बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में हिन्दी कथा-साहित्य जिन युगांतरकारी परिवर्तनों से गुज़रा, मोहन राकेश उन परिवर्तनों के सजग साक्षी भर नहीं रहे, उन्होंने उनके निर्माण में सक्रिय और निर्णायक भूमिका भी निभाई। ‘नई कहानी’ आंदोलन ने कथा को अतिरंजित भावुकता या घटना के भँवरजाल से निकालकर आधुनिक मनुष्य की जटिल स्थितियों, संबंधगत तनावों और नैतिक दुविधाओं के क्षेत्र में स्थापित किया। इस अर्थ में मोहन राकेश की कहानी-दृष्टि रचनाकर्म का कोई अति उत्साहपूर्ण या आवेगमय हिस्सा नहीं रही, प्रत्युत् उसमें एक विकसित आलोचनात्मक विवेक और सैद्धांतिक दृढ़ता का ही बल रहा , जो कहानी को जीवन के स्थूल समाजशास्त्रीय चित्रण से ऊपर उठाकर एक गहन मानवीय अनुभव में रूपांतरित करती है। शताब्दी वर्ष के इस सोपान पर खड़े होकर जब हम उनकी दृष्टि का सिंहावलोकन करते हैं तो पाते हैं कि उन्होंने हिंदी कहानी को एक ऐसा परिपक्व और गंभीर कोण प्रदान किया, जहाँ से देखने पर वह केवल स्थूल यथार्थगत सामाजिक व्याप्तियों का साधन न रहकर समकालीन मनुष्य की नियति और अस्तित्वगत जटिल प्रश्नों से मुठभेड़ करने वाला साधन बन सकी। वस्तुत: मोहन राकेश की कहानी-दृष्टि को समझने का साफ अर्थ है—प्रेमचंदोत्तर हिन्दी कहानी के उस संक्रमण काल को समझना, जहाँ कथा-साहित्य परंपरागत 'किस्सागोई' से मुक्त होकर 'अनुभूति' की प्रामाणिकता में रूपांतरित हो रहा था। नई कहानी पर राकेश के निबंधों और समकालीन परिचर्चाओं को पढ़ने से यह स्पष्ट होता है कि वे कहानी को परंपरा से विच्छिन्न न मानकर, उसे युगानुकूल विकास के अगले सोपान के रूप में देखते थे। उनके लिए 'नई कहानी' का अर्थ अतीत का निषेध नहीं, अपितु उस संचित चेतना की नई अभिव्यक्ति थी, जो बदलते हुए परिवेश और मानवीय संकटों को नए कलेवर और अधिक सूक्ष्म भाषा में वहन करने में समर्थ हो। अधिक सूक्ष्म भाषा से यहाँ तात्पर्य है एक ऐसी भाषा जो कहानी में निहित पात्रों और वातावरण के सृजन में पाठकों के मन पर मनोवैज्ञानिक दबाव लाने में सक्षम हो।
राकेश की कथा-दृष्टि का सबसे सशक्त पहलू वह समन्वयवादी भूमि है, जिसे उन्होंने यशपाल के सामाजिक यथार्थवाद और अज्ञेय की व्यक्तिवादी सांकेतिकता के बीच निर्मित किया। उन्होंने लक्ष्य किया कि प्रेमचंद के बाद हिन्दी कहानी दो ध्रुवों में बँट गई थी—एक तरफ स्थूल सामाजिकता थी और दूसरी तरफ वायवीय वैयक्तिकता जो पश्चिमी अस्तित्ववादी दर्शन से कहीं न कहीं प्रभावित थी। राकेश ने अपनी दृष्टि को इन दोनों के संश्लेषण पर एकाग्र किया। उनका स्पष्ट मत था कि आज की कहानी की सिद्धि 'भारतीय जीवन के सामाजिक यथार्थ' की मांसल भूमि पर खड़े होकर 'सांकेतिक प्रभावान्विति' का निर्वाह करने में है। वे यथार्थ को त्यागकर संकेतों के अमूर्त आकाश में भटकने के पक्षधर नहीं थे और न ही वे कलात्मकता की कीमत पर सपाटबयानी को स्वीकारते थे। उनकी दृष्टि में, कहानीकार को जीवन के ठोस धरातल—जिसे वे 'जीवन की मांसल भूमि' कहते हैं—पर रहते हुए भी अपनी बात को अभिधा में न कहकर, एक सूक्ष्म 'सजेशन' या संकेत द्वारा संप्रेषित करना चाहिए। यही कारण है कि उनकी दृष्टि में भीष्म साहनी, निर्मल वर्मा और कमलेश्वर जैसे समकालीन रचनाकार इसलिए महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि वे अपनी कहानियों में यथार्थ और संकेत के इस द्वंद्व को साधने का प्रयास करते हैं।
कहानी के प्रयोजन और उसके मूल चरित्र को लेकर मोहन राकेश की सोच पारंपरिक ढांचों से सर्वथा भिन्न थी। उनका मानना था कि कल तक कहानीकार 'अद्भुत', ‘आदर्शवादी यथार्थ’ और 'मनोरंजक' की खोज में रहता था, किन्तु आज प्रश्न 'खोज' का न होकर 'पहचान' का है। यह पहचान जीवन की उन ठोस वास्तविकताओं की है जो हमारे आसपास बिखरी पड़ी हैं। एक लेखक को कथानक ढूँढ़ने के लिए किसी सुदूर हवाई द्वीप या सिंगापुर जाने की आवश्यकता नहीं है। राकेश के अनुसार, जिस राह से दो चरण गुजर जाते हैं, उस राह की धूल पर भी एक कहानी लिखी जा सकती है; घर के दरवाजे पर लटकती चिक या फर्श पर बिछी दरी भी एक कहानी का विषय हो सकती है। यह दृष्टि कहानी को 'किस्सा तोता-मैना' के स्तर से उठाकर जीवन के गहन अनुभव-खंडों के स्तर पर ले आती है। राकेश मानते थे कि लेखक को अपने निजी वातावरण को छोड़कर अपरिचित लोकों में कथानक खोजने का प्रयास नहीं करना चाहिए, क्योंकि ऐसी रचनाओं में वह 'ग्राह्यता' और शक्ति नहीं आ पाती जो यथार्थ की निरायास प्रेरणा से प्राप्त होती है। वे इस बात पर बल देते थे कि साधारण से साधारण वस्तु और घटना में भी एक इतिहास और दृश्य छिपा होता है, बस लेखक के पास उसे पहचानने वाली दृष्टि होनी चाहिए।
शिल्प के स्तर पर मोहन राकेश की दृष्टि पारंपरिक 'क्लाइमेक्स' या नाटकीय मोड़ की अवधारणा को अस्वीकार करती है। वे मानते थे कि कहानी में प्रभाव-सिद्धि के लिए घटनाओं को कृत्रिम रूप से किसी विस्फोटक अंत तक ले जाना आवश्यक नहीं है। आधुनिक मानव का द्वंद्व अब बाह्य घटनाओं के कोलाहल में नहीं, वरन् मन की उन 'सपाट' और साधारण दिखने वाली प्रतिक्रियाओं में घटित होता है, जो ऊपर से शांत दिखती हैं। राकेश की कथा-दृष्टि में 'माइक्रो-डिटेल्स' या सूक्ष्म ब्यौरों का विशेष महत्त्व है। वे यह भी मानते थे कि वातावरण की एक ध्वनि, एक गंध या मन की एक हल्की-सी प्रतिक्रिया उस द्वंद्व को खड़ा करने में समर्थ है, जिसे पहले बड़ी घटनाओं द्वारा दिखाया जाता था। उनकी दृष्टि में कहानी अब केवल कथा नहीं कहती, वह एक वातावरण का निर्माण करती है जहाँ चरित्र और परिवेश एक-दूसरे में घुल-मिलकर संवेदना को आकार देते हैं। यह दृष्टि हिंदी कहानी को स्थूलता से सूक्ष्मता की ओर ले जाने वाली एक अभिनव पहल थी। वे स्पष्ट करते हैं कि आज का कहानीकार घटनाओं को आकस्मिक मोड़ देकर सस्ता कौतूहल नहीं जगाना चाहता, इसके विपरीत वह मानसिक व्यापारों के बीच ही उस द्वंद्व का निर्माण करता है।
कथ्य के चयन में राकेश की दृष्टि 'साधारणता' के अन्वेषण पर टिकी है। यहाँ वे उस पलायनवादी प्रवृत्ति पर भी कड़ा प्रहार करते हैं जो शहरों की 'सड़ांध' और संकुलता से घबराकर गाँवों में एक काल्पनिक 'स्वस्थ जीवन' की तलाश करती है। राकेश, जो स्वयं एक शहरी संवेदनशीलता के रचनाकार थे, पूरी दृढ़ता से स्थापित करते हैं कि जीवन एक इकाई है। नगर और ग्राम के भेद से जीवन स्वस्थ या अस्वस्थ नहीं होता। आज के यथार्थ का सही चित्रण करने के लिए लेखक को इसी संकुलता, इसी भीड़-भाड़ और इसी तथाकथित 'सड़ांध' के बीच जीने वाले मनुष्य की जिजीविषा और उसके अंतर्संघर्ष को पकड़ना होगा। वे मध्यवर्गीय जीवन को केवल कुंठाओं का पुंज मानने से इनकार करते हैं और उसमें छिपी मानवीय कोमलता और ऊर्जस्विता को रेखांकित करते हैं। उनका प्रश्न था कि क्या शहरों के मध्यवर्गीय जीवन में कुछ भी स्वस्थ नहीं है? क्या उन घुन खाए इंसानों के भीतर कहीं भी मानव-सुलभ कोमलता शेष नहीं है? राकेश का विश्वास था कि मानव की जो शक्ति आज के जीवन को ऊर्जा दे सकती है, वह इसी सड़ांध से संघर्ष करके निखरेगी। अतः पलायन कोई समाधान नहीं है। लेखक को जीवन के हर प्रकोष्ठ—चाहे वह गाँव हो या नगर—में सक्रिय शक्तियों के प्रभाव को समझना होगा।
मोहन राकेश ने अपनी आलोचनात्मक दृष्टि में यशपाल जैसे वरिष्ठ कथाकारों की सीमाओं को भी रेखांकित किया। उन्होंने माना कि यशपाल ने मध्यवर्ग की विसंगतियों पर प्रहार तो किए, परन्तु उनका यथार्थ 'एकांगी' था। यशपाल को नग्नता के चित्रण का इतना आग्रह रहा कि वह कई बार एक 'फोबिया' सा प्रतीत होता था। राकेश का मत था कि केवल कुत्सित ही यथार्थ नहीं है। जिस मनुष्य से उसकी मनुष्यता का विश्वास ही छीन लिया जाएगा, उसे बदला कैसे जा सकेगा? राकेश की दृष्टि में, मध्यवर्ग की स्त्रियाँ केवल देह की भूख या 'प्रतिष्ठा के बोझ' की मारी हुई पात्र नहीं हैं, वरन् वे माताएँ भी हैं जो अपने बच्चे को पढ़ाने के लिए आँखें फोड़कर काम करती हैं। राकेश चाहते थे कि कटाक्ष और व्यंग्य के साथ सहानुभूति का भी मेल हो, तभी रचना का महत्त्व स्थाई हो सकता है। यह संतुलन ही राकेश की कहानी-दृष्टि को विशिष्ट बनाता है, जहाँ वे यथार्थ की कड़वाहट को स्वीकारते हुए भी मानवीय संभावनाओं का दामन नहीं छोड़ते।
भाषा और आंचलिकता के प्रश्न पर भी मोहन राकेश की दृष्टि अत्यंत सुलझी हुई और व्यावहारिक है। जिस दौर में आंचलिकता के नाम पर कहानी की भाषा को स्थानीय शब्दों और मुहावरों से लाद देने का प्रचलन बढ़ा, राकेश ने उसे 'सम्प्रेषण' में बाधक माना। उनका तर्क था कि यदि भाषा ही पाठक और रचना के बीच दीवार बन जाए तो रचना अपना उद्देश्य खो देती है। वे भाषा के उस स्वाभाविक रूप के पक्षधर थे, जो कृत्रिम प्रयोगों से मुक्त हो। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे हिंदी के सामान्य पाठक ने क्लिष्ट संस्कृत-निष्ठ भाषा को स्वीकार नहीं किया, वैसे ही वह उस भाषा को भी स्वीकार नहीं करेगा जो स्थानीय बोलियों के बोझ तले दबी हो। राकेश की नजर में बिम्ब और विचार का सामंजस्य ही आधुनिक कहानी की शक्ति है। कहानीकार को व्याख्याकार की भूमिका छोड़कर बिम्बों के जरिये अपनी बात कहनी चाहिए, ताकि पाठक स्वयं उस संवेदना को जी सके। यह 'निर्वैयक्तिक दृष्टि'—जहाँ लेखक अपनी भावुकता को हावी न होने देकर एक तटस्थ द्रष्टा की भाँति चरित्रों और परिस्थितियों का वैज्ञानिक विश्लेषण करता है—राकेश की कथा-दृष्टि का एक अनिवार्य अंग है।
मोहन राकेश की दृष्टि सृजन-प्रक्रिया के आंतरिक संघर्ष को भी बहुत गहराई से पकड़ती है। 'कहानी क्यों लिखता हूँ' जैसे निबंधों में वे स्वीकार करते हैं कि लेखक का सबसे बड़ा आलोचक कोई बाहरी समीक्षक नहीं होता, उसके भीतर बैठा हुआ उसका अपना विवेक होता है। साहित्यिक आलोचक तो केवल लिखी हुई रचना की चीर-फाड़ करता है, किन्तु लेखक का आंतरिक आलोचक यह जानता है कि वह क्या लिखना चाहता था और क्या नहीं लिख पाया। वस्तुत: राकेश के लिए लेखन एक निरंतर असंतोष की प्रक्रिया थी। वे मानते थे कि मस्तिष्क द्वारा ग्रहण किए गए बिम्बों और शब्दों द्वारा की गई अभिव्यक्ति के बीच सदैव एक अंतराल रह जाता है। यही अंतराल, यही असंतोष उन्हें बार-बार लिखने के लिए प्रेरित करता था। यह दृष्टि दर्शाती है कि उनके लिए कहानी लिखना महज़ यांत्रिक कर्म नहीं, अपने अस्तित्व और परिवेश को समझने की एक अनवरत जद्दोजहद थी। वे स्वीकार करते हैं कि कई बार कहानी न कह पाने की असमर्थता भी एक सुंदर कहानी का विषय हो सकती है।
अंततः, मोहन राकेश की कहानी-दृष्टि प्रतिबद्धता और आधुनिकता के द्वंद्व को भी स्पष्ट करती है। वे पश्चिम के 'ह्यूमन क्राइसिस' (मानवीय संकट) की अंधानुकृति के विरोधी थे। परिचर्चाओं में उन्होंने स्पष्ट किया कि पश्चिम का संकट मशीनों और महायुद्धों की प्रत्यक्ष विभीषिका से उपजा है, जबकि भारतीय परिवेश का संकट यांत्रिकता से नहीं, आर्थिक विषमताओं, रूढ़ियों और बदलते मूल्यों के संक्रमण से उपजा है। हम पश्चिम वालों द्वारा निर्मित 'परिस्थितियों' को भोग रहे हैं, न कि मूल संकट को। इसलिए, हिंदी कहानीकार को कामू या सात्र्र का लबादा ओढ़ने के बजाय अपनी ही मिट्टी के संकट को पहचानना होगा। वे लेखक की प्रतिबद्धता को किसी राजनीतिक दल या 'कला कला के लिए' के सिद्धांत से न जोड़कर, 'जीवन के प्रति ईमानदारी' और 'परिवर्तित होते यथार्थ' के प्रति निष्ठा से जोड़ते हैं।
राकेश की यह मान्यता थी कि लेखक को अपने समय के प्रति दायित्वबोध होना चाहिए। जीवन एक सामूहिक इकाई है और जो शक्तियाँ उसे बनाने या बिगाड़ने में कारण बन रही हैं, उन्हें समग्रता में देखना ही लेखक का धर्म है। वे 'साहित्यिक' और 'लोकप्रिय' कहानी के कृत्रिम विभाजन को भी नकारते थे। उनका मानना था कि यदि कोई रचना संवेदना के स्तर पर प्रामाणिक है और युग-यथार्थ की अभिव्यक्ति है तो उसका लोकप्रिय होना उसका दोष नहीं, अपितु उसकी शक्ति है। क्लिष्टता या दुरुहता ही साहित्यिकता का प्रमाण नहीं हो सकती। इस प्रकार, मोहन राकेश की कहानी-दृष्टि एक ऐसे आधुनिकताबोध का निर्माण करती है जो जड़ों से कटा हुआ नहीं है, जो परंपरा को नकारता नहीं, वह उसका परिष्कार करता है और जो मनुष्य को उसकी समस्त दुर्बलताओं और संभावनाओं के साथ स्वीकार करता है। आज जब हम उनकी शताब्दी मना रहे हैं, उनकी यह दृष्टि और भी प्रासंगिक हो उठी है, क्योंकि यह हमें सिखाती है कि सच्चा साहित्य वही है जो अपने समय की नब्ज को पहचानकर, उसे आने वाले कल के लिए एक दस्तावेज के रूप में सुरक्षित कर दे।
मोहन राकेश की कहानियों का शिल्प
‘नई कहानी’ आंदोलन के पुरोधा मोहन राकेश की कथा-यात्रा को मात्र घटनाओं का संयोजन मान लेना उनके सृजन के साथ अन्याय होगा। उनके निबंधों में जिस ‘सांकेतिक यथार्थ’ और ‘बिम्ब-विधान’ की सैद्धांतिक चर्चा मिलती है, उसका व्यावहारिक और कलात्मक उत्कर्ष उनकी कहानियों—विशेषकर ‘अपरिचित’, ‘उसकी रोटी’, ‘एक और ज़िंदगी’, ‘एक ठहरा हुआ चाकू’, ‘मलबे का मालिक’ और ‘मिस पाल’—में पूर्णता के साथ परिलक्षित होता है। इन कहानियों का पाठ सिद्ध करता है कि राकेश के लिए कहानी कहना केवल किस्सा सुनाना भर नहीं, उस वातावरण को मूर्त करना है जहाँ आधुनिक मनुष्य अपने अकेलेपन, अजनबीपन और विडंबनाओं के साथ साँस ले रहा है। उनकी कुछ कहानियों का उदाहरण देकर हम यहाँ उनकी कहानी- शिल्प की पड़ताल करेंगे जो स्थूल यथार्थ को सूक्ष्म संवेदना में रूपांतरित कर देता है।
उनकी कहानियों में ‘मलबे का मालिक’ एक ऐसी रचना है जो भारत-पाक विभाजन की त्रासदी को बिना किसी रक्तपात के चित्रण के, केवल एक ‘खंडहर’ के बिम्ब के माध्यम से व्यक्त करती है। यहाँ राकेश का ‘सांकेतिक यथार्थ’ अपने चरम पर है। कहानी में गनी मियां का अमृतसर आना और अपने जले हुए घर को देखना—यह केवल ईंट-गारे के मलबे का किस्सा नहीं है, यह मानवीय संबंधों और विश्वास के मलबे की कहानी है। शिल्प के स्तर पर राकेश यहाँ ‘अंडरस्टेटमेंट’ (न्यूनोक्ति) का प्रयोग करते हैं। वे गनी मियां की चीख-पुकार नहीं दिखाते। वे उस मलबे पर बैठे एक कौवे और गली के एक कुत्ते की गतिविधियों से सन्नाटे को गहरा करते हैं। यहाँ ‘मलबा’ एक केंद्रीय बिम्ब (Central Image) बन जाता है जो पूरी कहानी को नियंत्रित करता है। राखा पहलवान, जिसने उस घर पर कब्ज़ा किया है, मलबे का मालिक होकर भी आत्मिक रूप से रिक्त है, जबकि गनी मियां सब कुछ खोकर भी स्मृतियों के मालिक हैं। यहाँ भाषा की संयमित गति और परिवेश का बारीक चित्रण पाठक को उस त्रासदी के भीतर उतार देता है, जहाँ विभाजन केवल जमीन का नहीं, मनुष्यता का हुआ था।
शहरी मध्यवर्गीय जीवन की विडंबनाओं और स्त्री-पुरुष संबंधों के बिखराव को राकेश ने ‘एक और ज़िंदगी’ तथा ‘अपरिचित’ जैसी कहानियों में अत्यंत गहराई से उकेरा है। ‘एक और ज़िंदगी’ कहानी तलाकशुदा जिंदगी और पुनर्विवाह के द्वंद्व को जिस शिल्प के साथ प्रस्तुत करती है, वह अद्भुत है। यहाँ कहानीकार ने ‘फ्लैशबैक’ और वर्तमान के तनाव को एक साथ गूंथ दिया है। प्रकाश का चरित्र उस आधुनिक मनुष्य का प्रतीक है जो एक रिश्ते (तलाक) से मुक्त होकर ‘एक और ज़िंदगी’ शुरू करना चाहता है, लेकिन अतीत का साया उसे मुक्त नहीं होने देता। कहानी में बच्चे का निरुद्देश्य छत की मुंडेर पर बैठे रहना या उसका मौन—राकेश की उस शिल्पगत विशेषता को दर्शाता है जहाँ वे ‘बोलते हुए शब्दों’ से अधिक ‘खामोश बिम्बों’ पर भरोसा करते हैं। ‘एक और ज़िंदगी’ का शीर्षक ही व्यंग्यात्मक है क्योंकि अंततः वह जिंदगी ‘वही पुरानी जिंदगी’ सिद्ध होती है। इसी प्रकार ‘अपरिचित’ कहानी में राकेश यह स्थापित करते हैं कि अजनबीपन केवल दो अनजान लोगों के बीच नहीं होता, बल्कि एक ही छत के नीचे रहने वाले आत्मीय जनों के बीच पसरा हुआ मौन सबसे बड़ा ‘अपरिचित’ तत्त्व है। इस कहानी की भाषा में एक प्रकार का रूखापन और तल्खी है, जो पात्रों के बीच की दूरी को भाषाई स्तर पर भी प्रमाणित करती है।
मोहन राकेश की कथा-दृष्टि का एक अन्य सशक्त पहलू ‘मिस पाल’ कहानी में उभरता है। यह कहानी एक सनकी महिला का चरित्र-चित्रण है। यह उस समाज पर एक कटाक्ष है जो एक अकेली, स्वतंत्र और थोड़ी अलग दिखने वाली स्त्री को स्वीकार नहीं कर पाता। शिल्प के दृष्टिकोण से देखें तो राकेश ने मिस पाल के चरित्र को गढ़ने के लिए ‘पिंक’ (गुलाबी) रंग का सहारा लिया है। मिस पाल का हर समय गुलाबी रंग में रंगे रहना या उनका बेतरतीब सामान—यह सब उनके भीतर की असुरक्षा और प्रेम की कमी को भरने का एक असफल प्रयास है। राकेश यहाँ सीधे यह नहीं कहते कि मिस पाल दुखी हैं; वे उनके ‘अटपटेपन’ और रंजीत के प्रति उनके व्यवहार के माध्यम से उस दुख को ध्वनित करते हैं। कुल्लू या रानीखेत के एकांत में जाकर भी मिस पाल को शांति नहीं मिलती, क्योंकि वह समाज जिससे वह भागना चाहती थी, उसके भीतर बैठा है। कहानी का अंत—जब वह रंजीत को बस तक छोड़ने आती है और बस के पीछे भागती है—एक ऐसा दृश्य-बिम्ब निर्मित करता है जो पाठक के चित्त पर स्थाई विषाद छोड़ जाता है। यहाँ भाषा पात्र के मनोविज्ञान के अनुरूप बदलती है; मिस पाल के संवादों में एक हताशा और हठधर्मिता का मिश्रण है जो उनकी त्रासदी को विश्वसनीय बनाता है।
‘उसकी रोटी’ कहानी में मोहन राकेश ने यह सिद्ध किया कि वे शहरी जटिलताओं के चितेरे होने के साथ-साथ ग्रामीण या कस्बाई जीवन की नीरसता को भी उतनी ही शिद्दत से पकड़ सकते हैं। किन्तु प्रेमचंद के गाँव और राकेश के गाँव में अंतर है। ‘उसकी रोटी’ में भूखे पेट या जमींदार का शोषण नहीं है, यहाँ ‘प्रतीक्षा’ और ‘अस्तित्वहीनता’ का प्रश्न मुखर है। सुच्चा सिंह की पत्नी बालो का जीवन केवल सुच्चा सिंह के लिए रोटियाँ पहुँचाने तक सीमित है। यहाँ ‘रोटी’ उस स्त्री के अस्तित्व का एकमात्र ‘हेतु’ (Purpose) है। शिल्प के स्तर पर राकेश ने यहाँ ‘समय’ को एक पात्र की तरह इस्तेमाल किया है। बस स्टैंड पर बैठी बालो और गुजरती हुई बसें—यह दृश्य समय की क्रूर गति और बालो के जीवन की स्थिरता (Stagnation) का विरोधाभास रचता है। कहानी में संवाद बहुत कम हैं और जो हैं वे अत्यंत सूचनात्मक हैं, जो सुच्चा सिंह की संवेदनहीनता को दर्शाते हैं। राकेश उस ‘सांकेतिक यथार्थ’ का प्रयोग करते हुए दिखाते हैं कि कैसे एक स्त्री का पूरा व्यक्तित्व केवल ‘उसकी (पति की) रोटी’ बनकर रह गया है।
उसी प्रकार ‘एक ठहरा हुआ चाकू’ कहानी मोहन राकेश के उस प्रयोगात्मक शिल्प का उदाहरण है जहाँ वे कथानक को लगभग नकार देते हैं और एक ‘स्थिति’ (Situation) को केंद्र में लाते हैं। जैसा कि शीर्षक से स्वयं ध्वनित होता है। यह कहानी गति के बजाय ठहराव की है—लेकिन यह ठहराव शांत नहीं है, इसमें चाकू जैसी धार और खतरा है। कहानी आधुनिक जीवन के उस तनाव को व्यक्त करती है जहाँ कुछ घटित नहीं हो रहा, फिर भी सब कुछ तना हुआ है। यहाँ बिम्ब-विधान अत्यंत आधुनिक है। राकेश ने इसमें वातावरण की सघनता को दर्शाने के लिए निर्जीव वस्तुओं और मौन का सहारा लिया है। यह कहानी सिद्ध करती है कि राकेश के लिए यथार्थ केवल वह नहीं जो घटित होता है; वह भी यथार्थ है जो घटित होने की प्रतीक्षा में ठहरा हुआ है। कहानी में भाषा अत्यंत कसी हुई है, एक भी अतिरिक्त शब्द का प्रयोग न करके वे तनाव को बनाए रखते हैं।
सार रूप में, राकेश की इन कहानियों की भाषा पर गौर करें तो हम पाते हैं कि उन्होंने हिंदी कहानी को अलंकरण और भारी-भरकम शब्दावली से मुक्त किया। उनकी भाषा पात्रों के सामाजिक स्तर और मानसिक स्थिति के अनुसार अपना चोला बदलती है। ‘मलबे का मालिक’ कहानी में जहाँ अमृतसर की स्थानीय बोली और उर्दू का पुट है, वहीं ‘मिस पाल’ और ‘एक और ज़िंदगी’ में शहरी मध्यवर्ग की शिक्षित किन्तु संवेदनशून्य भाषा है।
राकेश ने अपने निबंधों में जिस ‘माइक्रो-डिटेल्स’ (सूक्ष्म ब्यौरों) की वकालत की थी, वह इन कहानियों में पग-पग पर मिलती है। जैसे ‘मलबे का मालिक’ में गनी मियां का मलबे को छूना या ‘उसकी रोटी’ में बालो का रोटियों को कपड़े में लपेटना—ये छोटी क्रियाएँ ही कहानी के बड़े सत्य को उद्घाटित करती हैं। इससे स्पष्ट होता है कि मोहन राकेश की कहानी-दृष्टि एक सतत अन्वेषण की दृष्टि है। उन्होंने कहानी को सपाटबयानी से निकालकर उसे एक बहुस्तरीय अनुभव में बदल दिया। उनका ‘सांकेतिक यथार्थ’ यह है कि वे दुख को चिल्लाकर नहीं बताते, उसे वातावरण में घोल देते हैं। उनका बिम्ब-विधान इतना सशक्त है कि कहानी खत्म होने के बाद भी ‘मलबा’, ‘गुलाबी रंग’, ‘सूखी रोटियाँ’ या ‘ठहरा हुआ चाकू’ पाठक की स्मृति में देर तक कौंधते रहते हैं। राकेश ने इन कहानियों को सृजित कर यह स्थापित किया कि आधुनिक कहानी का उद्देश्य न तो मनोरंजन है और न ही केवल समाज सुधार; उसका चरम उद्देश्य मनुष्य को उसके नग्न और आवरणहीन सत्य के सामने खड़ा कर देना है। यही कारण है कि दशकों बाद भी ये कहानियाँ अपनी शिल्पगत ताजगी और संवेदनात्मक गहराई के कारण समकालीन प्रतीत होती हैं।
यह बात भी गौर करने लायक है कि मोहन राकेश की कहानियाँ केवल कथा-रस का आस्वादन नहीं करातीं। वे उस आधुनिक मनुष्य की रूह का एक्स-रे हैं जो भीड़ में रहकर भी नितांत अकेला है। 'ग्लास टैंक', 'सुहागिनें', 'जानवर और जानवर', 'पाँचवें माले का फ़्लैट', 'ज़ख्म' और 'आर्द्रा' जैसी कहानियाँ उस दौर की गवाह हैं जब भारतीय समाज, विशेषकर शहरी मध्यवर्ग अपने पारंपरिक खोल से बाहर निकलकर आधुनिकता के उस 'ग्लास टैंक' में प्रवेश कर रहा था, जहाँ सब कुछ पारदर्शी होते हुए भी स्पर्श से परे है। इन कहानियों में राकेश की समकालीनता इस बात में निहित है कि उन्होंने साठ के दशक में जिन मानवीय संकटों को पहचाना था, वे आज इक्कीसवीं सदी में और अधिक भयावह रूप में हमारे सामने खड़े हैं।
राकेश की कथा-दृष्टि में महानगर ईंट-गारे का जंगल मात्र नहीं, संवेदनाओं का एक ऐसा पाँचवें माले का फ़्लैट है, जहाँ ऊँचाई तो है पर जड़ों से जुड़ाव नहीं। 'पाँचवें माले का फ़्लैट' और 'ग्लास टैंक' जैसी कहानियों में वे आधुनिक जीवन की उस कृत्रिमता और ऊब को रेखांकित करते हैं, जहाँ मनुष्य वस्तुओं से तो घिरा है, किन्तु आत्मीयता से रिक्त है। 'ग्लास टैंक' एक सशक्त रूपक बन जाता है—एक ऐसी स्थिति का जहाँ व्यक्ति दूसरे को देख तो सकता है, पर उसकी पीड़ा को महसूस नहीं कर सकता। राकेश दिखाते हैं कि शहरी जीवन की चकाचौंध के भीतर एक गहरा सन्नाटा और अजनबीपन पसरा हुआ है।
'जानवर और जानवर' कहानी में यह विडंबना अपने क्रूरतम रूप में सामने आती है। विभाजन या संकट के समय मनुष्य के भीतर का 'जानवर' कैसे जाग उठता है और कैसे स्वार्थ सारी मानवीय मर्यादाओं को लांघ जाता है, इसका यह एक दस्तावेजी चित्रण है। यहाँ राकेश यह स्थापित करते हैं कि असली संकट बाहर नहीं, मनुष्य के भीतर है। उनका यह कथन कि "परिस्थितियाँ नहीं, पात्र बोलते हैं, यहाँ चरितार्थ होता है। वे दिखाते हैं कि तथाकथित सभ्य समाज की ऊपरी परत कितनी झीनी है।
'सुहागिनें' कहानी में राकेश ने वैवाहिक जीवन के उस मिथक को तोड़ा है जो यह मानता है कि 'सुहाग' ही स्त्री के जीवन की पूर्णता है। यहाँ वे समाज के उस ढोंग को बेनकाब करते हैं जहाँ स्त्रियाँ अपने सुखी होने का अभिनय करती हैं, जबकि भीतर वे खोखली हो चुकी हैं। राकेश की यह दृष्टि यशपाल के स्थूल यथार्थवाद से भिन्न है; वे केवल सामाजिक ढाँचे को नहीं कोसते। वे उस मनोविज्ञान को भी पकड़ते हैं जो स्त्री को इस अभिनय के लिए बाध्य करता है। इसी प्रकार 'ज़ख्म' कहानी शारीरिक चोट से अधिक उन मानसिक घावों की बात करती है जो समय के साथ नासूर बन जाते हैं, पर दिखाई नहीं देते।
जहाँ राकेश की अन्य कहानियाँ शहरी तल्खी और रूखेपन की बानगी हैं, वहीं 'आर्द्रा' मानवीय संवेदना की नमी और अतीत के मोह की कहानी है। 'आर्द्रा' में राकेश ने स्मृति और वर्तमान के द्वंद्व को बहुत सूक्ष्मता से उकेरा है। यहाँ वह 'सांकेतिक प्रभावान्विति' अपने चरम पर है जिसकी वकालत वे अपने निबंधों में करते हैं। कहानी में वातावरण की नमी (आर्द्रा) पात्रों की भीगी हुई पलकों और मन की उदासी का बिम्ब बन जाती है। राकेश यहाँ सिद्ध करते हैं कि आधुनिकता की दौड़ में भी मनुष्य के भीतर का एक कोना ऐसा है जो अतीत की स्मृतियों से मुक्त नहीं हो पाया है।
शिल्प और भाषा के स्तर पर मोहन राकेश की सबसे बड़ी शक्ति उनके शब्दों और कहन की 'मितव्ययिता' है। वे थोड़े शब्दों में बहुत कुछ कह जाने की कला में सिद्धहस्त हैं। उनकी भाषा में एक प्रकार का 'नाटकीय संयम' है। वे भावनाओं के अतिरेक की जगह ‘अंडरस्टेटमेंट’ (न्यूनोक्ति) से काम लेते हैं। 'ग्लास टैंक' या 'पाँचवें माले का फ़्लैट' में वे निर्जीव वस्तुओं—फर्नीचर, दीवारों, सीढ़ियों—के प्रतीकात्मक बिंबों से पात्रों की मानसिक स्थिति को ध्वनित करते हैं। उनके निबंधों में वर्णित सिद्धांत कि "कहानी का प्रभाव बिम्बों द्वारा हो, लेखकीय टिप्पणियों के लिए अवकाश न रहे, इन कहानियों में बखूबी चरितार्थ होता है। उनकी भाषा पात्रों के सामाजिक स्तर और परिवेश के अनुकूल ढलती जाती है—कभी वह 'जानवर और जानवर' में खुरदरी हो जाती है तो 'आर्द्रा' में उसमें एक लयात्मक उदासी आ जाती है।
उनकी कहानियाँ आधुनिक संवेदनशीलता के भिन्न-भिन्न आयामों का प्रतिदर्श हैं। राकेश ने इन कहानियों में उस 'ह्यूमन क्राइसिस' को वाणी दी है जो युद्धों से नहीं, बल्कि आपसी संवादहीनता और विश्वास के क्षरण से उपजा है। वे संबंधों की जटिलता और आंतरिक द्वंद्वों का ऐसा सूक्ष्म विश्लेषण करते हैं कि पाठक को पात्रों में उसका अपना ही चेहरा नजर आने लगता है। उनकी समकालीनता इसी में है कि आधी सदी बाद भी ये कहानियाँ हमें अपने शहर की और हमारे समय की कहानियाँ लगती हैं।●
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सुशील कुमार
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