जो मन को झंकारे लिख।”
देख सको तो देखो: (ग़ज़ल संग्रह) शिव कुमार पराग -----------------------
शिव कुमार पराग का ग़ज़ल संग्रह 'देख सको तो देखो’ 2025 के वर्षांत में श्वेतवर्णा प्रकाशन से आया है। इस किताब में पराग की 111 ग़ज़लें हैं।
इनसे गुजरने पर लगा, समकालीन हिंदी ग़ज़ल अब केवल कोमल भावनाओं, जुल्फों के पेंच-ओ-खम और व्यक्तिगत विरह-वेदना की अभिव्यक्ति का स्त्रोत नहीं रही। दुष्यंत कुमार और अदम गोंडवी के बाद जिस जनवादी ग़ज़ल ने आकार लिया, वह अपने समय के सच से आँखें चुराती नहीं, वरन् उससे सीधे आँखें मिलाती है। शिव कुमार पराग का सद्यः प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह ‘देख सको तो देखो’ इसी परंपरा की अगली और पुख्ता कड़ी है। यह संग्रह अपने शीर्षक से ही पाठक को एक चुनौती देता प्रतीत होता है। यहाँ ‘देखना’ केवल नेत्रों का व्यापार नहीं है, यह उस सामाजिक और राजनैतिक अंधेरे को पहचानने का आह्वान है जो 'अच्छे दिनों' के शोर में कहीं गुम कर दिया गया है। शिव कुमार पराग की ग़ज़लें उस सुप्त नागरिक चेतना को जगाती और आलोड़ती हैं जो व्यवस्था के वादों के सम्मोहन में सोई हुई है।
इस संग्रह की सबसे बड़ी शक्ति इसकी ‘ज़मीनी गंध’ और ‘बेबाक कथन’ है। कवि हवा-हवाई बात करने के बजाय उस खुरदरे यथार्थ को शब्द देता है जिसे हम रोजमर्रा की जिंदगी में भोगते हैं। संग्रह के आरंभ में ही कवि अपनी मंशा स्पष्ट कर देता है। वह किसी वायवीय दुनिया का रचयिता नहीं, वह उसी समाज का भाष्यकार है जहाँ विषमता की खाई लगातार चौड़ी हो रही है। जब वह कहते हैं:
नीली-पीली रेखाओं के जाल हमारी आँखों में,
देख सको तो देखो सूखे ताल हमारी आँखों में।
तो यहाँ 'सूखे ताल' केवल जल-संकट का संकेत नहीं हैं, ये उस संवेदना के सूख जाने का रूपक हैं जो एक समाज के तौर पर हमारे भीतर रिक्त होती जा रही है। कवि का विज़न साफ़ है—वह विकास के उन रंगीन नक्शों (नीली-पीली रेखाओं) के बरक्स उस सूखेपन को रख देता है जो आम आदमी की नियति बना दी गई है।
कह सकते हैं कि शिव कुमार पराग की ग़ज़लें अपने समय की राजनीति का एक्सरे (X-ray) हैं गो कि वह सत्ता के चरित्र को किसी लाग-लपेट के बिना उघाड़ते हैं। आज के दौर में जब सत्ता-प्रतिष्ठान अपनी छवि चमकाने के लिए विज्ञापनों का सहारा ले रहे हैं, कवि उस चमक के पीछे के अंधेरे को पकड़ता है। उनका व्यंग्य बहुत मर्मभेदी और मारक है। वह विकास के विरोधाभास को प्रश्नवाचक शैली में प्रस्तुत करते हुए पूछते हैं:
क्या सरकार के पास हमारे इस सवाल का उत्तर है,
नाक बेचकर नथुनी लेना किस हिसाब से हितकर है?
यह प्रश्न किसी एक सरकार का नहीं, बल्कि पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था की प्राथमिकता पर प्रश्नचिह्न है। बुनियादी जरूरतों को नजरअंदाज कर सौंदर्यीकरण की जो राजनीति चल रही है, यह शेर उस पर करारा तमाचा है। इसी तरह, 'अच्छे दिन' के बहुप्रचलित मुहावरे का प्रयोग करते हुए वह आम आदमी के मोहभंग को बड़ी शिद्दत से रेखांकित करते हैं:
लोग अच्छे दिन के वादे पर निछावर हो गए,
आए अच्छे दिन, मगर किनके पताकर देखिए!
यहाँ 'पताकर देखिए' का प्रयोग अद्भुत है, जो पाठक को यह सोचने पर विवश करता है कि विकास हुआ तो है, पर किसका? यह ग़ज़लकार की सजग दृष्टि ही है जो संसद और सड़क के बीच के इस विरोधाभास को पकड़ पाती है जहाँ संसद "देश के चिकने घड़े" में तब्दील हो गई है और जनता के चीखते सवाल उस पर से फिसलते जा रहे हैं।
हिंदी ग़ज़ल की सार्थकता इसमें है कि वह कितनी ईमानदारी से 'अंत्योदय' (अंतिम जन) की पीड़ा को स्वर देती है। पराग के यहाँ गरीबी कोई आंकड़ा नहीं है, वह एक जीता-जागता, गतिशील सत्य है। भूख का ऐसा मार्मिक और भयावह चित्रण समकालीन कविता में विरले ही मिलता है:
भूख से बच्चे मेरे अकुला गये,
चाँद को रोटी समझकर खा गये।
यह शेर पढ़ते ही कलेजा मुँह को आता है। यहाँ चाँद का 'रोटी' हो जाना कोई रूमानी उपमा नहीं है, यह भूख की उस चरम अवस्था का बयान है जहाँ सौंदर्यबोध समाप्त हो जाता है और केवल पेट की आग शेष रहती है।
इसी तरह, जब वह कहते हैं कि "घास की रोटी हमारे हाथ पर आकर गिरी" तो वह इतिहास और वर्तमान के उस संघर्ष को याद दिलाते हैं जहाँ सत्ता तो महलों में सुरक्षित रहती है, पर आम आदमी को अस्तित्व रक्षा के लिए संघर्ष करना पड़ता है। संग्रह में 'फूस के घर', 'खाली रसोई', 'सूखे होंठ' जैसे बिंब आते हैं। यह बिंब बताते हैं कि कवि का जुड़ाव ‘डायमंड होटल’ में बैठकर साहित्य चर्चा करने वाले कुलीन वर्ग से नहीं, अपितु उस वर्ग से है जिसके लिए "सूखा, बाढ़, अकाल चंद लोगों के लिए खुशी के दिन" बन जाते हैं क्योंकि इसी बहाने सरकारी धन और राहत-कोष की बंदरबाँट होती है।
शिव कुमार पराग केवल राजनेताओं को ही नहीं बख्शते, वह अपने ही बिरादरी—यानी लेखकों और बुद्धिजीवियों—के पाखंड पर भी प्रहार करते हैं। आज साहित्य भी बाज़ार और 'जनसंपर्क' का हिस्सा हो गया है। गोष्ठियों की औपचारिकता और पुरस्कारों की राजनीति पर उनका यह शेर द्रष्टव्य है:
डायमंड होटल में होतीं प्रेमचंद पर बातें अब,
उजड़ी-उजड़ी लगती है चौपाल हमारी आँखों में।
प्रेमचंद, जो फटे जूते और गाँव की पगडंडियों के लेखक थे, उन पर वातानुकूलित होटलों में होने वाली बहसें साहित्य की विडंबना ही तो हैं। कवि को यह विरोधाभास कचोटता है। वह देखता है कि "श्रद्धांजलि की मुद्रा में, लाश को भुनाते हैं लोग"। संवेदनाओं का यह बाज़ारीकरण कवि को विचलित करता है और वह पाठकों को सावधान करता है कि शब्दों के बाजीगरों से बचकर रहें।
इस संग्रह की एक और विशेषता है—अपनी परंपरा का पुनराविष्कार। पराग कबीर को अपना आदर्श मानते हैं। लेकिन उनके कबीर किसी मंदिर-मस्जिद में कैद संत नहीं, अपितु एक विद्रोही चेतना हैं। वह कबीर का आह्वान करते हुए कहते हैं:
पोथी से, पुजारी से, भजन से, अजान से,
अपना कबीर रूढ़ियों से टूटकर लड़ा।
कवि का यह कबीर उनके ही शब्दों में
"छू दे तो बना देगा तुम्हें पत्थरों कड़ा,
अपना कबीर हादसों से पर्वतों बड़ा।” यानी'हादसों से पर्वतों बड़ा' है। यह स्पष्ट संकेत है कि आज के दौर में अगर लिखना है, तो कबीर जैसी निडरता और फक्कड़पन चाहिए। यह संग्रह उसी ‘अक्खड़’ परंपरा को आगे बढ़ाता है जो सत्ता के आगे रीढ़ सीधी रखकर बात करना जानती है।
इतनी विसंगतियों और अंधेरों के बावजूद, 'देख सको तो देखो' में कहीं भी हताशा का रुदन नहीं है। इसमें एक अदम्य जिजीविषा और प्रतिरोध का स्वर गूँजता है। कवि जानता है कि अंधेरा गहरा है, पर वह हार मानने को तैयार नहीं। वह अपने पाठकों और सहयात्रियों से कहता है:
इतना ख़तरा चलो उठायें हम,
अपने भीतर तो सुगबुगायें हम।
संघर्ष का तेवर अपने चरम पर तब दिखता है जब वह कहते हैं:
बुझना होगा तो बुझ ही जायेंगे,
जलते रहने की सोचनी चाहिए।
यह सकारात्मकता थोपी हुई नहीं है, यह संघर्ष की आंच से तपकर निकली है। कवि का मानना है कि चाहे "हवा को, लहर को तैयार" करने में समय लगे, लेकिन "नई सुबह का इंतज़ार" छोड़ना नहीं चाहिए। यह आशावाद ही इस संग्रह को जन-आंदोलनों और सामाजिक बदलाव की ताकतों का सहचर बनाता है। वह ‘दीप’ जलाने की बात करता है, पर यह दीप कर्मकांड वाला नहीं, बल्कि "अंधेरा चीर के सूरज-से निकलते सवाल" वाला दीप है। कवि मानता है कि प्रश्न करना ही जिंदा होने का प्रमाण है— "डूब रही आँखों में प्रश्नों की बाढ़ का / आश्वासन ही सबसे अच्छा उत्तर है"।
पराग की निगाहें बदलते सामाजिक परिवेश पर भी हैं। गाँव से शहर की ओर पलायन और महानगरों की भीड़ में खोती संवेदनाओं को वह बहुत मार्मिकता से उकेरते हैं। शहर, जहाँ "ऊपर-ऊपर मोम की एक पर्त है" लेकिन "नीचे सिर्फ पत्थर है", वहाँ आदमी अकेला पड़ गया है। रिश्तों में आई खटास और संवादहीनता को यह शेर कितनी खूबसूरती से बयां करता है:
एक कॉल भर की दूरी बतलाते हैं,
जाने क्यों वह कॉल नहीं कर पाते हैं।
तकनीक ने हमें जोड़ा तो है, पर मन से दूर कर दिया है। "भीतर-भीतर जुड़े हुए हैं ये / बाहर-बाहर अलग रहे हैं लोग" — यह आज के समाज का मनोवैज्ञानिक सत्य है। कवि 'गाँव' और 'महानगर' के द्वंद्व को बार-बार उभारता है, जहाँ गाँव की "सोंधी मिट्टी" और "अपनापन" अब महानगर की चकाचौंध में खो गया है।
शिल्प के स्तर पर शिव कुमार पराग ने ग़ज़ल की रवायत का निर्वाह करते हुए भी उसे हिंदी की प्रकृति के अनुकूल ढाला है। उनकी भाषा में उर्दू की नज़ाकत के साथ-साथ हिंदी का 'खरापन' और 'देसज ठाठ' मौजूद है। वह क्लिष्ट शब्दों के जाल में नहीं फंसते। उनकी भाषा संवाद की भाषा है—सीधी, सरल और संप्रेषणीय। मसलन, "खेत अँखुओं की कब्रगाह बने" जैसी पंक्ति में 'कब्रगाह' जैसा भारी शब्द 'अँखुओं' (अंकुरों) जैसे कोमल देशज शब्द के साथ मिलकर जो दृश्य रचता है, वह अद्भुत और शालीन है। उन्होंने मुहावरों का प्रयोग भी कुशलता से किया है, जैसे "दूध के कटोरे में उलझा विषधर" या "काठ के घोड़े संभालकर" चलना। रदीफ़ और काफियों का निर्वाह सधा हुआ है, लेकिन कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि भाव पक्ष पर शिल्प हावी हो गया हो। उन्होंने ग़ज़ल के अनुशासन को तोड़ा नहीं, वरन् उसमें नई विषय-वस्तु को पिरोया है। "लिख" रदीफ़ वाली पूरी ग़ज़ल इसका बेहतरीन उदाहरण है:
ऐसी कविता प्यारे लिख,
जो मन को झंकारे लिख।
यहाँ शिल्प और उपदेश एक साथ चलते हैं।
समग्रतः, शिव कुमार पराग का संग्रह ‘देख सको तो देखो’ आज के समय का एक जरूरी दस्तावेज है। यह संग्रह हमें अपनी नागरिक जिम्मेदारियों की याद दिलाता है। यह हमें सिखाता है कि एक कवि का काम केवल मनोरंजन करना नहीं, बल्कि समय के माथे पर लिखे दुर्भाग्य को पढ़ना और उसे मिटाने का साहस जुटाना है। कवि की चिंता में किसान है जिसकी "राहों में कीले गड़वाई" जाती हैं, वह दलित है जिसे "अधम की कोटि" में रखा गया और वह आम आदमी है जो "रेत को जल समझ के दौड़ा" है। इन सबकी पीड़ा को स्वर देकर पराग ने सिद्ध कर दिया है कि उनकी कलम "हथौड़ों की चोट" सहकर भी सच बोलने से नहीं कतराती। जो पाठक हिंदी ग़ज़ल में दुष्यंत कुमार की धार और अदम गोंडवी का आक्रोश तलाशते हैं, उनको यह संग्रह निराश नहीं करेगा। अगर समकालीन गजलकारों की बात करें तो ये ग़ज़लें जहीर कुरैशी, पुरुषोत्तम प्रतीक, शकूर अनवर, कैलाश मनहर, कमल किशोर श्रमिक, राम मेश्राम, रामकुमार कृषक, डी एम मिश्र, महेंद्र नेह, प्रभा दीक्षित जैसे जनवादी ग़ज़लकारों की एक ऐसी श्रृंखला के अंदर हमारा ध्यान खींचती है जिनके शब्द जनता के दुःख और बेबसी को आकार देती हुई उसी की छांव के भीतर रहकर अपना जीवन और स्पंदन पाती हैं।
वस्तुत: शिव कुमार पराग का यह संग्रह आँखें खोलने वाला है—बशर्ते आप में सच देखने का साहस हो, जैसा कि कवि खुद चुनौती देता है— 'देख सको तो देखो'। हिंदी साहित्य जगत को इस संग्रह का खुले दिल से स्वागत करना चाहिए।●© सुशील कुमार
[[ छवियाँ शिव कुमार पराग की फेसबुक वॉल से साभार]]
शिव कुमार पराग के कुछ चुनिंदा शेर :
1.
दिलों के बीच में पत्थर दिखायी देता है,
बिखरता -टूटता-सा घर दिखायी देता है।
हरेक चेहरे के भीतर है सशंकित चेहरा,
हरेक मन में कोई डर दिखायी देता है ।
2.
इतना ख़तरा चलो उठाएं हम,
अपने भीतर तो सुगबुगाएं हम ।
बर्फ़ दिल में उतर न जाय कहीं,
सोच में आग तो जलाएं हम ।
3.
ऐसी कविता प्यारे लिख
जो मन को झंकारे लिख |
सिर पर है बाज़ार चढ़ा
जो यह ज्वार उतारे लिख |
दुरभिसंधियाँ फैल रहीं
इनके वारे-न्यारे लिख |
हार-जीत जो हो, सो हो
लेकिन मन ना हारे लिख |
4.
भूख के दृश्य जब भी आते हैं
हम बहुत देर तिलमिलाते हैं |
सच अगर टूटता-सा लगता है
सोच के तार झनझनाते हैं |
हर तरफ अंधकार है, फिर भी
आस के दीप टिमटिमाते हैं |
5.
अंगद कहलाते हैं लोग
फिसल-फिसल जाते हैं लोग |
श्रद्धांजलि की मुद्रा में
लाश तक भुनाते हैं लोग ।
गाँधी की थाली में फिर
फिर कसमें खाते हैं लोग |
6.
आँधी की आशंका, पत्थर का डर है
बालू की नींव और शीशे का घर है।
डूब रही आँखों में प्रश्नों की बाढ़ का
आश्वासन ही सबसे अच्छा उत्तर है!
जाने कब फन वाली मुद्रा में आ जाए
दूध के कटोरे में उलझा विषधर है ।
7.
काठ के हम नहीं बने साहेब
हममें सपने मचलते रहते हैं |
हारकर बैठ नहीं सकते हम
हम तो गिरते-संभलते रहते हैं |
एक-न-एक दिन तो उठ खड़े होंगे
हम जो भीतर उबलते रहते हैं |
8.
भूख से बच्चे मेरे अकुला गये
चांद को रोटी समझकर खा गये |
रस्सियों पर टँगे नट की आँख में
याचना के स्वर मुझे उलझा गये |
कटते-कटते रात आख़िर कट गयी
चलते-चलते हम सबेरा पा गये |
9.
लोगों की आँखो में वो गड़ने लगा
सुख मेरा जब घुटुरुवन चलने लगा |
दाँत काटी रोटियाँ सपना हुईं
हमसफर अपना हमें छलने लगा |
अब जयद्रथ, तय है, मारा जायेगा
दिन बचे सूरज यहाँ ढलने लगा |
10.
नीली-पीली रेखाओं के जाल हमारी आँखो में
देख सको तो देखो सूखे ताल हमारे आँखो में |
रोज़ी-रोटी के, कपड़े-लत्ते के जटिल सवाल लिये
बैठ गया है फिर आकर बैताल हमारी आँखो में |
नारों, वादों, सपनों, सूखे होठों की टकराहट से
आते रहते हैं अक्सर भूचाल हमारी आँखो में |
अबकी फसल हमारी होगी, अबकी खेत हमारा है
कहते-कहते बीत गया हर साल हमारी आँखों में |
डायमंड होटल में होतीं प्रेमचंद पर बातें हैं
उजड़ी-उजड़ी लगती है चौपाल हमारी आँखो में |
सूखा, बाढ़, अकाल चंद लोगों के लिए खुशी के दिन
माफ़ी, राहतकोष, जाँच-पड़ताल हमारी आँखो में |
11
मौसम से उम्मीदें करते गये, वसंत नहीं आया
एक-एक कर सपने मरते गये, वसंत नहीं आया |
गाँछ हो गयी ठूँठ, जड़ें बेचैन, टहनियाँ मौन हुईं
धीरे-धीरे पत्ते झरते गये, वसंत नहीं आया |
काड़ा-छाड़ा, हँसुली-पेटी, बाली, टीका, नकबेसर
मज़बूरी के नाम उतरते गये, वसंत नहीं आया |
पीपल की चितकबरी छाया में जैसे ही आँख लगी
जीवन के सौ चित्र उभरते गये, वसंत नहीं आया |
जैसे-तैसे गाड़ी चलती जाती है अपनी लेकिन
सुख के दृश्यविधान बिखरते गये, वसंत नहीं आया |
12.
देश-दुनिया से कट रहे हैं लोग
और ख़ुद में सिमट रहे हैं लोग |
इतने मज़हब हैं जोड़ने वाले
और तेज़ी से बँट रहे हैं लोग |
रेत को जल समझके दौड़े हैं
जल से अब दूर हट रहे हैं लोग |
13.
सीधा-सच्चा जीवन है
फिर भी कितनी उलझन है !
फैली रेत उमंगों पर
कहते रहिए सावन है |
लोग सँवर लें जितना भी
हँसता रहता दरपन है |
समय देखता रहता है
उसकी बाँकी चितवन है |
14 .
तिनका-तिनका जुटाके लाती रही
ज़िन्दगी घोंसला बनाती रही |
पाँव मेरे फिसल गए होते
मेरी कविता मुझे बचाती रही ।
झिलमिलाती-सी एक लौ है यह
आँधियों को सबक सिखाती रही |
15.
फूल, पत्ते, रंग, ख़ुशबू सब चुराकर ले गया।
अजब झोंका था, मेरी नींदें उड़ाकर ले गया !
मुझको अपना कहके उसने, मेरा तेवर ले लिया
मेरी आँखों से मेरे सपने उठाकर ले गया।
मेरी चिंताओं का कोई हल निकलता ही नहीं
कौन मेरे रास्ते मुझसे हटाकर ले गया !
16.
छू ले तो बना देगा तुम्हें पत्थरों कड़ा
अपना कबीर हादसों से पर्वतों बड़ा।
जब कोई बग़ावत की इमारत बनाएगा
अपना कबीर होगा, कहीं नींव में गड़ा।
पोथी से, पुजारी से, भजन से, अजान से
अपना कबीर रूढ़ियों से टूटकर लड़ा।
घर फूँका है, तापा है, झुलसा है, गिरा है
अपना कबीर हाथ लुकाठी लिए खड़ा।
17.
जब शिलालेखों पर अंकित शब्द दुहराए गए,
मेरी आँखों में उजालों के भरम आए-गए ।
सोने की चिड़िया था भारत देश, पर इस देश में,
लोग गोबर में से गेहूं बीनते पाए गए ।
पिछले जन्मों के करम से ज़िंदगी को जोड़कर,
जो दलित हैं वो अधम की कोटि में लाए गए ।
घास की रोटी हमारे हाथ पर आकर गिरी,
छत्र -चाँवर, मुकुट -चेतक महल ले जाए गए ।
18.
टहनी - टहनी दर्द बिछा है, पत्ते-पत्ते अफसाने,
तड़प रहा है कल्पवृक्ष, मैं खड़ा हुआ हूँ सिरहाने ।
19.
लोहा हूँ हथौड़े की चोट खा रहा हूँ मैं,
शोलों में तपके लाल हुआ जा रहा हूँ मैं।
मेरा भविष्य हादसों के पार जाएगा,
हाँ, वर्तमान आँधियों में पा रहा हूँ मैं ।
मैं बिजलियों की आँख का तारा हूँ दोस्तो!
अंधी गुफा में जलती ग़ज़ल गा रहा हूँ मैं ।
20.
बहुत करोगे तो गमलों में सजा लोगे मुझे,
जानता हूँ कि किसी और को सौंपोगे मुझे ।
आँधियों के खिलाफ़ जिन्हें रोप जाऊँगा,
मील के पत्थरों को देखोगे, सोचोगे मुझे ।
21.
क्या सरकार के पास हमारे इस सवाल का उत्तर है,
नाक बेचकर नथुनी लेना किस हिसाब से बेहतर है ?
कोर्ट -कचहरी, थाना-ऑफिस, साहेब-बाबू, मंत्रीजी,
लोकतंत्र के वध में देखो शामिल पूरा लश्कर है ।
22.
दलितों को अब और दबाया जाना बहुत बुरा होगा,
एक हाथ में संविधान है, एक हाथ में पत्थर है ।
23.
सिर झुकाए आदमी को सामने लाया गया,
इस तरह मुझको मेरा कर्तव्य समझाया गया ।
जिनके अपने पाँव थे, वे दौड़ से बाहर हुए,
और फिर बैसाखियों को ताज पहनाया गया ।
आम जनता अपनी रोजी-रोटी में बेचैन थी,
राष्ट्र का ध्वज जेल के हाते में फहराया गया ।
24.
गर हो सके तो अब कोई शम्मा जलाइए,
इस दौरे सियासत का अँधेरा मिटाइए ।
बस हो चुका आकाश में नारे उछालना,
ये जंग है, इस जंग में ताकत लगाइए ।
25.
मुल्क के मसीहाओ, तुम तो जानते होगे,
हम जो सिर उठाए हैं, तख्त डगमगाए हैं ।
26.
ये वक्त बोलने का नहीं, तेज होड़ लो,
लोहा गरम है, चोट करो और मोड़ लो ।
जिस पेड़ में रोटी के फूल दीख रहे हैं,
उस पर किसी तरह से चढ़ो और तोड़ लो ।
रस्सी नहीं है रोशनी कि गाँठ पड़ेगी,
फिर आओ, चलो खुद को उजाले से जोड़ लो।
27.
सुबह आई है नए परचम उठाकर देखिए,
धूप उम्मीदों में कब होती है जाकर देखिए।
लोग अच्छे दिन के वादे पर निछावर हो गए,
आए अच्छे दिन, मगर किनके, पताकर देखिए।
टूट जाएंगे भरम रंगों के या रेखाओं के,
नींद से बाहर कोई सपना जगाकर देखिए।
28.
हाथ कुछ तो आएगा, वो हार हो या जीत हो,
ज़िंदगी की आँख से आँखें मिलाकर देखिए।
29.
नियान रोशनी की गोद में दीवाली है,
खुली जो आँख तो देखा कि रात काली है।
इसी उधेड़बुन में है थकी हुई धनिया,
कहाँ से होरी ने आँखों में गाय पाली है ।
30.
यही गुनाह बार-बार कर रहा हूँ मैं,
कि उनकी सारी हदें पार कर रहा हूँ मैं।
उखाड़ फेंकना आसान तो नहीं लेकिन,
हवा को,लहर को तैयार कर रहा हूँ मैं।
जो गिर पड़े हैं उन्हें
शब्द सहारा देंगे,
ग़ज़ल की सोच का विस्तार कर रहा हूँ मैं।
-- शिव कुमार पराग
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सम्पर्क :शिव कुमार पराग
SA 5/140, S-10, संजय नगर,अकथा, पहड़िया, वाराणसी- 221007 (उ०प्र०).मो० : 9415694361 : 8176064173 e-mail:shivkumarparag@gmail.com
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शानदार और वस्तुपरक विश्लेषण। आप ग़ज़ल पर जिस तरह लिख रहे हैं, उसके आधार पर कहा जा सकता है कि इस विधा को अपना आलोचक मिल गया है। हार्दिक शुभकामनाएं।
जवाब देंहटाएंइस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.
हटाएंधन्यवाद कौशल किशोर जी।
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