सा बन गया।
दवा शुरू हुई। शुरू में लगा कि सुधार है। बड़बड़ाहट कम हुई। पर दवा का असर इतना भारी था कि उनींदापन पूरे दिन बना रहता। उनके भीतर की बची-खुची रोशनी भी बुझने लगी। न हँसी, न गुस्सा। बस एक पथराया हुआ भाव— 'ठीक है, ठीक है'।
दवाइयों के दुष्प्रभाव बढ़े। हाथ काँपने लगे, चेहरे पर जड़ता आ गई। डॉक्टर ने डोज घटाई, पर कोई स्थायी सुधार नहीं हुआ।
हमारी हैसियत नहीं थी कि किसी बड़े प्राइवेट अस्पताल का रुख करते। सरकारी अस्पताल का अपना ही नरक था—पूरा दिन, किराया, धक्के, भीड़ और डॉक्टर की बेरुखी।
धीरे-धीरे घर के भीतर सबने यह मौन स्वीकृति दे दी कि पिता किसी ऐसी दुनिया में जा चुके हैं जहाँ से वापसी संभव नहीं। हम सिर्फ़ इतना कर सकते हैं कि रोज़ उन्हें गिरने से बचाएँ।
पड़ोसियों के लिए यह तमाशा और दया का मिलावटी रूप था।
कोई तंज कसता— “बाबूजी फिर चौराहे पर थे, चौकीदारी कर रहे हैं क्या?”
कोई सहानुभूति उड़ेलता— “बेचारे का दिमाग बैठ गया, जिम्मेदारियों के बोझ से।”
कोई सलाह देता— “ओझा को दिखाओ, यह डॉक्टर का काम नहीं।”
लेकिन सबसे गहरी चोट वह शब्द देता जो लोग लापरवाही से उछाल देते— “पगला गए हैं तुम्हारे बाबूजी।”
माँ इस शब्द से सिहर जातीं। पिता का हर अजीब व्यवहार उनकी अपनी ज़िंदगी का हिस्सा था, पर "पगला" शब्द सुनते ही उनका चेहरा बुझ जाता।
एक दिन यह शब्द मेरे कानों में भी पड़ा। चाय की दुकान पर दो लोग हँस रहे थे—
“अरे वो बूढ़ा तो दिन भर ऐसे बैठता है, जैसे चौराहा उसी के नाम कर दिया गया हो।”
दूसरे ने कहा—“सिजोफ्रेनिया कहते हैं इसे। सुने हो? असली में तो पागलपन ही है।”
उस क्षण मुझे लगा कि जब कोई कठोर शब्द किसी अपने पर लगाया जाता है, तो वह भाषा नहीं रहता—सीधा ज़ख़्म बन जाता है।
मैं काफ़ी देर तक पिता से नज़र नहीं मिला पाया। वे वहीं बैठे थे, निर्विकार। मुझे यकीन था उन्होंने नहीं सुना, पर भीतर से लगता रहा कि दुनिया की हर कठोर टिप्पणी उनकी चेतना पर खरोंच मार रही है।
सबसे भयावह दिन वह था, जब पिता घर से निकले तो वापस लौटे ही नहीं। ऐसा दूसरी बार हुआ था। माँ ने सोचा, शायद किसी रिश्तेदार के यहाँ गए होंगे। दोपहर ढली, शाम हुई, रात गहरा गई। बिस्तर खाली रहा।
मैं पागलों की तरह मोटर साइकिल दौड़ाता रहा—चौराहा, बस अड्डा, गलियाँ, पड़ोसियों के घर। दिमाग में अनहोनी के दृश्य तैरने लगे—रेल की पटरी, नदी, तेज रफ़्तार ट्रक, पास का ब्रिज।
रात के दो बजे पुलिस का फोन आया।
“आपके पिता का नाम...?”
मैंने हाँ कहा।
“उन्हें हमने हाईवे के पास पाया। कुछ बोल नहीं रहे। बस सड़क को देख रहे हैं।”
“कोई चोट...?”
“शरीर को नहीं। दिमाग को तो आप लोग देखिए।”
हम उन्हें रात में ही घर ले आए। रास्ते भर वे खामोश रहे।
घर पहुँचकर माँ ने पूछा— “कहाँ चले गए थे?”
उन्होंने झुककर चप्पलों की धूल झाड़ी और दूर देखते हुए बोले—
“कोई रास्ता पकड़ लिया था, लगा घर वहीं होगा... पर घर दिखा ही नहीं।”
तब मुझे बोध हुआ कि ‘घर’ अब हमारे लिए चार दीवारों वाला मकान है, पर पिता के लिए वह 'समय' का एक बिंदु है जो मिट चुका है। वे जिस घर को खोजते हैं, वह उनके बचपन का कच्चा आँगन है—बैलों की घंटियों की आवाज़ और मिट्टी की वही खुली जगह जहाँ उनकी यादें अटक गई हैं। वह घर अब न नक्शों में है, न ज़मीन पर। वह सिर्फ़ उनके सिजोफ्रेनिया ग्रस्त दिमाग में है, और वह इतना वास्तविक है कि हमारा मौजूदा घर उनके लिए एक झूठ बन गया है।
अब पिता पचहत्तर के हैं। शरीर जर्जर है, चाल लड़खड़ाती है, पर चौराहे की हाजिरी नहीं छूटती।
सुबह उठते हैं, और किसी अदृश्य पुकार पर घर के दरवाजे की ओर चल देते हैं। धीरे से चौराहे वाली सड़क की ओर। माँ जलते चूल्हे के पास से देखती हैं, पर टोकती नहीं।
चौराहे की चाय दुकान वाली उस बेंच पर उनकी जगह अब 'आरक्षित' है। कोई और वहाँ बैठता भी है, तो उनके लिए वह कोना छोड़ देता है।
वे वहाँ बैठते हैं, गाड़ियों और भीड़ को देखते हैं। कभी किसी बच्चे को देख उनके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान आ जाती है—शायद अपना बचपन याद आता हो।
दुकानदार अब उन्हें “काका” कहता है, पर बात नहीं करता। संवाद की खाई बहुत गहरी हो चुकी है।
एक शाम मैं उनके बगल में जा बैठा। हम दोनों चुपचाप सड़क देखते रहे। मैं सोचता रहा, आखिर पिता देखते क्या हैं?
अचानक वे बोले— “हर गाड़ी कहीं न कहीं तो जाती होगी?”
मैंने हाँ में हाँ मिलाई।
उन्होंने फिर पूछा— “तुम्हारा भाई किधर गया है? वो बड़ा वाला?”
मैं चुप रह गया। बड़ा भाई शहर में रम गया था—नौकरी, शादी, नया घर।
मैंने संक्षेप में कहा— “काम पर हैं।”
वे बुदबुदाए— “लौटने में उसे हमेशा देर होती थी। बचपन में भी।”
फिर उनकी आँखों में एक चमक उभरी, जैसे कोई फिल्म चल पड़ी हो—
“एक दिन वो आएगा। कहेगा—बाबूजी, चलो, खेत देखते हैं। देखें कितना पानी है, कैसी मिट्टी है।”
मैंने मन ही मन सोचा—जिस बेटे की आस में पिता चौराहे पर बैठे हैं, वह शायद अब कभी वापस उस 'गाँव' में नहीं लौटेगा।
उस पल मुझे महसूस हुआ कि इस बीमारी का नाम सिजोफ्रेनिया कम है, यह उस 'दूरी' का नाम है जो एक-दूसरे से बेइंतहा जुड़े लोगों के बीच गहरी होती खाई से उग आती है।
मुझे शहर लौटना था। विदा लेने गया तो शाम ढल रही थी। सड़क पर पीली रोशनी के छींटे फैल रहे थे।
“मैं कल जा रहा हूँ, बाबूजी।”
उन्होंने मेरी ओर देखा, आँखों में क्षण भर के लिए पूरी पहचान उतर आई।
“कब आएगा?”
“पता नहीं।”
वे सोचते रहे, फिर बोले— “तुम जहाँ भी रहो, रास्ता मत भूलना।”
मैंने हँसने की कोशिश की— “रास्ता अब तो गूगल मैप पर भी है।”
वे समझे नहीं, पर मुस्कुराए। फिर बोले—
“हमने ज़िंदगी भर एक भारी गलती की। घर बचाने की चिंता में रास्ते बदलते रहे। अंत में घर ही हाथ से निकल गया।”
यह कोई शिकायत नहीं थी, बस मौसम के हाल जैसा एक सीधा और सरल तथ्य था।
“आपको 'घर' कहाँ लगता है अब?”
उन्होंने बस स्टॉप की ओर इशारा किया।
“उधर कहीं... जहाँ से आवाज़ आती है कि लौट आओ। पर जब जाते हैं, तो वहाँ कोई नहीं मिलता।”
मैंने पहली बार जाना कि सिजोफ्रेनिया केवल दिमाग का रोग नहीं। यह वह अवस्था है जिसमें आदमी अपने ही भीतर कई खानों में बँट जाता है। कुछ आवाज़ें, कुछ दृश्य ऐसे उभरते हैं जो बाहर हैं ही नहीं। सच और झूठ की सरहदें मिटने लगती हैं। स्मृति, डर और कल्पना मिलकर एक ऐसी दुनिया रचते हैं जहाँ पहुँचना आसान है, पर जहां से लौटना नामुमकिन। यह उस पुकार का नाम है जो लगातार बुलाती है, पर पहुँचने पर वहाँ सन्नाटा मिलता है।
महीने बीत गए। काम का बोझ। घर आना नहीं हुआ।
फोन पर माँ की अपडेट्स आती रहीं— “आज चौराहे गए थे”, “आज लड़े थे”, “आज चुप थे”।
फिर एक दिन माँ की रुलाई के साथ फोन आया।
“आज तुम्हारे बाबूजी गिर पड़े। किसी ने घर छोड़ा है।”
मैं शहर से भागा-भागा घर पहुँचा।
पिता बिस्तर पर थे, आँखें बंद, साँसें भारी। घर की हवा में एक अजीब-सा बोझ था।
मैंने माथे पर हाथ रखा। आँखें खुलीं। शायद पहचान लिया।
“आ गए?”
“हाँ, बाबूजी।”
होंठ हिले, पर आवाज़ बहुत क्षीण थी— “रास्ता लंबा होता जा रहा है।”
मैंने उनके हाथ थाम लिए। मन हुआ कह दूँ कि अब कहीं जाने की जरूरत नहीं—यह बिस्तर, यह कमरा ही उनका घर है।
पर उनकी स्मृति में घर किसी और ही जगह अटका रह गया था, जहाँ यह कमरा पहुँच ही नहीं पाता था।
उस रात चौराहे पर सन्नाटा था। बारिश की रिमझिम के बीच दुकानदार ने बेंच भीतर खींच ली।
“काका आज नहीं आए,” उसने नौकर से कहा। “तबीयत नासाज़ होगी।”
नौकर ने उदासी से कहा— “वे तो रोज़ आते थे। जैसे हाजिरी के बिना दिन पूरा न हो।”
दुकानदार ने बीड़ी का धुआँ छोड़ा—
“कुछ लोगों के लिए दुनिया का मानचित्र यही चौराहा होता है। इनके लिए यही घर है, यही खेत है, यही बस-स्टैंड है।”
उसे क्या पता था कि घर के भीतर एक बूढ़ा आदमी लेटा हुआ छत देख रहा है, और उसकी आँखों में उस चौराहे से कहीं अधिक विशाल, कहीं अधिक गहरा कोई दृश्य चल रहा है।
शायद वह किसी ट्रक की हेडलाइट देख रहा है जो उसे गाँव छोड़ने आया था।
शायद वह बचपन की पगडंडी पर चल रहा है।
शायद वह उस घर की देहरी पर है जहाँ कोई कह रहा है— “कहाँ रह गए इतने दिन?”
कुछ दिनों बाद एक सुबह उन्होंने साँस लेना छोड़ दिया।
कोई शोर नहीं, कोई चीख नहीं, कोई संघर्ष नहीं।
बस आँखें छत से हटकर स्थिर हो गईं।
दुनिया की भाषा में कहें तो हृदय-गति रुक गई।
पर मुझे लगा कि उनके भीतर घूमता हुआ वह जटिल, टूटा हुआ नक्शा अंततः किसी एक बिंदु पर ठहर गया।
अंतिम संस्कार के बाद मैं अकेला चौराहे पर गया।
दुकान वही, बेंच वही, लोग वही।
पर बेंच के कोने पर धूल की एक परत गवाह थी कि बैठने वाला जा चुका है।
दुकानदार ने मुझे देखा। “काका चले गए।” उसने कहा।
मैंने सिर हिलाया।
वह कुछ पल चुप रहा, फिर बोला— “साहब, इतने सालों में मैंने उन्हें कभी चाय पीते नहीं देखा। बस प्रतीक्षा करते देखा।”
मैं उसी बेंच पर बैठ गया। गाड़ियाँ, शोर, भीड़—सब वही था।
पर मुझे एक अलग खामोशी सुनाई दे रही थी—वह खामोशी, जो किसी ने बीमारी के नाम पर उनके हिस्से में लिख दी थी।
आँखें मूँदीं, तो लगा दूर से उनकी आवाज़ आ रही है— “चलो, खेत देखते हैं।”
आँखें खोलीं तो सामने सिर्फ़ भागती हुई दुनिया थी। पिता कहीं नहीं थे।
फिर भी लगा जैसे चौराहे पर उनका एक हिस्सा हमेशा रहेगा—
बेंच के उसी कोने पर, जहाँ से उनकी आँखें सड़क के बीचोंबीच किसी चिर-प्रतीक्षा में बिछी रहती थी। वहाँ से हर रास्ता गुजरता तो है, पर कोई भी उस 'घर' तक नहीं पहुँचता है जो सिजोफ्रेनिया की भूलभुलैया में कहीं खो गया था।
घर लौटते हुए भीतर गहरी टीस-सी उठी।
मैंने मन ही मन कहा—
किताबों में इसका नाम भले सिजोफ्रेनिया हो,
हमारे लिए इसका एक ही अर्थ रहेगा—
पिता का चौराहा।●
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सुशील कुमार



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