नई वाली हिंदी — साहित्य का नया चेहरा या पुराने लुगदीपन का डिजिटल अवतार? (डार्क हॉर्स : संघर्ष का मिथक या बाज़ार की पटकथा)

Sushil Kumar
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(पाखी के सितम्बर 2026 अंक में प्रकाशित)

प्रकाशक हिंद युग्म का दावा है कि उसने मई, 2022 में प्रकाशित उपन्यास ‘डार्क हॉर्स’ (लेखक-नीलोत्पल मृणाल) की अब तक दो लाख से ऊपर प्रतियाँ बेची हैं और अभी भी बाज़ार में उसकी पायरेटेड प्रतियाँ बिक रही हैं, किन्तु गहराई से पड़ताल करने पर इसकी संख्या के संबंध में पुष्टि हो नहीं पाई। इसलिए यह कितना शिगुफ़ा है और कितना सत्य, कहना ज़रा कठिन है।


हिंदी साहित्य के समकालीन परिदृश्य में तेज़ी से उभरती “नई वाली हिंदी” एक आकर्षक, किंतु अत्यंत “गुड़-गोबर” और धुँधला शब्द है। हिन्द युग्म उत्सव के चौथे संस्करण में 20 सितंबर 2025 को रायपुर में सार्वजनिक रूप से वयोवृद्ध कवि विनोद कुमार शुक्ल को रॉयल्टी के रूप में तीस लाख रुपए का डेमो चेक देकर यह घोषणा की गई कि लगभग छह महीने में ही उनकी किताबों की एक लाख प्रतियाँ बेचकर यह राशि उत्सव शुरू होने के पहले, 17 सितंबर 2025 को, शुक्ल जी के खाते में हस्तांतरित कर दी गई है, और 20–21 सितंबर (दो दिन) “नई वाली हिंदी” के बैनर तले अपने लेखकों की कृतियों का ज़ोरदार प्रचार किया गया। कहा जाता है कि देशभर से सौ से ऊपर लेखकों ने इस उत्सव में शिरकत की, जिन्हें रायपुर के महंगे होटलों में ठहराया गया था। बात इसलिए प्रामाणिक प्रतीत होती है क्योंकि मैं स्वयं इस कार्यक्रम के दोनों दिनों का साक्षी हूँ। साहित्य की इस घटना ने कई बड़े प्रकाशकों की नींद उड़ा दी है, क्योंकि विनोद कुमार शुक्ल की हिंद युग्म से कम, राजकमल प्रकाशन के पास अधिक किताबें हैं। तब हिंद युग्म ने ऐसा कौन-सा नुस्ख़ा अपनाया या कौन-सी करामात कर दी, जो अन्य प्रकाशक कर पाने में चूक रहे हैं? वह जादू की कौन-सी छड़ी है उनके पास कि यहाँ जो लेखक आता है, उसका नाम बेस्ट-सेलर सूची में दर्ज होने लगता है, जबकि गंभीर लेखक प्रचार और बिक्री के मामले में लगभग हाशिये पर ही नज़र आते हैं?


सवाल यह भी उठता है कि क्या “नई वाली हिंदी” किसी घोषित आंदोलन का नाम है या किसी वैचारिक परंपरा का उद्घोष? यह दरअसल उस सांस्कृतिक संक्रमण का संकेत है, जहाँ साहित्य किताबों से खिसककर मोबाइल की स्क्रीन पर पहुँच गया है। फेसबुक पोस्ट, इंस्टाग्राम रील, यूट्यूब इंटरव्यू और पॉडकास्ट—ये सब अब उपन्यास और कहानी कहने के नए मंच बन गए हैं। साहित्य की लोकप्रियता ने यहाँ एक नया रूप धारण किया है: विचार और संवेदना की जगह ‘व्यूज़’ और ‘फॉलोअर्स’ ने ले ली है। “नई वाली हिंदी” का यह संसार बीसवीं सदी के लुगदी साहित्य की विरासत लेकर आगे बढ़ रहा है। जिस तरह गुलशन नंदा, प्यारेलाल आवारा या वेद प्रकाश शर्मा जैसे लेखकों ने रोमांच और भावुकता के सहारे पाठक को बाँधे रखा, वैसे ही “नई वाली हिंदी” भी ‘संघर्ष’ और ‘प्रेरणा’ के नाम पर भावनात्मक बाज़ार खड़ा करती नज़र आती है। फ़र्क सिर्फ़ माध्यम का है—तब रेलवे प्लेटफ़ॉर्म था, आज इंस्टाग्राम और यूट्यूब हैं। वह भीड़ जो कभी दो रुपये की किताब खरीदकर ट्रेन में पढ़ती थी, आज मोबाइल स्क्रीन पर वही रील, पोस्टर या कहानी मुफ़्त में दोहराती है। साहित्य की यह रूपांतरित लोकप्रियता दरअसल संस्कृति के बाज़ारीकरण का दूसरा नाम है।


इसी सांस्कृतिक प्रवाह में 'डार्क हॉर्स' जैसी कृतियाँ सामने आती हैं। यह उपन्यास संघर्ष के बजाय, संघर्ष की ब्रांडिंग का आख्यान है। इसका नायक संतोष, किसी छोटे शहर का स्वप्नद्रष्टा युवक—सिविल सेवा की तैयारी में जुटा हुआ, उम्मीद और हताशा के बीच झूलता हुआ—भारतीय मध्यवर्ग का प्रतिनिधि हो सकता था, पर लेखक ने उसे जीवन का प्रतीक बनाने की जगह “मोटिवेशनल आइकन” बना दिया है। संघर्ष यहाँ जीवन की जटिलता का रूप धारण करने के बजाय आत्म-प्रचार की पटकथा बनकर रह जाता है। इस किताब से गुज़रने पर कई जगह यह प्रवृत्ति खुलती है। एक जगह नायक कहता है—“साला ‘सर’ शब्द भी फेल।” और अंतिम पंक्ति में लेखक निष्कर्ष देता है—“हम सबके अंदर एक डार्क हॉर्स बैठा है।” ये वाक्य सुनने में जितने ऊर्जावान लगते हैं, उतने ही विचार की दृष्टि से खोखले। यहाँ भाषा अनुभव का स्रोत बनने के स्थान पर प्रभाव का औज़ार बन जाती है। साहित्य का वाक्य जब नारे में बदल जाता है, तो कहानी विचार से कटकर प्रचार और विज्ञापन में बदल जाती है। इसी कारण “डार्क हॉर्स” अपने पाठकों में दो तरह की प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है—

एक ओर वे जो इसे ‘प्रेरक’ कहकर सराहते हैं, दूसरी ओर वे जो इसके सतहीपन को पहचान लेते हैं।

अमेज़ॉन पर एक समीक्षक लिखता है,

“यह सारी रेटिंग अच्छी मार्केटिंग का परिणाम है।”

दूसरा कहता है,

“भाषा अत्यंत निम्न कोटि की है, निरंतरता का अभाव है।”

तीसरा इसे “रोडसाइड थर्ड क्लास नोवेल” कहकर ख़ारिज करता है। ये प्रतिक्रियाएँ इस बात की गवाही हैं कि “नई वाली हिंदी” के भीतर लोकप्रियता और साहित्यिकता के बीच गहरा द्वंद्व और अंतर्विरोध चल रहा है। जो पुस्तक वास्तविक अनुभव के बजाय ‘सफलता का नुस्ख़ा’ बन जाती है, वह अपने ही पाठक को भ्रम और निराशा में छोड़ देती है।


मुख्यधारा मीडिया की समीक्षाएँ भी इस विडंबना को दर्शाती हैं। ‘आउटलुक’ और ‘इंडिया टुडे’ ने इस उपन्यास को ‘युवा पीढ़ी की आवाज़’ कहा, साथ ही यह भी स्वीकार किया कि कथा कई जगह ‘प्रवचन’ का रूप ले लेती है, यानी संघर्ष की वास्तविकता से अधिक महत्वपूर्ण यहाँ उसका नाट्य-रूप है। पात्रों का द्वंद्व कहानी की गहराई से हटकर ऊर्जावान नारे में रूपांतरित हो जाता है। यही प्रवृत्ति “नई वाली हिंदी” का चेहरा बन चुकी है। सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि यह अपने को ‘नया’ कहती है, पर वैचारिक सहारा पुरानी पीढ़ी के लेखकों से लेती रहती है। वह बार-बार धूमिल, विनोद कुमार शुक्ल, नरेश सक्सेना जैसे गंभीर लेखकों की छवियों को अपने प्रचार में सम्मिलित करती है—मानो उनकी रचनात्मकता से अपनी ‘नव-लोकप्रियता’ को वैधता मिल जाए।


आज यही मंच उन पंक्तियों को इंस्टाग्राम पोस्ट में बदल देता है—

“आदमी की सबसे अच्छी नस्ल युद्धों में नष्ट हो गई..”

और विनोद कुमार शुक्ल की “दीवार में एक खिड़की रहती थी” जैसी पुस्तक को “युवा प्रेरणा” का प्रतीक बताकर बेचता है। यह दृश्य गहरी विडंबना रचता है—“नई वाली हिंदी” अपने भीतर की वैचारिक रिक्तता को भरने के लिए पुरानी पीढ़ी की रचनात्मक गरिमा का उपयोग कर रही है। धूमिल का यथार्थ यहाँ “मोटिवेशनल कोट” में बदल जाता है और विनोद कुमार शुक्ल की अमूर्तता अब रील की भाषा में अनूदित हो जाती है। इस तरह साहित्य की परंपरा “संदर्भ” से सरककर “कंटेंट” में रूपांतरित हो जाती है।


डार्क हॉर्स इस पूरे परिदृश्य का प्रतीक है—जहाँ साहित्य विचार की जगह सेलिब्रेशन बन गया है। अख़बारों के शीर्षक तक कहते हैं—“हिंदी भाषा का सेलिब्रेशन है नई वाली हिंदी।” पर क्या भाषा का सेलिब्रेशन उसकी आत्मा के बग़ैर संभव है? साहित्य का सार प्रश्न पूछने में निहित रहता है, और “नई वाली हिंदी” के पास अब प्रश्नों की तुलना में उत्तर अधिक दिखाई देते हैं—संघर्ष, प्रेरणा, सपना, सफलता। यही उसके नारे हैं, यही उसका संसार। 


(डार्क हॉर्स : भाषा, शिल्प और पात्रों का संकट) 


“डार्क हॉर्स” को अगर कथाक्रम मानकर पढ़ा जाए तो यह एक युवा की प्रेरक यात्रा लगती है—एक छोटे शहर के सपने देखने वाले युवक की, जो असफलताओं से जूझते हुए अंततः अपने अस्तित्व को पहचानता है। पर साहित्य का मूल्य भारी-भरकम कथानक से तय नहीं होता; वह शिल्प, कला और भाषा से निर्धारित होता है। यहीं आकर यह उपन्यास अपने सबसे नाज़ुक मोर्चे पर असफल हो जाता है। पढ़ते हुए महसूस होता है कि इसकी भाषा, पात्र और संरचना न तो हिंदी की श्रेष्ठ परंपरा से जुड़ते हैं, न आधुनिक कथा के प्रयोगशील पक्ष से। कहानी के केंद्र में संतोष नाम का पात्र है—एक ऐसा युवक, जो गरीबी, सीमित अवसरों और प्रतिस्पर्धा के बीच अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। पर गौर करने पर लगता है कि यह चरित्र यथार्थवादी उपन्यासों की उस लंबी परंपरा से आ सकता था, जहाँ संघर्ष समाज की असमानता और आततायी प्रवृत्ति से जन्म लेता है। “डार्क हॉर्स” में संतोष का संघर्ष आत्मानुभव के बजाय प्रदर्शन बन जाता है। उसकी असफलताएँ मंचन जैसी लगती हैं और उसका अंतर्निहित दर्द उसी के संभाषणों में खो जाता है। नायक के संवाद उस जीवन की अनुभूति नहीं दे पाते, जिसे वह जी रहा है; वे किसी “मोटिवेशनल सेशन” की तरह लगते हैं।


उपन्यास की भाषा बोलचाल की है—सरल, सुलभ और कई बार आकर्षक भी। पर यह सरलता प्रायः साहित्यिक संप्रेषण की जगह भावनात्मक नारे और बड़बोलापन का रूप ले लेती है। कहना चाहिए कि “साला ‘सर’ शब्द भी फेल” जैसी पंक्तियाँ पाठक को झटका तो देती हैं, पर वह झटका बौद्धिक न होकर बाहरी रह जाता है। भाषा तब सशक्त बनती है जब वह अनुभव के गहरे स्तर पर उतरती है; यहाँ भाषा अधिकतर तत्कालिक प्रभाव पैदा करती है। पूरे उपन्यास में भाषा में लिजलिजापन दिखाई देता है। कई दृश्य ऐसे गढ़े गए हैं जिनमें स्वभावगत संवेग (momentum) नहीं है; वे पाठक को रोकने के बजाय आगे खींचते हैं—मानो बॉक्स ऑफिस की कोई बंबइया फ़िल्म का दृश्य हो। इसी से कथा का पाठ्य-अनुभव दृश्यात्मक और बाह्यगत लगता है, आंतरिक और मर्मभेदी नहीं। भाषा का यह दृश्य-प्रधान रूप उपन्यास को ‘रील (reel)-योग्य’ बनाता है। अनेक पंक्तियाँ संभावित उद्धरण की तरह रची गई हैं, जिन्हें सोशल मीडिया पर साझा किया जा सके। परिणामतः “डार्क हॉर्स” में वैचारिकी का स्थान भावनात्मक प्रतिक्रिया ले लेती है। कथ्य जीवन का स्वरूप नहीं रचता, एक ‘पोज़’ की निर्मिति करता है। यही “नई वाली हिंदी” की प्रमुख विशेषता भी बनती दिखती है—गंभीर लेखन की जगह प्रदर्शन और आत्मश्लाघा का मंचन।


पात्र-निर्माण में भी यही समस्या दोहराई गई है। संतोष, मनोजर और गुरु जैसे पात्र सामाजिक न होकर प्रतीकात्मक और आरोपित प्रतीत होते हैं। वे किसी वर्ग या विचारधारा का प्रतिनिधित्व नहीं करते; ‘संघर्ष’ और ‘प्रेरणा’ जैसे शब्दों के दृश्य-रूप बनकर रह जाते हैं। गुरु-भाई का चरित्र पुराने ‘गाइड’ जैसा है, जो कहानी में खालिस ज्ञान देता है, पर स्वयं विकसित नहीं होता। उसके संवादों में मानवीय विडंबना के बजाय आत्मविश्वास ही उपस्थित है। मनोजर और संतोष का द्वंद्व न वैचारिक है, न नैतिक—वह केवल गति पैदा करता है, जैसे फ़िल्म में “क्लाइमेक्स” रचने के इरादे से। इसी वजह से नए और युवा पाठक को पात्रों का जीवन कम और उनके “डायलॉग” अधिक याद रहते हैं। संरचना भी उसी नाटकीय भाषा में बँधी है—हर अध्याय किसी छोटे दृश्य की तरह लिखा गया है: आरंभ में घटना का तनाव, बीच में संवादों की उथल-पुथल और अंत में कोई प्रेरक निष्कर्ष। यह ढाँचा पत्रिका के फीचर लेख या भाषण की संरचना जैसा लगता है, जबकि साहित्य का उद्देश्य पाठक को विचार में उतारना होता है, निष्कर्ष सुनाना नहीं। “डार्क हॉर्स” यहीं चूक करता है—वह विचार से पहले निष्कर्ष दे देता है।


कथानक में यथार्थ की गंध तो है, पर वह अनुभव में नहीं उतरती। गरीबी, असफलता और दिल्ली जैसे महानगर का दबाव यहाँ उपस्थित तो है, किंतु लेखक उनकी सामाजिक जड़ों तक पहुँचने में ठहर जाता है। यही फ़र्क है उस यथार्थ में, जो प्रेमचंद या रेणु के यहाँ दिखाई देता है, और उस (कृत्रिम) यथार्थ में, जो “नई वाली हिंदी” में परोसा जा रहा है। यहाँ यथार्थ सृजित किए जाते हैं; इसलिए वे सोद्देश्यपूर्ण होकर आते हैं, स्वाभाविक रूप में नहीं। पुराने लेखकों के यहाँ संघर्ष सामूहिक था—व्यक्ति समाज से जूझता था। यहाँ संघर्ष निजी महत्वाकांक्षा का विस्तार भर रह जाता है—हर असफलता को आत्म-विजय में बदल दिया जाता है। यह परिवर्तन हिंदी साहित्य की संवेदना में आई गहराई की कमी पर संकेत करता है।


डार्क हॉर्स : नई वाली हिंदी और साहित्य का भविष्य


कहानी में भाषा का स्तर एक और चिंता का विषय बनता है। कई स्थानों पर संवादों में अंग्रेज़ी के शब्द बिना संदर्भ के घुस आते हैं—“फोकस रहो”, “अपॉर्च्युनिटी”, “सेल्फ-मेड”। ये शब्द पात्रों की सोच के बजाय लेखक के लक्षित पाठक-वर्ग को इंगित करते हैं। “नई वाली हिंदी” इस मिश्रित भाषा को आधुनिकता का प्रतीक बताती है, जबकि यह प्रवृत्ति भाषा की आत्मा को विसर्जित कर देती है। हिंदी की सादगी को अंग्रेज़ी की छाया में रखकर जो ‘कूल’ बनाया गया है, वही उसकी सबसे बड़ी अस्वाभाविकता बन जाता है; यह अधिकतर युवा वर्ग को गुदगुदाने का औज़ार भर रह जाता है। साहित्यिक दृष्टि से “डार्क हॉर्स” के शिल्प में सबसे बड़ी कमी सौंदर्य-बोध का अभाव है। कथा में प्रकृति का वर्णन, स्थान का विस्तार या संवेदनाओं की आंतरिक लय प्रायः अनुपस्थित है। हर प्रसंग संदेश देने के इरादे से रचा गया प्रतीत होता है। भाषा में जब काव्यात्मकता की संभावना क्षीण हो जाती है, तो प्रवाहपूर्ण गद्य भी सूखा नारा बन जाता है—यहाँ यही हुआ है। और यही प्रवृत्ति “नई वाली हिंदी” की पहचान बनती जा रही है—जहाँ लेखक पाठक को सोचने के लिए नहीं, प्रेरित करने के लिए आता है। प्रेरणा क्षणिक प्रभाव है; साहित्य स्थायी अनुभव। इस उपन्यास में प्रभाव बहुत है, अनुभव न्यून। पुस्तक पाठक को पल भर के लिए उत्साहित करती है, पर भीतर कोई प्रश्न नहीं छोड़ती, न आलोड़न। साहित्य का मूल्य प्रश्न में निहित रहता है, उत्तर में नहीं। जब कथा का हर पात्र पहले से तय जवाब लेकर चलता है—“मेहनत करो”, “हार मत मानो”, “सपने सच होते हैं”—तो कहानी विचार की भाषा छोड़कर आदतन बोलचाल में फिसल जाती है। “नई वाली हिंदी” इसी आदत का साहित्य प्रतीत होती है—जहाँ शब्द चलायमान हैं, अर्थ स्थिर नहीं।


“डार्क हॉर्स” को पढ़ते हुए लगता है कि लेखक ने अपने समय के युवाओं की बेचैनी को महसूस तो किया, पर उसे सौंदर्य में रूपांतरित करने में सफल नहीं हुआ। भाषा में अनुभव का ताप घटित नहीं होता, आशा की आभा मात्र उपस्थित रहती है। यही उस यथार्थ का संकट है जिसे बाज़ार ने अपनाया और साहित्य ने खो दिया। दूसरे शब्दों में, यह रचना “नई वाली हिंदी” की उस प्रवृत्ति की ओर संकेत करती है कि उसने जीवन की जगह “लाइफ़स्टाइल” को चुन लिया है। संघर्ष अब समाज का रूपक नहीं रहा; वह ब्रांड का रूपक बन गया है। और जब साहित्य ब्रांड की तरह बोलने लगे, तो भाषा सच्चाई की जगह विज्ञापन में ढल जाती है। यहीं “डार्क हॉर्स” ठहरता नहीं, टूटकर बिखर जाता है—अपने ही संदेश के बोझ तले। जो कहानी प्रेरणा देने आई थी, वही अंततः साहित्य को एक प्रेरक उत्पाद में बदल देती है। यही इस युग का सबसे बड़ा विरोधाभास है—जहाँ साहित्य का हर वाक्य बिक सकता है, पर किसी वाक्य में साहित्य नहीं बचता।


गहराई से देखने पर स्पष्ट होता है कि इस उपन्यास ने साहित्य और बाज़ार के बीच की रेखा धुंधली कर दी है; उसका लुगदीपन बाज़ार की घालमेल से इतना संकर-वर्ण हो गया है कि अब खोटे सिक्के असली सिक्कों को प्रचलन से बाहर करने पर आमादा हैं। लुगदी के इस डिजिटल अवतार ने देश के बड़े साहित्यकारों की किताबों को धत्ता बता दिया है। गो कि ‘डार्क हॉर्स’ उस विद्रूप युग की प्रतीक-रचना है, जहाँ ‘संघर्ष’ किसी वर्ग-चेतना का संकेत न रहकर एक व्यक्ति का ब्रांड बनकर रह गया है। यह बदलाव किसी अकेले लेखक की चूक नहीं, हमारे सांस्कृतिक मानस की दिशा का परिणाम है—एक ऐसी दिशा, जिसे मैं साहित्य में सोची-समझी साज़िश मानता हूँ; और यह सब ग़ैर-इरादतन भी नहीं।

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नई वाली हिंदी इसी परिवर्तन का नाम है। यह उस दौर का साहित्य है, जहाँ किताबें नहीं, उनके पोस्टर बिकते हैं; किताबों के आने से पहले ही उनके युवा-लुभावन पोस्टर बाज़ार में खड़े कर दिए जाते हैं—अर्थात जहाँ कथ्य से पहले प्रचार आता है और लेखक पाठक के बीच संवाद नहीं, “इंगेजमेंट” चाहता है। पहले साहित्य में विचार लिखा जाता था और उसकी प्रतिध्वनि समाज में सुनाई देती थी; अब वही विचार सोशल मीडिया पर ‘रील’ बन जाता है और उसका अर्थ एक दिन में समाप्त हो जाता है। यही वह सांस्कृतिक संक्रमण है, जिसमें डार्क हॉर्स जैसी रचनाएँ जन्म लेती हैं।


नई वाली हिंदी की लोकप्रियता का रहस्य उसके विषय में नहीं, उसकी प्रस्तुति में है। इसके अधिकांश बेस्ट-सेलर लेखक “अभिनेता और अभिनेत्री टाइप” व्यक्तित्व रखते हैं, जो जीवन-संघर्ष की गहराई नहीं, उसका अभिनय दिखाते हैं; और आत्म-स्वीकृति की जगह आत्म-प्रचार को फलक बनाते हैं। यह प्रवृत्ति सिर्फ डार्क हॉर्स तक सीमित नहीं—लगभग हर लोकप्रिय ‘पल्प साहित्य’ में वही नुस्ख़ा दोहराया गया है: पहले कठिनाई, फिर प्रेरणा और अंतत: सफलता। यह फ़ॉर्मूला नए-युवा पाठक को उत्साहित करता है; दरअसल नई वाली हिंदी ने 20–35 आयु वर्ग के युवाओं की नब्ज़ कसकर पकड़ ली है। वह उन्हें सोचने-विचारने का अवसर नहीं देती। साहित्य का उद्देश्य जो कभी ‘मनुष्य के भीतर मनुष्य की खोज’ था, अब ‘उपलब्धि का सेलिब्रेशन’ बन गया है।


इस प्रवृत्ति के पीछे मूलतः बाज़ार की संरचना है। प्रकाशन, सोशल मीडिया और ऑनलाइन बिक्री—तीनों ने मिलकर साहित्य के अर्थशास्त्र को बदल दिया है। आज पुस्तक की सफलता रेटिंग, प्री-ऑर्डर और इन्फ़्लुएंसर-रिव्यू से तय होती है। यदि दीवार में एक खिड़की रहती थी जैसी किताब पर भी इन्फ़्लुएंसर नहीं लगाए जाते और सोशल मीडिया में उसका हड़कंप नहीं मचाया जाता, तो बिक्री का परिणाम शायद वैसा न मिलता। लेखक जानता है कि यदि भाषा कठिन होगी तो पाठक घटेगा; यदि कथ्य में विचार होगा तो बिक्री कम होगी। इस दबाव ने नई वाली हिंदी कथा-साहित्य से प्रयोग, जटिलता और सौंदर्य-बोध लगभग समाप्त कर दिया है। अब कहानी जीवन नहीं, ‘कंटेंट’ बन गई है—और कंटेंट की सबसे बड़ी शर्त है कि वह ‘तेज़ी से खप सके’।


डार्क हॉर्स इसी ‘तेज़ साहित्य’ का उदाहरण है। इसमें कोई विचार ठहरता नहीं; हर संवाद किसी निष्कर्ष की ओर भागता है। लेखक पाठक को चिंतन में नहीं, निर्णय में ले जाता है। और यह निर्णय सरल है: “मेहनत करो, सफल होओ।” किंतु साहित्य की दुनिया में इतने सरल उत्तर नहीं होते। प्रेमचंद ने मेहनतकश किसान को चित्रित करते हुए उसे विचार की जगह दी; धूमिल ने शब्दों के भीतर राजनीति देखी; विनोद कुमार शुक्ल ने जीवन की सूक्ष्मता में कविता खोजी। इन सबमें संघर्ष था, पर वह परीक्षा की तैयारी नहीं, अस्तित्व की खोज थी। डार्क हॉर्स उस खोज से विमुख है।


नई वाली हिंदी का विज्ञापन यह है कि उसने “क्लासिक हिंदी” से मुक्ति दिलाई; पर इसी प्रक्रिया में उसने “गहरी हिंदी की सामाजिकता और अर्थवत्ता” भी खो दी। अब भाषा जितनी सरल है, विचार उतने ही सपाट। यहाँ शब्द चमकते हैं, पर भीतर कोई कंपन नहीं। लेखक जानता है कि उसका पाठक स्क्रॉल करते हुए पढ़ रहा है, इसलिए हर वाक्य ‘क्लिक-योग्य’ होना चाहिए। यही कारण है कि आज इस मंच का हिंदी उपन्यास संवादों का मंच बन गया है, अनुभवों का संसार नहीं। इस भाषा और संरचना के भीतर एक और संकट है—सौंदर्य का अभाव। क्लासिक हिंदी में कथा और कविता के बीच एक सूक्ष्म पुल था; हर वाक्य में लय थी, हर चरित्र में गंध। अब वह लय क्षीण होती जा रही है। नई वाली हिंदी के लेखक मानवीय करुणा को प्रेरणादायक नारे में बदल देते हैं। यह रूपांतरण सबसे पहले भाषा को मारता है, क्योंकि कवित्व और विचार के बिना भाषा केवल सूचना बन जाती है।


पर इसका अर्थ यह नहीं कि नई पीढ़ी के लेखन में संभावना नहीं। वास्तव में यह समय साहित्य के लिए एक नई चुनौती लेकर आया है। अब लेखन को दोहरी ज़िम्मेदारी निभानी है—लोकप्रियता और गहराई, दोनों का संतुलन। सरल भाषा का अर्थ सतही भाषा नहीं है। जिस तरह धूमिल ने रोज़मर्रा की भाषा में कविता की जटिलता खोजी या रेणु ने ग्रामीण बोलियों में करुणा और हँसी को जोड़ा, उसी तरह आज के लेखक को भी डिजिटल युग की भाषा में संवेदना का पुनर्निर्माण करना होगा।


हिंदी साहित्य के लिए यह आत्म-चिंतन का क्षण है। डार्क हॉर्स जैसी रचनाएँ यह बताती हैं कि अब पाठक उत्साहित तो है, पर असंतुष्ट भी। उसे प्रेरणा चाहिए, पर वह अनुभव भी चाहता है। यही खालीपन नए साहित्य की ज़मीन बन सकता है, यदि लेखक उससे ईमानदारी से संवाद करे। लोकप्रियता के इस शोर में अब भी यह संभावना जीवित है कि हिंदी का शब्द एक बार फिर मनुष्य के भीतर उतर सके।


अंततः यह कहना आवश्यक है कि क्लासिक और दर्जा-प्राप्त हिंदी साहित्य को भी इन्हीं इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों का उपयोग कर अपनी रचनाओं को नई वाली हिंदी के समकक्ष खड़ा करना होगा; अन्यथा यह डिजिटल लुगदी साहित्य बाज़ार पर एकतरफ़ा कब्ज़ा जमाकर डार्क हॉर्स जैसी कृतियाँ लाता रहेगा और साहित्य के विरूपण का खेल चलता रहेगा। साहित्य का असली संघर्ष दौड़ जीतने या होड़ में शामिल होने में नहीं, बल्कि दौड़ की दिशा बदलने में है—और यही कार्य आने वाले हिंदी लेखक को करना होगा: भाषा को बाज़ार से वापस साहित्य की आत्मा तक लाना। इसके लिए एक सशक्त पाठक-वर्ग तैयार करना अनिवार्य है।●

सुशील कुमार  







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