अधूरी आँखों वाली मातृदेवी उपन्यास का एक अंश।

Sushil Kumar
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उपन्यास "अधूरी आँखों वाली मातृदेवी" हड़प्पाकालीन एक स्त्री मूर्तिकार के कला और सत्ता के संघर्ष की दास्तान। 

उसका एक अंश हिंदी की प्रतिष्ठित पत्रिका "युगतेवर" संपादक आदरणीय ( कमलनयन पांडेय और सलाहकार संपादक डॉ.राधेश्याम सिंह) ने जुलाई - सितंबर अंक 2026 में प्रकाशित किया है। उनका अतिशय आभार। 

‘युगतेवर पत्रिका के लिए उपन्यास-अंश और कहानी उपन्यास अधूरी आँखों वाली मातृदेवी’ के बारे में। 


हम ऐसे समय में जी रहे हैं जब सत्ता, धर्म, तकनीक और बाजार — चारों मिलकर यह तय करना चाहते हैं कि कला क्या कहे,  कैसे कहे और किसके लिए कहे। शब्द, विचार और सृजन अब केवल रचनात्मक क्रिया नहीं रहे, वे 'नीति' और 'प्रचार' के औजार बनाए जा रहे हैं। सत्ता उसे अपने हित में नियंत्रित करना चाहती है। इस विकट समय में 'अधूरी आँखों वाली मातृदेवी' उपन्यास को एक रचनात्मक हस्तक्षेप की तरह देखा जाना चाहिए— वह हमें याद दिलाता है कि सृजन का असली अर्थ है, सत्ता से स्वतंत्र रहना।


उपन्यास में मूर्तिकार अरा की मूर्ति-कला इस स्वतंत्रता की मूर्त अभिव्यक्ति है। वह जानती है कि पूर्णता की राजनीति सत्ता का सबसे परिष्कृत छल-छद्म है — जिससे कला की स्वतंत्रता को 'पवित्रता' और 'अनुशासन' की आड़ में बाँधा जाता है। अरा की कला इस छल के विरुद्ध मिट्टी की भाषा में बोलती है। उसकी मूर्तियाँ अधूरी इसलिए हैं, क्योंकि वह जानती है कि पूर्ण की गई कला, दरअसल सत्ता की अधीन कला है। अरा मिट्टी से देवी की प्रतिमा नहीं, मनुष्य की स्वतंत्र चेतना गढ़ती है जो उसके हाथों से निस्सरित होती है और उस सभ्यता की नमी को बचाती है जिसे सत्ता पोषित लिपियों और मुहरों ने कठोर और शुष्क बना दिया है।


इस दृष्टि से यह संघर्ष मात्र बीते समय का नहीं,  आज के मनुष्य का संघर्ष भी बन जाता है — जब अभिव्यक्ति को 'सुरक्षा', 'संवेदना' या 'राष्ट्रहित' के नाम पर सीमित किया जा रहा है। अरा की मिट्टी और कला वस्तुत: आज की अभिव्यक्ति है, जो किसी शासन की अनुमति से नहीं बहती; वह अपने बहाव में सच्चाई खोजती है और उसी में जीती है। इस कारण उसका सत्ता से संघर्ष होता है, लेकिन अंत तक वह झुकती नहीं, बल्कि उसका प्रतिरोध करती है। यही इस उपन्यास की समकालीनता है, जिसमें इतिहास, मिथ और कल्पना वर्तमान से जुड़कर जीवन को जीने का सही अर्थ देते हैं।  


अरा की चेतना में हमें जां-पॉल सार्त्र और अलबेयर कामू के अस्तित्ववादी दर्शन की झलक भी मिलती है। सार्त्र के अनुसार मनुष्य पहले अस्तित्व में आता है, फिर अपना अर्थ स्वयं गढ़ता है — अरा स्वतंत्रता के इसी अर्थ को अपने सृजन में मूर्त करती है और कामू की तरह, वह जानती है कि जीवन का अपना कोई अर्थ नहीं होता, इसलिए सृजन से उसे संवलित करती है — क्योंकि स्वतंत्र सृजन ही सत्ता की अनुदारता का प्रतिरोध है, जहाँ उसकी असहमति और करुणा एक साथ उसकी कला में जीवंत रहती है।


हड़प्पा संस्कृति की पृष्ठभूमि इस उपन्यास में अतीत का वातावरण तो सृजित करता है पर उसका रूपक नहीं, वरन आज का रूपांतरण है। मिट्टी, नदी और स्मृति यहाँ समय की तरह बहती हैं — वे हमें दिखाती हैं कि इतिहास कभी ख़त्म नहीं होता, वह हर युग में नए अर्थों के साथ लौटता है। पात्र गिराग और सीहल जैसी आकृतियाँ आज की व्यवस्थाओं के भीतर भी मौजूद हैं; और अरा इस तरह  अपने मौन में  आज के संवेदनशील कलाकार की प्रतीक बन जाती है।


उपन्यास इस अर्थ में हड़प्पा के आवरण में रचा गया एक काव्यात्मक-दार्शनिक आख्यान है, — वह हमें यह सोचने का अवसर देता है कि अगर कला से प्रश्न पूछने का अधिकार छीन लिया गया  तो सभ्यता सिर्फ़ संग्रहालय बन जाएगी। अरा की अधूरी आँखें हमें यह दिखाती हैं कि देखने का अर्थ समझना नहीं, जागते रहना है। 

यह उपन्यास सभ्यता, स्मृति और सृजन के जटिल संबंधों को एक स्त्री मूर्तिकार अरा की दृष्टि से देखने का प्रयास करता है। यहाँ मिट्टी अनुभव और प्रतिरोध की जीवित भाषा है। अरा की मूर्तियाँ सत्ता से टकराती हैं क्योंकि उनमें दृष्टि नहीं, अधूरापन है—और वही अधूरापन सृजन की सबसे गहरी चेतना बन जाता है। इस कथा में मिट्टी और लिपि, प्रेम और सत्ता, स्मृति और इतिहास के बीच निरंतर एक मौन द्वंद्व चलता है। अरा का प्रेमी सीहल सत्ता का लिपिकार है, जो सब कुछ शब्दों में बाँधना चाहता है, जबकि अरा मिट्टी की चुप्पी में अर्थ खोजती है। दोनों के बीच यह द्वंद्व सभ्यता के भीतर संघर्ष में बदल जाता है। 'अधूरी आँखें' यहाँ उस दृष्टि का प्रतीक हैं जिसे इतिहास ने अधूरा छोड़ा—पर जिसने सृष्टि को पूरा बनाया। 

इसमें किसी देवी या धर्म की कथा नहीं, बल्कि मनुष्य-कथा का रूपक है जिसमें हर सृजन अपने भीतर प्रश्न लेकर जन्म लेता है। 

ऋणाक, उस नदी का नाम है जिसके पार्श्व में इस उपन्यास की कथा बुनी गई है और सभ्यता की गति, परिवर्तनशीलता और स्त्री के भीतर प्रवाहित स्वतंत्रता का द्योतक है।

पात्रों की भूमिका प्रतीकात्मक है- अरा एक स्त्री-मूर्तिकार है। वह स्वतंत्र चेता है। गिराग सत्ता और नियमन की आकृति है। सीहल सत्ता का लिपिकार है और अरा का प्रेमी भी, वह संवेदना और संवाद की उपस्थिति है। निर्मा और बाला — कथापट के बीच की सहकारी स्त्रियाँ हैं।

बीस अध्यायों (210 पृष्ठों) में विस्तीर्ण यह उपन्यास अंतत: कोई संस्तुति या निष्कर्ष नहीं देता। यह सभ्यता, स्मृति और सृजन के अंतर्संबंधों को स्त्री-प्रेम के अंतर्मन में गूँथते हुए, पाठक को स्वयं उत्तर खोजने के लिए आमंत्रित करती है, किंचित आलोड़ती हुई।

स्त्री-विमर्श के परिप्रेक्ष्य में देखें तो उपन्यास स्त्री चेतना के विकास का रूपक है। अरा यहाँ किसी परंपरागत नायिका के रूप में नहीं, बल्कि सृजनशील स्त्री के रूप में उपस्थित होती है, जो अपने समय और समाज की स्थापित मान्यताओं को चुनौती देती है। वह देवी की पूजा की वस्तु बनने से इंकार करती है और मिट्टी के माध्यम से अपनी स्वतंत्र दृष्टि गढ़ती है। यह अस्वीकार ही उसका स्त्री-संघर्ष है — जो उसे पितृसत्तात्मक ढाँचे से अलग खड़ा करता है।


अरा की अधूरी मूर्तियाँ उस स्त्री-दृष्टि का प्रतीक हैं जिसे इतिहास ने हमेशा अधूरा छोड़ा। उसका मौन, उसका प्रतिरोध  और उसका अधूरापन — तीनों मिलकर उस वैचारिक विमर्श को जन्म देते हैं जिसमें स्त्री केवल 'प्रेरणा' नहीं, बल्कि 'निर्माता' है। वह स्मृति, देह और कला — तीनों में अपना स्वत्व खोजती है। यही इस उपन्यास को एक गहरे 'फेमिनिस्ट पाठ' में बदल देता है, जहाँ स्त्री अपने भीतर से अर्थ रचती है, पुरुष-नियंत्रित भाषा से नहीं। अरा का यह सृजनात्मक प्रतिरोध आधुनिक स्त्री की चेतना का विस्तार है,  जो अपनी पूजा नहीं, सहभागिता चाहती है। ●

उपन्यास- अंश


अध्याय 1 : मिट्टी की पहली देवी 

पूरापन   

एक बंद अँधेरा कमरा है  


अधूरापन —  

एक दरवाज़ा है,  

जिसके भीतर अर्थ खुलते हैं 

तह–दर–तह 


दृष्टि का अर्थ है  

चेतना,  

चेतना से शब्द जागता है     

और सत्तासीन हो जाता है    

फिर बाँधता है अधूरेपन के बहाव को   

लेकिन मिट्टी उसे बहने देती है  


सृष्टि का सबसे गूढ़ सत्य —  

अधूरापन है,


यही मिट्टी का ममत्व है   

उसकी सम्पूर्णता भी —  

जिसे हर बार वह 

नए रूप मेँ अपने साथ लाती है

और संचित करती है 

स्मृति के कछार पर।  


अरा नदी किनारे मिट्टी उठाती है।

ऋणाक नदी का यह किनारा अरा के जीवन का सबसे गहरा हिस्सा था। वह जितनी बार इस जल और मिट्टी के प्रदेश में आई, हर बार उसे किसी नए अर्थ और रूप-रस में या । ऋतुओं के बदलने के साथ इस मिट्टी की गंध और ऊष्मा भी बदल जाती थीं। ग्रीष्म की चिलकाती दुपहरियों में यह धरती तपकर दरकने लगती, मानो भीतर की थकान बाहर फूटने को हो। बरसात की रातों के बाद यही मिट्टी इतनी नम हो जाती कि वह हथेली में चिपकने लगती। 


मगर आज शरद की सुबह कुछ अलग थी। आसमान पर धुंध का पतला वस्त्र-पट फैल गया था। सूरज अब तक क्षितिज के पीछे टँका था। हवा में तरावट थी। वही हल्की ठंडक जो आने वाले लंबे मौसम की पहली दस्तक होती है।


अरा नंगे पाँव चल रही थी। उसके पैरों के नीचे रेत की गीली तह बिछी थी। हर कदम के साथ पाँव मिट्टी में थोड़ा धँसता और निकल आता। उसके पैरों के निशान पीछे रेत पर बनते और बहाव में मिटते जा रहे थे। उसकी चाल धीमी थी, जैसे हर कदम के नीचे मिट्टी से कोई ख़ामोश गुफ़्तगू कर रहा हो।


कमर से बँधी उसकी छोटी चमड़े की थैली धीरे-धीरे हिल रही थी। उसमें बस कुछ ही चीजें थीं — एक नन्हीं मिट्टी की कटोरी जिसमें वह जल रखती थी और कुछ महीन सूती पट्टियाँ जिनसे वह मूर्तियों की सतह समतल करती थी। शेष सब उसके हाथों में था। उसके पिता हमेशा कहा करते थे — "सच्चा मूर्तिकार हाथों से बनाता है, औज़ार से नहीं। मिट्टी हथेली को पहचानती है।"


उसके कदम वहीं ठिठक गए जहाँ नदी का बहाव थोड़ा थमता था। यह स्थान वह बरसों से जानती थी। यहाँ की मिट्टी अलग थी। ऊपर हल्की बालू थी, पर भीतर उतरते ही मिट्टी की गाढ़ी, चिकनी तहें मिलने लगती थीं, जो बहते जल के साथ यहाँ जमा होती रही थीं। अरा जानती थी कि यही सृजन के लिए सबसे उपयुक्त मिट्टी है। इसी से नगर की प्राचीरें उठती थीं, जल-प्रणालियों के कुंड ढाले जाते थे और मूर्तियों के चेहरे आकार पाते थे।


वह झुकी। दोनों हथेलियों से मिट्टी उठाई। हथेली में फैलाकर उसे रगड़ा। कण सम थे। कहीं कोई रुखड़ा टुकड़ा नहीं। गीली थी, पर अत्यधिक गीली नहीं। वह जानती थी, गढ़ने की यही सबसे माकूल  दशा है।


उसने मिट्टी को नाक के पास लाकर उसकी गंध ली। यह वही गंध थी जो बचपन से उसके भीतर बसती थी। पिता के पहली बार जिस गीली मिट्टी को उसने हाथों में लिया था — उसमें भी यही गंध थी। तभी पिता ने कहा था — "मिट्टी बोलती नहीं, सुनती है। जो उसके साथ बोलता है, मिट्टी वही बन जाती है।"


वह चौरस जगह पर बैठने से पहले क्षण भर खड़ी रही। ऋणाक की बहती सतह पर उसकी देह की छाया डोल रही थी। सुबह की हल्की धूप उसकी साँवली देह पर रेशमी उजास की तरह उतर रही थी। देह की हर भंगिमा में एक ऐसा स्त्रीत्व था जो किसी भी निगाह को खींच लेने के लिए काफी था — सहज, उद्दीप्त और जंगली सौंदर्य से भरा हुआ।


उसकी गर्दन से उतरते कंधे और पीठ पर लहराते खुले काले केश फैले हुए थे। सुराही सी कमर में इतनी लचक कि शरीर झुकते ही उसके पीछे का घेरा और ऊँचा जान पड़ता। उसके ढीले वस्त्र, भीगी मिट्टी से सटकर उसकी जंघा और नितंब के घुमाव को उभारते थे।


उसके होंठ पतले, पर सुर्ख थे। बदन की गति से उनमें हल्का कंपन रहता था। पलकों की लंबी रेखा के नीचे उसकी बड़ी, कजरारी आँखों में एक भीगी सी गहराई थी — जैसे वे देखती कम थीं, आकर्षित अधिक करती थीं।


वह समतल पर बैठ गई। मिट्टी को फिर हाथों में समेटा। उसकी गर्म हथेलियों में मिट्टी धीरे-धीरे गुनगुनी होती गई। उँगलियाँ मिट्टी की उस गहराई तक उतरने लगीं जहाँ सृजन की अनकही भाषा पलती है।


हर बार जब वह मिट्टी उठाती तो उँगलियों के पोरों में वर्षों से सीखी गई एक सहज लय जाग उठती थी। पिता ने सिखाया था — मिट्टी को हथेलियों से गूँधते रहो, जब तक उसमें से हवा पूरी तरह बाहर न निकल जाए। फिर वह उसे छोटे-छोटे लोथों में बाँट लेती, उन्हें गोल घेरों की शक्ल देती। हर तह को अंगूठे और अँगुलियों से दबाकर जोड़ती ताकि कोई दरार न रहे। जो हिस्सा सूखने लगता, उस पर पानी के छींटे मारती और फिर से मुलायम करती। आकृति पूरी बनने के बाद कई दिन छाँव में सुखाती थी और आखिर में, एक धीमी आँच पर पकाया जाता था।


चारों ओर गहराता सन्नाटा था। दूर क्षितिज पर हल्के बादलों की कतारें थीं। कभी-कभी पक्षियों का कलरव सुनाई देता था। ऋणाक नदी की लहरों की कल-कल ध्वनि पृष्ठभूमि में पसरी रहती। नगर अब भी अपनी नींद में लिपटा था।


अरा के लिए यह समय मिट्टी के साथ साक्षात्कार का था। वह एक ऐसा संवाद था, जहाँ कोई शब्द नहीं था। केवल हाथों का ताप, मिट्टी की कोमलता और भीतर बहती स्मृतियों की धड़कन।


देवी के माथे की गोलाई उभरी। गालों के उभार बनते गए। होठों के किनारे उँगलियों की कोमल गति से आकार लेते गए।


ऋणाक लय में बहती रही ।


अधूरी आँखें — अधूरापन ही सृजन का सबसे गूढ़ सत्य है।


अरा की ऊँगलियाँ चेहरे के उस हिस्से तक पहुँच चुकी थीं जहाँ मिट्टी में जीवन का सबसे गहरा संकेत उभरता है। माथे की गोलाई अब पूर्ण संतुलन में थी। गालों और होठों के किनारों पर हल्की मृदुल मुस्कान थी। ठोड़ी पर गोलाई की भरावट डालते हुए उसकी अंगुलियाँ जैसे मिट्टी में प्राण फूँक रही थीं। चेहरा अब लगभग पूर्ण हो गया था। लेकिन माथे के दोनों ओर जहाँ आँखें बननी थीं, वहाँ उसकी गति धीमी हो गई। उसने हल्का दबाव देकर आँखों का आधार बनाया। फिर पुतलियों को गढ़ने के लिए अंगूठा आगे बढ़ा। पर उसकी साँस गहरी हो गई। उँगलियाँ वहीं रुक गईं। भीतर कुछ काँपने लगा। दृष्टि देना, पुतलियाँ बनाना — इसका अर्थ था चेतना देना। चेतना का अर्थ था नियंत्रण। नियंत्रण का अर्थ था सत्ता।


"क्या आँखें पूरी कर दूँ?" यह प्रश्न उसके भीतर चमका। 


उसने मिट्टी को निहारा। उसकी गीली हथेली की ऊष्मा से एक धुँधली भाप-सी उठने लगी थी। मिट्टी उसकी साँसों के ताप को सोखने लगी थी। और तभी — जैसे समय एक क्षण के लिए ठहर गया। उसके भीतर एक दृश्य कौंध उठा।


मूर्ति के अधूरे चेहरे के ठीक ऊपर एक धुंधली छवि आकार लेने लगी। कोई उसकी ही देह से निकलकर मिट्टी के सम्मुख खड़ी हो गई थी। वही लचकती कमर, वही उभरे गोल स्तन, वही रक्तिम पतले होंठ, वही भीगी कजरारी आँखें। वह जैसे अपनी ही प्रतिलिपि देख रही थी। लेकिन यह केवल उसका शरीर नहीं था। उसकी देह के भीतर से जैसे मातृदेवी की कोई आदिम प्रतिमा उठ खड़ी हुई थी। आकृति नग्न थी, लेकिन उसमें कोई लज्जा नहीं थी। उसकी देह से मिट्टी, पसीने और सृष्टि की गंध मिलकर एक आदिम स्मृति रच रही थी।


उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में करुणा थी, आकर्षण था और आदेश का संकेत भी। अरा ठिठक गई। उसकी ऊँगलियाँ मिट्टी पर स्थिर रह गईं और तभी — उस ध्वनि में पिता की वह पुरानी बात गूँज उठी, जो वह बचपन से बार-बार सुनती आई थी—"मिट्टी की आँखें जब बन जाती हैं, तब वह चुप नहीं रहती।"


यह बात अब एक आदेश की तरह उसके भीतर प्रतिध्वनित हुई , जैसे पिता कोई गहरी चेतावनी दे गए हों —

कि किसी मूर्ति को आँखें देना ठीक वैसा ही है, जैसे स्त्री को देखने, जानने और पूछने की आज़ादी देना। अरा के भीतर यह स्वर अब पितृसत्ता की आदिम ध्वनि में बदल गया था —


“स्त्री को सृजन दो, पर दृष्टि मत दो। मिट्टी से जीवन रचने दो, पर उसकी आँखें अधूरी रहने दो, क्योंकि अगर उसने देखना शुरू कर दिया तो वह केवल देखेगी नहीं, पहचानना भी शुरू कर देगी। वह सृष्टि के भीतर सत्ता के रिश्तों को पहचान लेगी।“


और पहचानने का अर्थ है — प्रश्न करना। पिता के इस वाक्य में वह अनकहा भय छिपा था कि जब स्त्री अपनी दृष्टि से देखेगी, तब वह उस व्यवस्था को चुनौती दे सकती है जो उसकी सीमाएँ तय करती हैं। अधूरी आँखें व्यवस्था के लिए सबसे सुरक्षित थीं। पूरी आँखें सत्ता के लिए सबसे बड़ा भय। अरा की उंगलियाँ उसी द्वंद्व में थम गईं।


उसकी हथेलियों से लिपटी गीली मिट्टी अब केवल मूर्ति नहीं थी। यह स्त्रीत्व और नियंत्रण के बीच खड़ा एक जीवंत प्रश्न बन गई थी जो सभ्यता के आरंभ से चला आ रहा है। मिट्टी के गीलेपन पर उसकी उँगलियाँ फिर काँपीं। उसकी साँसें गहरी हो गईं। क्षण भर को जैसे मातृदेवी उसकी हथेलियों के ऊपर झुककर कह रही हो —


"दृष्टि दो, मुझे देखना है..."


लेकिन अरा के भीतर कोई गहरी अवमानना उतर आई थी। यह भय नहीं था, पर एक स्थापित पितृसत्ता की सच्चाई का बोध था। उसने अपनी उँगलियाँ पीछे खींच लीं। आँखें अधूरी रहीं। बस एक गहरी आकृति बनकर रह गईं — जिसमें कोई पुतली नहीं थी, केवल गोलाई थी। एक प्रतीक्षा — गहराई में डूबी प्रतीक्षा।


अरा पीछे हटकर मूर्ति को देखने लगी। बिना आँखों के भी चेहरा बोल रहा था। उसमें करुणा थी, मौन था, विचलित कर देने वाली एक उपस्थिति थी। बाहर ऋणाक बहती रही। सतह पर धूप के प्रतिबिंब हिलते रहे।  अरा जानती थी — अधूरापन ही सृष्टि का सबसे गूढ़ सत्य है।


जो कहा नहीं जा सकता, वही मिट्टी में बसता है।


मिट्टी उसकी भाषा थी। यह केवल शिल्प का माध्यम नहीं था — यह उसकी स्मृति और आत्मा का विस्तार था। बचपन से ही मिट्टी की गंध उसके भीतर घुलती रही थी। जब पहली बार पिता के साथ उसने मिट्टी को हथेलियों के बीच लिया था, तभी से उसने जाना था — मिट्टी बोलती नहीं है, पर सुनती है। हर स्पर्श को पहचानती है। हर कथा को अपने भीतर दर्ज कर लेती है।


उसकी उँगलियाँ मिट्टी पर चलते-चलते कभी रुक जाती थीं — जैसे मिट्टी कुछ कह रही हो जिसे शब्दों में कह पाना कठिन हो। मिट्टी की नमी में वही धूमिल स्मृतियाँ तैरती थीं, जिनसे जीवन आकार लेता है। पिता कहा कहते थे —  

"मिट्टी को सुनना सीखो अरा, मिट्टी कभी झूठ नहीं बोलती।"


आज जब उसने आँखें अधूरी छोड़ी थीं, तब वही संवाद फिर जाग उठा था। यह सृजन का संवाद था, जो शब्दों से रहित होता है।


नगर की दीवारों के भीतर अरा की मूर्तियों की चर्चा बढ़ने लगी थी। लोग उन्हें निहारते, पूजते थे। लेकिन सीहल के भीतर कुछ-अधूरा सा उतरता था। एक दिन वह पूछ बैठा —  


"अरा, यह जो तुम बनाती हो, यह सचमुच अद्भुत है। लेकिन भाषा कहाँ है इसमें?"


अरा मुस्कराई- "मिट्टी शब्दों की मुहताज नहीं होती, सीहल।"


"नहीं। तुम समझती नहीं," सीहल का स्वर ऊँचा हुआ - “मिट्टी की आकृति देखी जाती है, फिर मिट्टी में मिल जाती है। जब तक कोई नाम, कोई चिह्न न हो — तब तक यह सब विस्मृति है। इतिहास उसे ही जानता है जिसे पढ़ा जा सके।”


कुछ पल बाद अरा बोली, "क्या हर चीज़ को शब्दों में बाँधना ज़रूरी है? देखो सीहल, जब मैं मिट्टी को छूती हूँ, तो उसकी गंध, उसकी नमी — क्या इन्हें शब्दों में बाँधा जा सकता है? मिट्टी में जो अंकित है, वह आँखों से जाना जाता है। उसे पढ़ने के लिए किसी लिपि की आवश्यकता नहीं।"


सीहल थोड़ी देर चुप रहा। फिर बोला —  


"जब सभ्यता बनती है तो स्मृति को उसे संरक्षित करना पड़ता है। अगर भविष्य में लोग इस नगर को देखें — तो उन्हें यह जानने का अधिकार होगा कि इसका अर्थ क्या था। तुमने जो गढ़ा है, वह केवल तुम्हारा नहीं, वह सभ्यता का हिस्सा है। उसके नीचे कोई चिह्न बना दो — ताकि आने वाले समय में इसे पढ़ा जा सके।"


"क्या भविष्य को हर बात जानना आवश्यक है?" अरा ने पूछा - "शब्द सीमाएँ खींचते हैं, सीहल। मिट्टी में जो रहता है, वह बहता है। लेकिन शब्द उसे थाम लेते हैं, जैसे बहती धारा में कोई बड़ा पत्थर रख दिया जाए।"


सीहल चुप हो गया। लेकिन उसकी दृष्टि में चिंता थी। जैसे वह देख रहा हो — यह सारा सृजन बिना लिपि के गुम न हो जाए।


अरा जानती थी, यह बहस केवल भाषा की नहीं — यह सत्ता की भी थी। लिपिकार चाहता था कि हर चीज़ लिपिबद्ध हो — ताकि वह अमर रहे, जबकि अरा का संसार उस चुप्पी में पलता था जिसमें स्मृति बहती रहती है — बिना शब्दों के भी।


उसने अपने हाथों को देखा। मिट्टी अब भी पोरों पर चिपकी थी। जैसे वह कह रही हो —  


"तू मुझे आकार देती है, मैं तुझे पहचान देती हूँ। शब्द आए या न आए। मैं रहूँगी।"


ऋणाक नदी की ध्वनि भी शब्दों में नहीं थी — फिर भी वह नगर को छूती थी। अरा के भीतर गूंजती रही वही मूक भाषा —  

"जो कहा नहीं जा सकता, वही अकथनीय, मिट्टी में बसता है।"


ग्रामीण स्त्रियों का देखना — किंवदंती का जन्म 

सूरज क्षितिज से ऊपर उठ रहा था। ऋणाक की सतह पर फैली धुंध पानी के साथ बहती प्रतीत हो रही थी। घास पर ओस की बूँदें थीं, जिन पर सुबह की किरणें मोतियों की तरह चमक रही थीं। हवा में मिट्टी का गीलापन था वही गंध जो हर भोर नदी किनारे उतरती थी।  


नदी की ओर बढ़ती स्त्रियों के पाँव रेत में धँसते चले जा रहे थे। उनके पीछे पदचिह्न रेत पर आकृतियाँ बनाते जाते थे। सिर पर मटकियाँ सँभाले उनके शरीर की लचक सुबह की नमी के साथ एक लय में थी। किशोरियों की हँसी और नदी की लहरों का संगीत आपस में मिलकर एक सम्मिलित स्वर रच रहे थे।  


धीरे चलो बच्चियों,” आगे चलती वृद्धा ने कहा। रेत अभी जगी नहीं है। पानी की साँस भारी है।”  


जैसे ही वे उस पत्थर के पास पहुँचीं जहाँ कल अरा मूर्ति छोड़ गई थी, सबसे छोटी लड़की ठिठक गई।  

देखोयह वही अरा की बनाई मूर्ति है।”  


बाकी स्त्रियाँ पास आईं। कुछ ने मटकियाँ नीचे रख दीं। साड़ियों के पल्लू रेत से छूने लगे। पक्षियों की चहचहाहट दूर से सुनाई दे रही थी।  


इस बार कुछ अलग है,” किसी ने धीरे से कहा। सभी की दृष्टि मूर्ति के चेहरे पर टिक गई गालों में मातृत्व का उभार था, होठों पर अधूरी मुस्कान। पर आँखें वहाँ कोई दृष्टि नहीं थी, बस गहराई थी, ठहरी हुई गहराई।  


देवी है यह,” वृद्धा ने कहा।  


देवी?” बाकी स्त्रियाँ एक कदम पीछे हटीं।  


हाँ,” वृद्धा का स्वर गहरा हो गया। जब पहली बार देवी उतरती है, उसकी दृष्टि पूरी नहीं होती। अगर वह सब कुछ देख ले, तो धरती हिल जाएगी। अधूरी आँखें ही हमें बचाती हैं।”  


एक किशोरी ने पूछा, “अगर वह सब देख ले, तो क्या बुरा होगा?”  


वृद्धा कुछ पल चुप रही। उसकी आँखें नदी पार जंगलों की ओर चली गईं। बच्चियों…” उसका स्वर धीमा हो गया, “तुमने अपनी नानी से सुनी थी नएक कथा?”  


कौन-सी कथा, माई?”  


जब मैं तुम्हारी उम्र की थी,” वृद्धा बोली, “तब मेरी नानी कहती थी कि यहाँ एक देवी उतरी थी। उसकी आँखें पूरी खुली थीं। उसने सब देख लिया था आदमी का डर, उसका झूठ, उसका लालच सब कुछ।”  


फिर?”  


फिर धरती काँप उठी थी। गाँव उजड़ गए थे। किसी तपस्वी ने देवी से प्रार्थना की — ‘माँ, अपनी दृष्टि अधूरी कर लो। हमें जीने दो।’”  


स्त्रियाँ सिहर उठीं। छोटी बच्ची ने मटका कसकर थाम लिया।  


तभी से…” वृद्धा की आवाज़ फुसफुसाहट में बदल गई, “हमारी माँ अधूरी आँखों से देखती है। जो सब देख लेता है, वह डरावना होता है। जो आधा देखता है, वही दयालु बनता है।”  


और तब शायद वह पूछेगी भी,” किसी ने कहा।  


हाँ,” वृद्धा ने सिर हिलाया, “पूछना मतलब हिसाब माँगना।”  


किसी ने गीले हाथों से माथे पर मिट्टी लगाई। माई, तब क्या हमें उसकी पूजा नहीं करनी चाहिए?”  


अभी नहीं, बच्ची। अधूरी आँखों में करुणा है। वह देखती है, पर छोड़ देती है। यही हमारा सौभाग्य है।”  


ऋणाक की धारा में धूप झिलमिला रही थी। हवा, स्त्रियों की आवाज़ें और मिट्टी की गंध मिलकर एक अनकहा विश्वास रच रही थीं; और उसी क्षण पहली किंवदंती जन्म ले चुकी थी अधूरी आँखों वाली देवी की, जो धीरे-धीरे पूरे नगर में फैलने लगी थी।


रात का दृश्य देवी की नज़र


रात्रि गहरी थी। ऋणाक की सतह पर चंद्रमा की धुँधली किरणें काँपती हुईं बह रही थीं। हवा में भीगी मिट्टी की सोंधी गंध फैली थी। दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज़ें रात के सन्नाटे को बीच-बीच में चीर देती थीं।  


अरा अपने कक्ष में अकेली बैठी थी। मिट्टी के दीपक की मद्धम लौ कभी स्थिर होती, कभी हिलती। दीवारों पर झूलती छायाएँ धीरे-धीरे सिमट रही थीं। कमरे के कोनों में रखी पुरानी मूर्तियों की कतार किसी मौन दर्शक-मंडली की तरह उसे घेर रही थी।  


उस कक्ष में और कोई नहीं था, फिर भी उसे लगा कोई देख रहा है। पीठ के पीछे कहीं से हल्की गुनगुनाहट-सी सरक गई। त्वचा के नीचे से जैसे कोई धीमा स्पर्श रेंगता चला गया। वह धीरे से पीछे मुड़ी। मूर्तियाँ स्थिर थीं, पर उनकी अधूरी आँखों की गहराई में कोई अस्फुट कंपन और करुणा तैर रही थी।  


अचानक भीतर वही चेहरा जागने लगा अधूरी आँखों वाली मूर्ति का चेहरा, वही जिसे उसने दिन में गढ़ा था।  


क्या अधूरी आँखें भी देखती हैं?” — यह प्रश्न उसके भीतर उठता रहा। उसने आँखें मूँद लीं। पलकों के पीछे उस चेहरे की छवि अब और स्पष्ट हो गई। धीरे-धीरे एक अजीब-सी गर्मी उसकी गर्दन के पीछे उतरने लगी, फिर कंधे के नीचे, पीठ के साथ सरकती हुई रीढ़ के सिरे तक पहुँच गई। हथेलियों में भी हल्की नमी का स्पर्श जागा। उँगलियों के पोरों में जैसे कोई महीन झनझनाहट फैल गई। यह वही अनुभूति थी, जिसे उसने बचपन में पहली बार मिट्टी को छूते हुए जाना था।  


तब पिता ने उसके छोटे हाथों में मिट्टी रखी थी। वह हथेलियों में धीरे-धीरे नरम पड़ती जा रही थी। उँगलियों पर नमी थी, और मिट्टी किसी आकार की प्रतीक्षा कर रही थी। पिता ने उसके कान के पास झुककर कहा था —  

ध्यान से, अरा। मिट्टी तब तक शांत रहती है जब तक उसकी आँखें अधूरी रहती हैं। देखना एक बार बन गया तो उसे कोई रोक नहीं सकेगा।”  


तब वह इस बात को एक खेल समझ रही थी। पर आज वही चेतावनी उसके भीतर गूँज रही थी।  


दीपक की लौ अब स्थिर थी। कमरे की छायाएँ लंबी होकर दीवारों पर एक-दूसरे से मिलने लगी थीं। पूरा कक्ष जैसे किसी अदृश्य लय में बह रहा था।  


तू देख रही है?” — उसके भीतर यह स्वर उठा। उत्तर नहीं था, पर भीतर कहीं हलचल बनी रही। उसके कानों के पीछे हल्की जलन उठी। माथे पर पसीने की महीन नमी जम गई। पीठ की नसों में कोई सिहरन दौड़ने लगी। उसके भीतर कोई अज्ञात स्पंदन धीरे-धीरे गहरा होता जा रहा था।  


यह दृष्टि आदेश नहीं दे रही थी; यह करुणा थी किसी आदिम स्त्रीत्व की वही दृष्टि, जो न बाँधती है, न टोकती है; बस देखती है, समेटती है। उसके पैरों के तलवों में ठंडक फैलने लगी थी। गीली मिट्टी की स्मृति भीतर जागने लगी थी। उसने हथेलियाँ देखीं उँगलियों के पोरों पर अब भी वह नमी बनी हुई थी।  


बाहर ऋणाक की सतह पर चंद्रमा की परछाईं हिल रही थी। नदी का प्रवाह मंद स्वर में बह रहा था। अरा के भीतर जैसे एक गूढ़ संवाद स्थायी रूप लेने लगा था।  


दृष्टि अधूरी है, पर उपस्थिति पूरी है।”  


कमरे की हवा में वह अदृश्य दृष्टि अब भी फैली हुई थी। रात गहराती रही। देवी की अधूरी आँखों की नज़र उसकी साँसों के भीतर बहती रही।  



अगली सुबह मूर्ति नदी किनारे अकेली  


सूरज की पहली किरणें अभी क्षितिज से झाँक रही थीं। ऋणाक की सतह पर हल्का कुहासा तैर रहा था, जैसे जल स्वयं नींद की सलवटों में लिपटा हो। हवा में रात की बची हुई नमी थी। किनारे की मिट्टी से वही सुवास उठ रही थी जो अरा के बचपन से उसकी स्मृतियों में बसी थी।  


अरा धीरे-धीरे नदी की ढलान की ओर उतर रही थी। उसके पाँव गीली रेत पर धँसते, फिर उठते। हर कदम के पीछे बनते आकार बहाव की मंद लहरों से मिटते जा रहे थे। साड़ी का किनारा उसके टखनों पर झूल रहा था। बालों की कुछ लटें माथे पर चिपकी थीं।  


वह पत्थर के पास पहुँची और कुछ दूर रुक गई। हल्की धुंध के आर-पार मूर्ति अब भी उसी मुद्रा में थी। सूरज की पहली किरणें मूर्ति के चेहरे पर उतर रही थीं। मिट्टी की सतह पर सुनहरी आभा फैल गई थी। अरा के भीतर रात का वह दृश्य अब भी स्मृति की तहों में उमड़ रहा था। अधूरी आँखों की जो उपस्थिति उसने महसूस की थी, वह सुबह के इस खुले आकाश में जैसे चुपचाप स्वीकृति में बदल रही थी। धीरे-धीरे वह आगे बढ़ी। हर कदम के साथ भीतर कोई अव्यक्त शांति उतरती जा रही थी।  


वह मूर्ति के पास झुकी। मिट्टी शीतल थी, पर उसमें भीतर कहीं एक हल्की गरमाहट थी। उसने दोनों हाथों से मूर्ति को उठाया। मूर्ति का चेहरा उसके वक्ष से लग गया। उँगलियों के नीचे मिट्टी की सतह में एक हल्की धड़कन-सी महसूस हुई।  


तू वस्तु नहीं है…” — भीतर कोई स्वर उठा।  


उसने मूर्ति को गोद में थामे पत्थर पर बैठना शुरू किया। पत्थर की ठंडक उसके तलवों से होते हुए कमर तक पहुँच गई।  


सामने ऋणाक बह रही थी। जल की लहरें किनारे से टकराकर लौट रही थीं। सूरज अब ऊँचाई पर चढ़ने लगा था। अरा ने मूर्ति के चेहरे को अपनी उँगलियों से सहलाया। अधूरी आँखों के गड्ढों को हल्के से छुआ।  


देख रही हो न?” — उसने बुदबुदाया।  


उत्तर में केवल ऋणाक का स्वर था।  


अरा के भीतर अब न भय था, न जिज्ञासा केवल एक मौन स्वीकार। शायद यही सृजन का सबसे गहरा क्षण होता है, जहाँ पूर्णता नहीं, अधूरेपन में ही उपस्थिति का समर्पण छिपा होता है।  


सामने पक्षियों के झुंड उड़ान भरने लगे। ऋणाक की सतह पर सुबह का गाढ़ा प्रकाश चाँदी की तरह चमक रहा था और अरा के भीतर यह बात साफ़ होती जा रही थी देवी कोई वस्तु नहीं है, न कोई आदेश। वह मात्र उपस्थिति है एक जीवित साक्षी।  



अधूरी आँखें फिर प्रतीक की नींव  


सूरज की किरणें अब कुटी के भीतर तक उतर आई थीं। अरा धीरे-धीरे लौट रही थी, मूर्ति को थामे। मिट्टी की ठंडी सतह पर उसकी हथेलियों की ऊष्मा उतर रही थी, और अधूरी आँखें अब भी भीतर कुछ देखती-सी लग रही थीं।  


शिल्प-कक्ष में दीपक की लौ स्थिर थी। अरा ने मिट्टी को उठाया, गूँथा और हथेलियों के बीच रख लिया। हाथों की गति में एक लय थी मिट्टी उठती, झुकती और धीरे-धीरे किसी रूप में ढलने लगती। गालों की कोमल उठान, होठों की वक्रता और ठोड़ी की गोलाई उभरने लगी। फिर उँगलियाँ माथे तक पहुँचीं आँखों की जगह और वहीं ठिठक गईं।  


क्या इस बार आँखें पूरी कर दूँ?” — यह प्रश्न अब भय से नहीं, अनुभव से उपजा था।  


अरा के भीतर स्त्रियों की फुसफुसाहट, पिता की आवाज़ और रात की दृष्टि का स्पर्श एक साथ जाग उठा।  


क्या दृष्टि करुणा हो सकती है? क्या अधूरापन प्रेम को रचने का स्थान है?”  


फिर भी उसने पुतलियाँ नहीं बनाईं।  


शब्द सीमा हैं, अधूरापन खुला आकाश है।”  


उसने सिर झुका लिया। दीपक की लौ स्थिर रही। अरा के भीतर देवी का पहला स्थायी स्वरूप जागा —  

अधूरी आँखों वाली वह चेतना, जो शब्दों के परे है।●


अध्याय 11 - “माँ देख रही है” — पहली बार अरा रोती है।


देखना —

सभ्यता की सबसे प्राचीन भाषा है

शब्द रुक जाते हैं,

दृष्टि  ही फिर

उत्तरों का समंदर होती है


रिक्ति

शून्य नहीं होती —

वह तो स्मृति का पहला संकेत है!


मिट्टी  जब अर्थ से इंकार करती है,

तो समझो, उसके गर्भ में सबसे पुराना प्रेम पल रहा है।


जल

बिना नाम के भी बहता है —

न दुख, न कोई उत्सव,

बस बुद्ध की तरह निर्विकार, मौन रहता है


जो अधूरा दिखता है,

वही

दृश्य का सबसे सच्चा साक्षी होता है।


पुरानी निर्माणशाला में लौटती दृष्टि: बालिका की पहली निगाह।


नगर के भीतर शोर अब थम चुका था। दीवारें चुप थीं। नगरसभा के अधिकारी केवल अपनी उपस्थिति दर्ज करते थे। आदेश दोहराए जा रहे थे। हर कोने में देवी की वही आँखें दिखती थीं। नगर की जनता अब इन आँखों को देखना भी भूल चुकी थी।


नदी किनारे निर्माणशाला थी—वही, जिसमें पहली बार मिट्टी की देवी गढ़ी गई थी। अब वहाँ कोई नहीं आता था। चारों ओर धूल जम चुकी थी, औज़ार वैसे ही रखे थे। यह शाला आजकल नगर की स्मृति से बाहर हो चुकी थी।


बस बाला आती थी—नगर की सबसे छोटी बालिका। उसे नगर के आदेश नहीं मालूम थे। दीवार उसके लिए चढ़ने की चीज थी; औज़ार और मिट्टी उसे खेल जैसे लगते थे।


वह चुपचाप भीतर आई। कोमल कदम। कभी औज़ारों को, कभी दीवार के सहारे टिके मिट्टी के टुकड़ों को, कभी सतह पर जमी धूल को देखती। फिर उसकी नज़र उस कोने तक पहुँची जहाँ वह अधूरी मूर्ति रखी थी—अधूरी आँखों वाली।


निगाह मूर्ति पर ठहरी। गर्दन थोड़ी तिरछी हुई, और उसकी आँखें सीधे मूर्ति की आँखों में टिक गईं। वह बिल्कुल स्थिर रही—पलकें तक नहीं झपकीं।


धीरे से कहा—

“माँ देख रही है।”


कोई दूसरा नहीं था। आवाज़ दीवारों से टकराकर लौटी।


छोटी हथेलियाँ आगे बढ़ीं। उसने मूर्ति के गाल को हल्के से छुआ। मिट्टी ठंडी थी। दरार की खुरदरी रेखा उँगलियों पर महसूस हुई। फिर वही स्वर—

“माँ देख रही है।”


न विस्मय, न डर—बस एक सहज, अबोध बतकही। चेहरे पर छोटी मुस्कान। वह पास खड़ी रही और आँखों के भीतर देखती रही। उसे अधूरापन नहीं दिखा; उसे केवल आँखें दिखीं। और फिर बुदबुदाहट—

“माँ देख रही है।”


पुराने औज़ारों पर हल्की रौशनी फिसल रही थी। मिट्टी की सतह पर कोई पुराना निशान अभी भी बचा था। बाला ने उस मिट्टी की ओर देखा, फिर आँखों में लौट आई। उसके भीतर कोई सवाल नहीं था; बस एक बाल-जिज्ञासा थी—माँ देख रही है।


लेकिन यह वाक्य नगरसभा के आदेश से बड़ा था। यह बिना लिखी भाषा थी। एक अबोध अभिव्यक्ति। उसने आँखें टिकाए रखीं, फिर अपने दोनों हाथ जोड़ लिए। हथेलियाँ बहुत छोटी थीं। धीरे से फिर वही—

“माँ देख रही है।”


बाहर की हवा में हल्की ठंडक थी। दीवारों की दरारों से धूप बदल रही थी।


उसी समय बाहर से कदमों की आहट सुनाई दी—अरा आ रही थी। वही कक्ष, जहाँ उसने पहली बार देवी की आँखें अधूरी छोड़ी थीं। जब वह भीतर पहुँची, बाला का कहा हुआ वाक्य हवा में तैर चुका था; प्रतिध्वनि शेष थी।


अरा रुक गई। बालिका मूर्ति के सामने थी। धूप की रेखाएँ सरक रही थीं। अरा के भीतर एक हल्की गर्माहट उठी—न ग़ुस्सा, न डर—कुछ और।


“माँ देख रही है।”

यह वाक्य अरा के कानों में था, यद्यपि बाला अब चुप थी। शब्द कक्ष में तैर चुके थे; प्रतिध्वनि अब भी गूँज रही थी।


अरा की हथेलियाँ भींचीं। वर्षों पहले इन्हीं हाथों से उसने मिट्टी उठाई थी। उसने मूर्ति की ओर देखा—वही अधूरी आँखें। आज पहली बार वे सचमुच देखती हुई लगीं।


बाला स्थिर थी—बस देखना। अरा को लगा—यही वह देखना है जो कभी शब्द नहीं चाहता।


अरा के भीतर एक विचार चमका—

“मैंने इसे गढ़ने के बाद किसी की आँखों में देखना चाहा था, पर मैंने ही आँखें फेर लीं। आज यह बच्ची इन्हें सीधा देख रही है।”


उसकी चुप्पी में एक महीन दरार पड़ी; कोई भारी टूटन नहीं—बस भीतर कुछ पिघला।


बालिका की पीठ अरा की ओर थी। अरा का गला भर आया—यह रोना नहीं था; करुणा की बूँद थी।


भीतर स्वीकृति उभरी—

“अधूरा गढ़ना भी कभी-कभी पूर्ण देखे जाने का इंतज़ार करता है।”


बाला मूर्ति से हट गई। अरा की दृष्टि अब भी आँखों पर थी। उसे लगा—आज ये आँखें अपनी असली भाषा में लौट आई हैं—बिना शब्द के।


विचार फिर जागा—

“जो भाषा कभी बोली नहीं गई, वही सबसे लंबे समय तक बचती है।”

अरा ने यह स्वीकार किया।


बालिका पलटी। कोई संवाद नहीं हुआ। अरा ने सिर हिलाया—शब्दों के बिना स्वीकृति। बालिका मुस्कुराई; वह इतनी छोटी थी कि उसे पुष्टि की आदत नहीं थी। अरा उसे जाते हुए देखती रही—छोटे कदम, बिना शोर।


कक्ष में वही शांति फिर उतर आई। अब वह चुप्पी भीतर के बचे जलस्रोत की आर्द्रता से छू गई थी। अरा खड़ी रही; उसकी आँखें मूर्ति की आँखों में थीं। उसने पहली बार बिना डर के देखा।


उसकी हथेलियाँ अब भी गीली मिट्टी से दूर थीं, लेकिन भीतर मिट्टी की स्मृति से करुणा बहने लगी थी। दीवार से उतरती धूप की अंतिम रेखा मूर्ति के चेहरे से खिसक चुकी थी। अरा को लगा—जो छाया अब तक ठहरी थी, वह भी अब मिट रही है।


टूटते शब्दों के बीच पहला आँसू : स्मृति के गुप्त जल का बहाव


कक्ष की हवा थोड़ी भारी लगने लगी थी—जैसे हर बीते शब्द का भार उसमें घुलता चला गया हो। दीवार की दरारों से झाँकती धूप की रेखाएँ नीचे सरक रही थीं। ऋणाक की बहुत धीमी लहरों की प्रतिध्वनि शाला के नम पत्थरों में थम सी गई थी।

अरा मूर्ति के सामने खड़ी थी—वर्षों बाद, इतने पास। उसकी दृष्टि मूर्ति की उन आँखों पर टिकी थी जिनमें उसने कभी वह पतली वक्र रेखा डाली थी। उस समय वह रेखा अज्ञात थी, अब भी अज्ञात थी; लेकिन आज उसका स्पर्श भीतर तक उतर रहा था।


उसके भीतर बहुत पुराना जमा जल हल्के-हल्के हिलने लगा। यह कोई अचानक उठती भाप नहीं थी, यह वर्षों से जमी किसी मौन जड़ता का धीरे-धीरे पिघलना था। उसी अधूरेपन को उसने अपने भीतर भी पाल रखा था। शायद इसलिए यह मूर्ति आज भी उसके लिए पूरी थी।


“मैंने इस रेखा को क्यों डाला था?”

उसने खुद से कहा। यह पहली बार था जब प्रश्न अपने आप बाहर आ रहा था।


बालिका बाला अब भी दरवाज़े के पास खड़ी थी। उसकी उपस्थिति जैसे कक्ष की हल्की साँस बन गई थी। अरा ने मूर्ति को देखा। अधूरी आँखों के भीतर उस महीन रेखा में आज उसे गहराई दिखने लगी थी। उस समय वह रेखा उसकी पहली असहमति थी—अब वही उसकी पहली स्वीकृति बन रही थी।

उसकी पलकों के कोनों में जल इकट्ठा हो रहा था। साँस गहरी हुई। वह शब्दों से बचना चाह रही थी, लेकिन शब्द भी अब भीतर से टूटकर बहने लगे थे।


“मैंने इस रेखा में अपनी असहमति रखी थी। यही मेरी पहली गवाही थी। मैं इसे पूरा नहीं कर सकी—शायद इसलिए कि भीतर भी कुछ अधूरा रह गया था।”


यह रोना नहीं था; यह उस टूटते बाँध का पहला, हल्का रिसाव था।


“प्रेम में भी यही रिक्ति थी। भाषा में भी। गिराग की सत्ता में भी। हर बार मैं अर्थ से बचती रही, लेकिन हर चुप्पी ने इस मूर्ति में जगह पाई।”


यह काँपना शब्दों का नहीं, भीतर के जल का था। हल्की बूँदें उसकी आँखों से गालों पर फिसल आईं। उसने उन्हें पोंछा नहीं।


“शब्दों को बाँधना सत्ता का काम है, लेकिन जो बोला नहीं गया—वही बचता है। यही मेरी भाषा थी, जिसे किसी ने नहीं पढ़ा।”


उसकी आवाज़ धीमे, गीले पंख की तरह गिर रही थी।

अरा के भीतर अब जल बहने लगा था। यह पहली बार था जब वह इस मूर्ति के सामने रो रही थी।


बालिका धीरे से आगे बढ़ी। उसने अपनी छोटी हथेली अरा की हथेली पर रख दी।

अरा ने उसकी आँखों में देखा।

“तुमने मुझे फिर से देखना सिखाया है।”

बालिका ने बहुत धीमे स्वर में कहा, “माँ देख रही है।”

अरा ने थकी मुस्कान के साथ उत्तर दिया, “हाँ, माँ देख रही है।”


दीवारों की दरारों से उतरती धूप मूर्ति के पैरों तक सरक आई थी। बाहर ऋणाक की ध्वनि अब बहुत हल्के स्वर में बह रही थी।

अधूरी आँखों वाली मूर्ति वैसे ही खड़ी थी।

लेकिन आज अरा के भीतर यह अधूरापन पहली बार पूर्णता की तरह थम गया था।

कोई घोषणा नहीं, कोई आवाज़ नहीं—बस भीतर की एक घनीभूत स्वीकृति।


आंतरिक स्वीकृति: अधूरी आँखों की पूर्णता


कक्ष में हवा अब स्थिर हो चुकी थी। दीवार की ऊँचाई से उतरती धूप फर्श तक पहुँचने लगी थी। धूल के कण हल्की रोशनी में सूक्ष्म चिह्नों की तरह दिखते थे। हर वस्तु जैसे अपने भीतर स्थिर थी।


अरा उसी स्थान पर खड़ी थी जहाँ उसकी आँखों से पहला जल गिरा था। बालिका पास थी — उसकी छोटी हथेली अरा की हथेली से लगी थी; यह बस साथ होने का एक सरल स्पर्श था। मूर्ति के सामने खड़ी अरा अब किसी अर्थ की खोज नहीं कर रही थी। वह आँखों के भीतर देख रही थी, बिना पढ़ने की कोशिश के। जो अधूरा था, वही अब उसके भीतर पूर्ण दिख रहा था।


अरा के मन में विचार उठा — “कितना प्रयास किया था मैंने इसे पूरा करने के लिए। शायद इसी अधूरेपन ने मुझे गढ़ा था।”

जहाँ यह रिक्ति कभी असहजता थी, आज वह स्थिर थी।


उसी के भीतर फिर स्वर उठा — “अधूरी आँखें ही सबसे अधिक देख पाती हैं।”


यह अधूरापन अब किसी शिल्पीय त्रुटि का चिह्न नहीं था, बल्कि स्वयं में एक भाषा था।


बालिका ने उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में कोई प्रश्न नहीं था। उसने अरा की हथेली को थोड़ा दबाया।

“अब सब ठीक है?” उसने धीरे से पूछा।

अरा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा — “अब सब जैसा है, वैसा है।”

बालिका के चेहरे पर राहत की मुस्कान उतर आई।


मिट्टी की गंध अरा के भीतर तक उतर रही थी — यह अब किसी अधूरी पीड़ा की नहीं, बल्कि पूरी स्मृति से लिपटी थी।

उसने धीरे से कहा — “यह मिट्टी अब मेरे भीतर नहीं रही, लेकिन इसकी स्मृति मेरे भीतर रह गई है।”


धूप मूर्ति के पैरों तक पहुँच चुकी थी। चेहरे पर हल्की छाया आ चुकी थी। अरा ने मूर्ति को देखते हुए सोचा — “देवी का चेहरा भी अब इस छाया में स्थिर हो चुका है। भाषा की सबसे गहरी शांति छाया में ही उतरती है।”


भीतर का जल बह चुका था। जो बचा था, वह हल्की नमी थी।


उसने मन ही मन कहा — “मैंने इस अधूरी आँख में अपनी असहमति, चुप्पी, प्रेम, भय और सत्ता से बचने की कोशिश — सब कुछ रख दिया था। अब यह रिक्ति मेरा अवशेष बन गई है।”


बालिका मूर्ति की ओर मुड़ी। “माँ अब हँस रही है,” उसने निष्कपट स्वर में कहा।

अरा ने उसकी ओर देखा — “शायद हाँ। माँ अब बस शांत है।”


बाहर ऋणाक की लहरें और धीमी बह रही थीं।

अरा के भीतर विचार उठा — “जो अधूरा है, वही स्मृति में सबसे स्थायी रहता है। जिसे भाषा नहीं बाँध पाई, वही भाषा का अंतिम शेष बन जाता है।”


बालिका मूर्ति के पास खड़ी हो गई। “माँ अब कुछ नहीं कह रही है।”

अरा ने धीमे स्वर में उत्तर दिया — “कभी-कभी कहना ज़रूरी भी नहीं होता।”


धूप अब कक्ष के दूसरे कोने तक पहुँच चुकी थी।

अरा ने मूर्ति की ओर देखकर कहा — “मैंने इस मिट्टी को कभी पूरी तरह नहीं छोड़ा। अब यह मेरी अनुपस्थिति में पूर्ण है।”

फिर मन-ही-मन जोड़ दिया — “यह अब मेरी नहीं रही, लेकिन मैं अब इसी के भीतर रहूँगी।”


बालिका ने सिर उठाकर पूछा — “अब यह मूर्ति यहीं रहेगी?”

अरा ने उसकी ओर देखते हुए कहा — “हाँ। यही स्मृति है, यही बचेगा।”


कक्ष की हवा हल्की हो गई थी। बाहर से ऋणाक की लहर धीमी फुसफुसाहट की तरह सुनाई दे रही थी।

मिट्टी, स्मृति और अधूरापन — अब स्थिर हो चुके थे।


कहानी: सिरेमिक पॉट 

- सुशील कुमार 


सिनॉप्सिस

 ‘सिरेमिक पॉट ' पिता-पुत्र संबंधों में आए शहरी बदलाव और सांस्कृतिक विस्थापन की कहानी है। कथा-नायक समीर अपने पिता को गाँव से शहर लाता है, लेकिन पिता की ग्रामीण आदतें उसके आधुनिक फ्लैट की 'एस्थेटिक' और 'हाइजीन' वाली दुनिया से टकराती हैं। यह द्वंद्व तब गहराता है जब पिता द्वारा लाई गई मिट्टी और कनस्तर को कृत्रिम 'कोको-पीट' और 'सिरेमिक गमले' से बदल दिया जाता है। कहानी यह पड़ताल करती है कि कैसे आधुनिक जीवनशैली में रिश्तों को भी वस्तुओं की तरह 'फिट' करने की कोशिश की जाती है और अंततः अनुपयोगी होने पर उन्हें त्याग दिया जाता है।


कहानी 

1.

मैं चाहता था कि ढलती उम्र में पिता मेरे साथ रहें। लेकिन यह समझ नहीं पा रहा था कि मेरे पिता दुनिया के बाकी पिताओं से अलग हैं या दुनियाभर के सारे पिता भी मेरे पिता की तरह ही होंगे और अलग दरअसल मैं ही हूँ। गाँव में अकेले बयासी साल की उम्र वे अपने आपको कैसे सँभालेंगे, यह सवाल कई दिनों से मुझे मथ रहा था। आखिरकार पत्नी की ढेर सारी बंदिशों और शर्तों के बावजूद मैं पिता को ले आने गाँव पहुँच गया।


पुराने घर के सामने खड़े होकर बाबूजी कुछ देर चुपचाप उसे निहारते रहे। घर की दीवारें जैसे उन्हें  पहचान रही थीं। दरवाज़े पर ताला लगाने से पहले उन्होंने चौखट पर दुलार से हाथ फेरा—“हम फिर लौटेंगे”—यह बात उन्होंने मुझे नहीं, उस घर को कही थी।    साथ में उन्होंने एक टिन के डिब्बे में गाँव की मिट्टी और तुलसी के कुछ पौध रख लिए।

मैंने कहा, “बाबूजी, यहाँ से मिट्टी मत ले जाइए, मैं नर्सरी से अच्छे इंडोर प्लांट्स और गमले ला दूँगा।

     लेकिन वे शुरू से जिद्दी, सनकी और प्रतिक्रियावादी रहे हैं। उनके आगे किसी का बस नहीं चलता। शहर पहुँचे तो भीड़-भाड़  देखकर बड़बड़ाए, “इहाँ आदमी आदमी को नहीं  पहचानता। सब अपने आप में मस्त-मगन हैं।

मैंने उनकी बातों की काट की, “यहाँ लोगों के पास काम बहुत है और समय कम है। आप तो अपने फ्लैट में रहेंगे।

     आगे स्काईलाइन टॉवर दिखा। पंद्रह मंज़िला इमारत। काँच और लाइट का अपूर्व संयोजन। उसकी सज-धज और चकाचौंध देखकर उनको हैरानी हुईलेकिन यह सोचकर ज्यादा परेशान हुए कि लोग पंद्रह मंजिलों पर रह कैसे लेते हैं। लिफ्ट में दाखिल हुए तो सहम गए। लिफ्ट झटके से ऊपर चली।  उन्होंने टिन के डिब्बे को दोनों हाथों से कसकर पकड़ लिया। उससे मुट्ठीभर के करीब भुरभुरी मिट्टी डिब्बे से टघरकर लिफ्ट के फर्श पर गिर गई। लिफ्ट रुकते ही स्काईलाइन की सेक्रेटरी सुजाता मैडम दाखिल हुईं। मिट्टी को देखते ही उनकी नाक-भौं थोड़ी सिकुड़ गई। डिब्बा देखकर कहा

ओहसमीर, यहाँ कैमरा लगा है। लोग बहुत ध्यान देते हैं साफ़-सफ़ाई पर।” सुजाता मैडम तीसरी मंज़िल पर उतर गईं। जाते-जाते बोलीं—“समीर, कोशिश कीजिए कि ऐसी चीज़ें दोबारा न हों।

बाबूजी शर्मिंदा हो गए। मैंने झेंपते हुए कहा अरे, गाँव से थोड़ी चीज़ लाई है बसकोई दिक्कत नहीं। सॉरी! अभी साफ किए देता हूँ। मैंने झट पैंट की पॉकेट से अपना रुमाल निकालाकीमती झक् सफ़ेद रुमालऔर हबड़-दबड़ में फर्श को  पोंछने लगा।


पंद्रहवीं मंज़िल पर लिफ्ट रुकी। दरवाज़ा खुलते ही लंबा-सा कॉरिडोर सामने था। साफ़ चमचमाता फर्श, हलकी पीली लाइट, हल्के गुलाबी रंग की एक-सी दीवारें और उसके किनारे कीमती डेकोरेशन!


अरे, सब बंद-बंद लगता है! कोई दिखाई भी नहीं देता इहाँ,” —बाबूजी अचकचाकर बोले, “हमारे गाँव में तो घर के आगे ही आधा गाँव बैठा रहता है। दिनमान बात-विचार, हँसी- ठिठोली होते रहती हैं।

  

मैंने हँसने की कोशिश की, “यहाँ लोग काम से चूर होकर लौटते हैं तो सीधे अपने कमरे के भीतर चले जाते हैं। बाहर बैठने का सिस्टम नहीं है।

फिर बात किससे करेगा आदमी?” उन्होंने सचमुच जानना चाहा। पिता स्वभाव से बहुत बहसतलब और बातूनी हैं। गाँव में निठल्ले बुजुर्गों की जमात उन्हें बहुत प्रिय है, जिनका कोई काम-धंधा नहीं होता और दिन उठने  से बेला डूबने तक गोल-गोल गपड़- गपड़ बतियाते रहते हैं। वे भी उनमें शरीक हो जाते हैं। 

     अंदर आकर बीच कमरे में खड़े रह गए। पूछा, “इहाँ बैठने की जगह कहाँ है?”

सोफे पर बैठिए न बाबूजी,” मैंने कहा।

वे संकोच से मुस्कुराए, “इतनी चमकदार चीज़ पर बैठने में डर लगता है, कहीं कुछ गिर-टिर न जाए।फिर  एक कोने पर जरा-सी जगह में सिकुड़ कर बैठ गए। पत्नी पानी लेकर आई।बाबूजी, ये आपका कमरा है,” उसने अंदर इशारा किया। बाबूजी कमरे में गए, बेड देख कर थोड़ा भन्नाए। गद्दे को दबाया।डूब जाएगा शरीर इसमें तो,” —बुदबुदाए, उनको घर का ओढ़ना-बिछौना याद हो आया।

    वापस हॉल में लौटा तो पत्नी ने फुसफुसाकर पूछा, “देखा आपने? शुरुआत से ही कितना अनकंफर्टेबल हैं। आपको पहले ही कहती थी, यहाँ उन्हें टिकाना आसान नहीं होगा।

मैंने कहा, “तो क्या करता? अकेले गाँव में छोड़ देता? धीरे-धीरे एडजस्ट कर जाएंगे।

उसने कंधे उचकाए, “बस इतना है किसोसाइटी”  से कोई शिकायत न आए।

उसकी शंका भी गलत नहीं थी। लेकिन उसको सुनते-सुनते मुझे लगने लगा कि यहाँ पिता नहीं, जैसे कोईकेसआ गया है जिसे परखना है, संभालना है, क्योंकि मेरे पिता संसार के आठवें अजूबे थे। किसी भी बात को छिलने और उसमें मीन-मेख़ निकालने की उनकी पुरानी आदत थी।


रात को खाने के वक्त बाबूजी टेबल पर चुपचाप थे। थाली में सब्ज़ी, रोटी, दाल, सलाद सब थे। उन्होंने एक-एक चीज़ गौर से देखी, फिर बोले, “ठीक हैखाना तो हर जगह खाना ही होता है, बस जगह और तरीके बदल जाते हैं।

मैंने मजाकिए लहजे में पूछा, “तो फिर शहर इतना बुरा नहीं लगा ना, बाबूजी?”

उन्होंने खिड़की की तरफ देखा, जहाँ से दूर-दूर तक बस इमारतों की कतारें दिख रही थीं।अभी कह नहीं सकते,” —उन्होंने सीधा जवाब दिया, “जमीन दिखेगी, तब बताऊँगा।

उस रात मुझे लगा, मैंने अपने पिता को शहर में नहीं, एक  बंद अलमारी के सबसे ऊँचे खाने में रख दिया हैजहाँ वे सुरक्षित तो हैं, मगर हाथ बढ़ाकर उन्हें छुआ नहीं जा सकता।


2.

अगली सुबह की शुरुआत चिड़ियों की चहचहाहट से नहीं, फ्लश के एक लंबे और कर्कश शोर से हुई। घड़ी में साढ़े पाँच बज रहे थे। शहर के हिसाब से यह गहरी नींद का समय होता है, लेकिन बाबूजी के लिए दिन चढ़ चुका था।

मैं ड्राइंग रूम में आया। बाथरूम का दरवाज़ा बंद था, लेकिन अंदर से बाल्टी खिसकाने और लोटे के गिरने इत्यादि की आवाज़ें आ रही थीं। हमारे यहाँ बाथरूम में सन्नाटा रहने का रिवाज है, लेकिन बाबूजी की प्रक्रिया किसी अनुष्ठान जैसी लंबी होती थी। पौने एक घंटे बाद दरवाज़ा खुला। बाबूजी बाहर निकले। चेहरे पर ताजगी नहीं, थकान और झुंझलाहट थी। धोती घुटनों तक चढ़ा रखी थी।

समीर,” उन्होंने शिकायत के स्वर में कहा, “इस कुर्सी वाले संडास में पेट साफ़ नहीं होता। आदमी का ज़ोर बनता ही नहीं। यह बीमारों के लिए है क्या?”

बाबूजी, यहाँ का यही सिस्टम है,” — मैंने धीमी आवाज़ में कहा ताकि नूपुर न जाग जाए, “पैरों के नीचे आगे से स्टूल रख दूँगा।

सिस्टम...” —वे बुदबुदाए, “शरीर का भी अपना सिस्टम होता है, वह तुम्हारे स्टूल से नहीं चलता।

वे बालकनी की तरफ बढ़ गए। मैं बाथरूम में घुसा। अंदर का नज़ारा देखकर माथा ठनका। पूरा फर्श गीला था। कमोड की सीट पर चप्पल के निशान थे। साफ़ था कि बाबूजी सीट पर बैठे नहीं, चढ़कर उकड़ूँ बैठ गए थे। मैंने जल्दी से वाइपर उठाया। मैं एक बेटे की तरह नहीं, ‘क्राइम सीनसाफ़ करने वाले किसी जमादार की तरह जल्दी-जल्दी पानी धकेलने लगा। नूपुर को गीला बाथरूम पसंद नहीं। मुझे पिता की आदत और पत्नी की शर्तों के बीच एकसैनिटरी इंस्पेक्टरकी भूमिका निभानी पड़ रही थी।

  जब मैं बाहर आया, नूपुर किचन में थी।बाथरूम से कैसी आवाज़ें आ रही थीं?” उसने पूछा। 

कुछ नहीं, बाल्टी जरा खिसक गई थी, सामान इधर- उधर बिखर गया था। उसे करीने से सजा दिया, बस!” — मैंने बात टाल दी।

तभी बालकनी से एक आवाज़ आई— ‘खच-खच... थू!

नूपुर का हाथ रुक गया। उसने मेरी तरफ देखा। मैं तेज़ी से बालकनी की तरफ लपका। बाबूजी रेलिंग के पास खड़े मुँह में नीम की दातून चबा रहे थे और नीचे झाँककर थूक रहे थे।

बाबूजी!” —मेरी आवाज़ तेज़ हो गई, “यह क्या कर रहे हैं?”

वे चौंके। होठों के किनारे पीला थूक लगा था— “दातून कर रहे हैं। क्यों, इहाँ दातून करने पर भी टैक्स लगता है क्या?”

दातून करने पर नहीं, थूकने पर दिक्कत है। हम पंद्रहवीं मंज़िल पर हैं। नीचे लोग रहते हैं।

हवा में थूक रहे हैं,” उन्होंने मासूमियत से तर्क दिया, “इतनी ऊपर से नीचे जाते-जाते तो भाप बन जाता होगा।

भाप नहीं बनता, गंदा होता है। आप बाथरूम के बेसिन में क्यों नहीं कर लेते?”

जहाँ मुँह धोते हैं, कुल्ला करते हैं, वहीं गंदगी थूक दें? बेसिन साफ़-सफाई के लिए होता है, गंदगी के लिए नाली होती है।

तभी इंटरकॉम की घंटी बजी। नूपुर ने कहा, “उठाओ। गार्ड होगा।

गार्ड की आवाज़ रूखी थी, “सर, कंप्लेंट आई है। आपके फ्लैट से ऊपर से कुछ कचरा गिरा है।

मैंनेजी, सॉरी, पानी था।कहकर फोन रख दिया। झूठ बोलना अब मेरी आदत में शामिल हो रहा था। नूपुर ने कॉफी का मग रखा और आँख तरेर कर कहा — “मैंने कहा था समीर। यह दातून-वातून यहाँ नहीं चलेगा। उन्हें ब्रश और पेस्ट दो।

पेस्ट से उबकाई आती है मुझे,” —बाबूजी अंदर आते हुए बोले, “मुँह में झाग भर जाता है।

तो फिर बेसिन में करना पड़ेगा,” नूपुर ने सपाट लहजे में फैसला सुनाया। बाबूजी ने दातून जेब में रख ली, जैसे कोई कीमती खजाना छुपा रहे हों।

उस दिन के बाद से हर दिन फ्लैट का भूगोल बदलने लगा। तीन बेडरूम का वह एस्थेटिक भव्य फ्लैट बाबूजी के लिए किसी कैदी गृह की तरह लगने लगा। वे केवल अपने कमरे और बालकनी के उस कोने तक सीमित हो गए, जहाँ एसी का आउटडोर यूनिट रखा था। वे सोफे पर बैठने से कतराने लगे। उठने के लिए उन्हें मशक्कत करनी पड़ती थी, जो उन्हें अपनी कमजोरी का अहसास कराती थी। इसलिए अक्सर ज़मीन पर गमछा बिछाकर बैठ जाते।

नूपुर टोकती—"सोफे पर बैठिए न बाबूजी।

बाबूजी कहते—"रीढ़ की हड्डी ज़मीन पर ही सीधी रहती है बहू।

हकीकत यह थी कि उन्हें डर था उस सफ़ेद सोफे को गंदा हो जाने का।

रात को खाने की मेज पर सब चुप थे। बाबूजी दोनों हाथ से रोटी तोड़कर खा रहे थे। दाल उंगलियों से बहकर कलाई तक आ रही थी। नूपुर की कनखियाँ बाबूजी के हाथों पर टिकी। उसने टिश्यू बॉक्स सरकाया। बाबूजी ने टिश्यू से उंगलियाँ पोंछने की कोशिश की तो गीला कागज़ चिपक कर बिखर गया। नज़ारा करुण भी था और कुछ हद तक वीभत्स भी।

रहने दीजिए,” मैंने उठकर पानी का कटोरा (बाउल) ला दिया।

बाबूजी ने हाथ धोए। थोड़ा पानी मेज के रनर पर छलक गया।ओह!,” वे बुदबुदाए।

नूपुर ने खाना छोड़ दिया।मेरा हो गया,” कहकर उठ गई।

बाबूजी ने निवाला वापस थाली में रख दिया।भूख मर गई,” उन्होंने धीरे से कहा।

    उस रात बगल के कमरे से बाबूजी के तकिए में मुँह दबाकर खांसने की आवाज़ आती रही। फ्लैट की हवा में एक अनकहा तनाव घुल गया था। घर का सजा-संवरा 'एस्थेटिक' रूप भी बिगड़ने लगा था। 

यह जीने के ढंग का टकराव था, जिसमें हार उसी की हो रही थी जो पुराना और आउटडेटेड था।


3.

शाम होते-होते नूपुर ने लिविंग रूम की मुख्य लाइटें बंद कर कोनों में लगे लैंप जला दिए। हल्की नीली-पीली रोशनी ने कमरे को एक रहस्यमयी शक्ल दे दी। सेंटर टेबल से बाबूजी का अखबार हटाकर क्रिस्टल का बाउल रखा गया। आज ऑफिस की एक अनौपचारिक 'गेट-टुगेदर' थीप्रोजेक्ट सक्सेस पार्टी।

   तैयारी के बीच नूपुर मेरे पास आई। उसके हाथ में व्हिस्की के गिलासों की ट्रे थी, जिसे वह बहुत सलीके से पोंछ रही थी।

समीर," —उसने आवाज़ नीची रखी, “बाबूजी को खाना पहले दे दें? मेहमान आएंगे तो शोर होगा, वे डिस्टर्ब होंगे।" 

यह 'डिस्टर्ब' शब्द बहुत चालाकी से चुना गया था। वह उन्हें अपनी दुनिया से छिपाना चाहती थी। मैं बाबूजी के कमरे में गया। पूछा— “बाबूजी, आज कुछ दोस्त आ रहे हैं। थोड़ी देर बैठेंगे। आप खाना यहीं कमरे में खा लेंगे?”

बाबूजी मुड़े। उनकी आँखों में समझदारी की चमक थी।हम्म, भीड़-भाड़ होगी। ठीक है। मेरा खाना यहीं भिजवा देना।मैंने अपने पिता को उनके ही कमरे में 'नज़रबंद' कर दिया था।

       रात के आठ बजते ही मेहमान आने शुरू हो गए। सिद्धार्थ आया, उसके साथ रिया और दो-तीन अन्य 'कलीग्स। ड्राइंग रूम भर गया। हवा में महंगे परफ्यूम और हँसी की आवाज़ें तैरने लगीं। बातें वहीबॉस की बुराई, शेयर मार्केट, नए-नए फ़ैशन के ताजे गेट-अप, हँसी-मज़ाक के नए नुस्खे और नेटफ्लिक्स। तभी मेरी नज़र कॉरिडोर पर पड़ी। बाबूजी अपने कमरे के दरवाज़े पर खड़े थे। पुरानी धोती, सफ़ेद बनियान, कंधे पर गमछा और हाथ में स्टील का लोटा। उस डिज़ाइनर कॉरिडोर में वे किसी दूसरी सदी के प्राणी लग रहे थे।

      सन्नाटा छा गया। नूपुर ठिठक गई।

हु इज़ ही?” सिद्धार्थ ने पूछा।

मेरे फादर हैं,” मैंने कहा।बाबूजी, आपको कुछ चाहिए था?”

पानी,” उन्होंने लोटा ऊपर उठाया, “जग में खत्म हो गया था।

ओह! प्लीज कम,” सिद्धार्थ ने उत्साह से कहा।नमस्ते अंकल जी! प्लीज बैठिए न। उसने जबरदस्ती सोफे पर जगह बनाई।समीर, ही लुक्स सो... ऑथेंटिक। बाबूजी सोफे के किनारे पर सिकुड़ कर बैठ गए। लोटा गोद में था। लोग उन्हें ऐसे देख रहे थे जैसे चिड़ियाघर में कोई नई प्रजाति हो।

अंकल, आप गाँव से हैं?” रिया ने पूछा।

हाँ बेटी।

वाओ,” सिद्धार्थ बोला, “गाँव... द रियल इंडिया। हम लोग तो यहाँ मशीनों की तरह जी रहे हैं। असली ज़िंदगी तो अंकल जी रहे हैं। रूट्स। जड़ें। अंकल, आपको तो यहाँ बहुत घुटन होती होगी न? वहाँ खुली हवा, खेत, ऑर्गेनिक खाना...

बाबूजी ने सपाट, निर्विकार स्वर में कहा, “हवा तो है वहाँ, पर बिजली नहीं रहती। रात को मच्छर काटते हैं।

सिद्धार्थ हँसा, “बिल्कुल! यही तो स्ट्रगल है। बट द पीस... वह शांति जो वहाँ है, वह यहाँ कहाँ?”

अंकल,” — वह रुका नहीं, “मैं हमेशा सोचता हूँ रिटायर होकर गाँव में बस जाऊँ। अपना उगाउँ, अपना खाऊँ। यू आर कनेक्टेड टू द अर्थ। बताइए, सुबह उठकर मिट्टी की खुशबू... वह फीलिंग ही अलग होती होगी न?”

बाबूजी ने गला साफ़ किया। उनकी धीमी आवाज़ सन्नाटे में साफ़ सुनाई दी, — “बेटा, मिट्टी की खुशबू तब अच्छी लगती है जब पेट भरा हो।

 सिद्धार्थ की मुस्कान फीकी पड़ी।मतलब?”

मतलब यह कि चिड़िया की आवाज़ सुनने का वक्त किसान के पास नहीं होता। उसे डर रहता है कि चिड़िया बीज न चुग जाए। जिसे तुम शांति कहते हो, वह वहाँ सन्नाटा है। मजबूरी का सन्नाटा। कोई डॉक्टर नहीं, स्कूल नहीं, सड़क नहीं... इसलिए धूम-धड़ाम और शोर नहीं। तुम जिसे 'सुकून' समझकर तरसते हो, हम उसे 'गरीबी' कहते हैं।

कमरे में भारी चुप्पी गिर गई। बाबूजी रुके नहीं— “और यह आर्गेनिक-वार्गेनिक... धूप में चमड़ी जलानी पड़ती है, तब अनाज उगता है। तुम लोगों को वह 'रोमांटिक' लगता है क्योंकि तुम एसी कमरों में बैठकर बात करते हो। दो दिन कुदाल चलानी पड़े, तो यह सारी 'रूट्स' भूल जाओगे। 

बाबूजी ने अपना लोटा उठाया।पानी मिल गया। तुम लोग बातें करो। हम सोने जा रहे हैं। वे वापस अपने कमरे की तरफ बढ़ गए। पीछे छोड़ गए एक असहज, चुभती हुई खामोशी।    

       वह 'विंटेज शो-पीस' अचानक बोल पड़ा था और उसने वह सच बोल दिया था जिसे सुनने की ताकत इस पार्टी में नहीं थी।

पार्टी पंद्रह मिनट में खत्म हो गई। सब जल्दी-जल्दी निकल गए। नूपुर ने दरवाज़ा बंद किया और मेरी तरफ मुड़ी, आँखों में आग लिए, “कहा था मैंने, उन्हें अंदर ही रहने देना।


मुझे अपने दोस्तों के जाने का दुःख नहीं था, मुझे दुःख इस बात का था कि मेरे पिता ने मेरी 'सोशल इमेज' की धज्जियाँ उड़ा दी थीं। मैं तेज़ कदमों से बाबूजी के कमरे में गया।बाबूजी!मैं पहली बार उन पर जोर से झल्लाया-ज़रूरी था बाहर आकर यह सब बोलना? वे मेरे मेहमान थे। आपने उनकी बेइज्जती कर दी।

बाबूजी ने शांत स्वर में कहा, “वे पूछ रहे थे, तो बता दिया। झूठ बोलते तो अच्छा लगता?”

हाँ! कभी-कभी झूठ बोलना पड़ता है। इसे शिष्टाचार कहते हैं। आप अपनी दुनिया में रहिए न।

बाबूजी भीतर से काँप गए। फिर कुछ नहीं बोले, बस सिर झुका लिया।

खाना बाहर रखा है, खा लीजिएगा,” कहकर मैंने दरवाज़ा धड़ाम से बंद कर दिया। फ्लैट में अब वह 'शांति' थी जो एक खाई बनकर हमारे बीच पसर गई थी।


4.

अगले दिन जब मैं ऑफिस से लौटा, तो घर में एक अजीब तरह कीव्यवस्थितशांति थीआईसीयू जैसी। मैंने जूते उतारे। बाबूजी का कमरा बंद था।

समीर, फ्रेश हो जाओ, चाय बनाती हूँ,” —नूपुर किचन से बोली। उसकी आवाज़ में एक असामान्य उत्साह था।

मेरी नज़र बालकनी पर पड़ी। मेरे कदम ठिठक गए। बालकनी बदल चुकी थी। वह कोना, जहाँ बाबूजी अक्सर अपनी कुर्सी डालकर बैठते थे और जहाँ एसी के पीछे उन्होंने अपना जंग लगा टिन का डिब्बा थोड़ा ओझल करके रखा था, अब वहाँ वह  नहीं था। वहाँ ज़मीन पर हरे रंग कीआर्टिफिशियल ग्रासबिछी थी। दीवार पर नई रैक और कोने में एक बड़ा, सफ़ेद और चमकदारसिरेमिक पॉटरखा था। उसमें वही तुलसी का पौधा लगा था, लेकिन उस सफ़ेद, चिकने गमले में वह पौधा किसी अनाथ बच्चे की तरह लग रहा था।

यह क्या है?”

नूपुर पीछे आकर खड़ी हो गई, “सरप्राइज़! कैसा लग रहा है? माली ने पूरा सेटअप किया। वह टिन का डिब्बा कितना गंदा लगता था!  लाल पानी रिस रहा था।

पुराना डिब्बा कहाँ है?”

फेंक दिया,” उसने सहजता से कहा, “वह कबाड़ था। माली ने पूरी मिट्टी बदल दी है। अब इसमें 'कोको-पीट' है। देखना, पौधा कितनी जल्दी ग्रो करेगा।

यह सुनकर मैं सन्न रह गया । वह मिट्टी जो बाबूजी पुराने घर के आँगन से लाए थे, जिसे वे लिफ्ट में गिरने से बचा रहे थे, वह अब कूड़ेदान में थी।

नूपुर... तुमने बाबूजी से पूछा था?”

पूछने की क्या बात है? मैं घर को बेहतर ही तो बना रही हूँ। अब तो यह साफ़-सुथरा है। तभी बाबूजी का दरवाज़ा खुला। वे बाहर निकले। सीधे बालकनी की तरफ आए। चौखट पर रुके। उनकी नज़र प्लास्टिक की घास और उस सफ़ेद सिरेमिक पॉट पर गई। वे धीरे-धीरे आगे बढ़े और गमले के सामने उकड़ूँ बैठ गए।

नूपुर ने कोहनी मारी, “देखो, उन्हें भी अच्छा लग रहा होगा।

बाबूजी ने काँपती उंगलियों से गमले के अंदर की मिट्टी को देखा। वह मिट्टी नहीं, भूराकोको-पीटथा। उन्होंने एक चुटकी उठाई, मसलते ही वह पाउडर की तरह झड़ गई।

ई माटी नहीं है,” उन्होंने बुदबुदाते हुए कहा।

बाबूजी, यह कोको-पीट है। इसमें कीड़े नहीं लगते,” नूपुर ने कहा।

बाबूजी ने सफ़ेद गमले के किनारों को पकड़ा।हमारा डिब्बा कहाँ है?” उनकी आवाज़ ठंडी झील की तरह गहरी थी।

फेंक दिया बाबूजी, वह खराब हो गया था,” मैंने कहा। बाबूजी ने तुलसी के तने को पकड़ा।जड़ें खुली थीं इसकी?”

हाँ, माली ने शिफ्ट किया था। जड़ें बहुत फैल गई थीं, थोड़ी काटनी पड़ीं ताकि इस नए पॉट में फिट आ सकें,” नूपुर ने कहा।

बाबूजी का हाथ थम गया। जड़ें काटनी पड़ीं ताकि पॉट में फिट आ सकें। वे धीरे से खड़े हुए। चेहरा भावहीन था।

जबरदस्ती की मिट्टी में कुछ नहीं टिकता, समीर,” —  उन्होंने मेरी आँखों में देखा, “पेड़ को गमला नहीं, अपनी मिट्टी चाहिए होती है। तुम लोगों ने उसे प्लास्टिक खिला दिया।

बाबूजी, यह साइंटिफिक है...

होगा साइंटिफिक। पर इसमें जान नहीं है। यह गमला तुम्हारे ड्राइंग रूम के लिए ठीक है, इस पौधे के लिए नहीं। यह मर जाएगा।

आप ऐसा क्यों कह रहे हैं? इतने पैसे खर्च किए हैं।

पैसे से साँसें नहीं खरीदी जातीं बहू। जिस तरह हमको इहाँ फिट करने के लिए तुम लोग हमारी जड़ें काट रहे हो, वही हाल इस पौधे का किया है। फ़र्क बस इतना है कि यह बोल नहीं सकता।

वे वापस अपने कमरे की तरफ चल दिए। उनकी चाल में थकान नहीं, हार थी। मैं बालकनी में खड़ा रह गया। उसकोको-पीटमें खड़ा वह तुलसी का पौधा एक लाश की तरह दिख रहा था। मैंने महसूस किया कि हमने सिर्फ एक डिब्बा नहीं बदला था, अपने और उनके बीच के आखिरी पुल को तोड़ दिया था। अब वे पूरी तरह से हमारे 'सिरेमिक' संसार के कैदी थे।


5.

अगले दिन मौसम साफ था। कोई धुंध नहीं। घर में कोई ड्रामा नहीं हुआ। न किसी ने बाबूजी को रोकने की झूठी ज़िद की, न किसी ने जाने का दिखावटी दुःख जताया। सब कुछ एक तयशुदा स्क्रिप्ट की तरह हुआ। मैं सोकर उठा, बाबूजी तैयार थे। सोफे के कोने में सिकुड़कर बैठे थे। उनके पैरों के पास उनका वह पुराना कैनवास बैग रखा था। बैग की ज़िप शायद खराब हो गई थी, जिसे उन्होंने दो बड़े सेफ्टी-पिन लगाकर बंद किया था। उस आधुनिक लिविंग रूम के डिज़ाइनर फर्नीचर के बीच वह बैग किसी अवांछनीय वस्तु की तरह दिख रहा था। नूपुर किचन में बर्तनों की खनक के साथ जल्दबाजी में थी। 

चाय?” उसने औपचारिक मिठास के साथ पूछा।

नहीं बहू, रस्ते में पानी पी लेंगे।उन्होंने चाय नहीं पी।

मैंने कार की चाबी उठाई, “मैं स्टेशन छोड़ देता हूँ।

बाबूजी चुपचाप खड़े हो गए। बैग अपनी पकड़ में रखा।हल्का है,” उन्होंने कहा।

लिफ्ट की तरफ बढ़ते हुए नूपुर ने झुककर पैर छुएएक मशीनी क्रिया।अपना ख्याल रखिएगा बाबूजी।

खुश रहो,” — बाबूजी ने हाथ हवा में ही रोक लिया, छुआ नहीं, “दूध-पूत फलो।

लिफ्ट में हम दोनों थे। वही स्टील की दीवारें। बाबूजी ने कनखियों से उस कोने को देखा जहाँ पहले दिन मिट्टी गिरी थी। सफाई कर्मचारियों ने उसे इतना रगड़ दिया था कि वह दाग मिट चुका थाफर्श से।

लिफ्ट नीचे उतरने लगी। 15... 14... 12... अंक घट रहे थे।

  मेरे पिता मेरे जीवन से भी नीचे उतर रहे थे।

जल्दी जा रहे हैं,” मैंने कहा, “कुछ दिन और रुक जाते।

गाँव में काम पड़ा है। खेत की मेड़ टूट गई है,” उन्होंने लिफ्ट के दरवाज़े को देखते हुए झूठ बोला। खेत तो बटाई पर था। उन्हें बस उस 'सिरेमिक गमले' वाली दुनिया से अपनी जान बचानी थी।

स्टेशन के बाहर मैंने गाड़ी रोकी।अंदर तक चलूँ?”

नहीं। भीड़ है। तुमको ऑफिस जाना होगा।

वे गाड़ी से उतरे। बैग कंधे पर टांगा। धोती थोड़ी ऊपर उठाई और भीड़ में खो गए। उन्होंने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। कोई शिकायत नहीं, कोई नसीहत नहीं।

मेरी गाड़ी वापस सोसाइटी की तरफ मुड़ गई। मेरे कंधे हल्के हो गए थे। एक भारी जिम्मेदारी उतर चुकी थी।

फ्लैट पर वापस पहुँचा, सन्नाटा था। नूपुर भी ड्यूटी पर जा चुकी थी। घर साफ़ था। कोई गंदा तौलिया या लोटा नहीं। सब कुछ 'सामान्य' हो गया था।

      मैं बालकनी में गया। धूप निकल आई थी। सफ़ेद सिरेमिक पॉट अपनी जगह रखा था। कल शाम लगाया गया तुलसी का पौधा पूरी तरह मुरझा चुका था। पत्तियाँ लटक गई थीं। कोको-पीट की नमी उसे बचा नहीं पाई। उसकी जड़ें, जिन्हें 'फिट' करने के लिए काटा गया था, उस बनावटी मिट्टी में साँस नहीं ले पाई थीं। वह मर चुका था। मुझे एक अजीब-सी खीझ हुई। इतनी महँगी ट्रे, इतना महँगा पॉट, और नतीजा सिफ़र।

मैंने सिगरेट सुलगाई। बालकनी में ऐश-ट्रे नहीं थी। मेरी नज़र उस सफ़ेद, सुंदर सिरेमिक पॉट पर गई। मैंने सिगरेट को पॉट के किनारे पर टैप किया। राख का एक लंबा टुकड़ा टूटकर उस 'कोको-पीट' के ऊपर गिर गया। भूरे बुरादे पर ग्रे राख बुरी नहीं लगी। बाबूजी सही कहते थे। पेड़ को अपनी मिट्टी चाहिए होती है। लेकिन जब पेड़ मर जाता है, तो गमला बेकार नहीं होता।

मैंने उस मुरझाए हुए पौधे को जड़ से पकड़ा और एक झटके में उखाड़ दिया। बिना मेहनत के वह बाहर आ गया। मैंने उसे डस्टबिन में डाल दिया। अब वह सुंदर सिरेमिक पॉट खाली था। मैंने अपनी जलती हुई सिगरेट उस पॉट के बीचों-बीच दबाकर बुझा दी। धुएँ की एक पतली लकीर घूमती हुई ऊपर उठी। यह गमला अब मेरे काम का था। यह अब 'उपयोगी' था।

मैंने बालकनी का दरवाज़ा बंद किया। एसी की ठंडी हवा ने मुझे घेर लिया। अब घर में पूरी शांति थी।

स्व-परिचय  

सुशील कुमार  

जन्म: 13 सितम्बर, 1964, पटना सिटी (बिहार)  

कवि-लेखक  


प्रकाशित कृतियाँ  

कविता संग्रह:  

  1. कितनी रात उन घावों को सहा है (2004)  

  2. तुम्हारे शब्दों से अलग (2011)  

  3. जनपद झूठ नहीं बोलता (2012)  

  4. हाशिये की आवाज (2020)  

  5. पानी भीतर पनसोखा (2025)  

आलोचना:  

  1. आलोचना का विपक्ष (2019)  

  2. हिंदी ग़ज़ल का आत्मसंघर्ष (2021)  

पर्यावरण कृति:  

  1. बाँसलोई में बहत्तर ऋतु (2025)

  2. साल का शजरनामा: एक वृक्ष की कथा (प्रकाशकाधीन)

उपन्यास: 

   1. अधूरी आँखों वाली मातृदेवी: हड़प्पाकालीन एक स्त्री मूर्तिकार की प्रेम-कथा  (प्रकाशकाधीन)  

   2. फिर भी जिंदगी जोश है : जेनेरेशन गैप की कहानी (प्रकाशकाधीन)  

झारखंड शिक्षा सेवा कैडर में जिला शिक्षा पदाधिकारी के पद से दुमका से सितम्बर 2024 में सेवानिवृत्त।  

पता: हंसनिवास, कालीमंडा, दुमका (झारखंड) – 814101  

ईमेल: sk.dumka@gmail.com  

मो.न.: 9006740311  

व्हाट्सएप: 7004353450 



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