कथाकार ज्ञानरंजन जी का जाना

Sushil Kumar
1

हिंदी कहानी के वरिष्ठ कथाकार ज्ञानरंजन जी के निधन का समाचार अत्यंत शोकाकुल कर देने वाला है। नब्बे वर्ष की आयु में आज सुबह उनका जाना हिंदी साहित्य की एक सजग, विचारशील और नैतिक रूप से दृढ़ परंपरा का अवसान है। ज्ञानरंजन जी उन कथाकारों में रहे जिन्होंने कहानी को समय के दबावों से जूझते मनुष्य की गहरी पहचान बनाई।

इस संदर्भ में ज्ञानरंजन जी की प्रमुख कहानियों में ‘फेंस के इधर और उधर’, ‘पिता’, ‘क्षणजीवी’, ‘एक अनकही’, ‘आत्मकथा’ और ‘संक्रमण’ विशेष रूप से स्मरणीय हैं। इन रचनाओं में कथावस्तु किसी असाधारण घटना से जन्म नहीं लेती, जीवन की साधारण स्थितियों में छिपे तनावों और नैतिक द्वंद्वों से आकार ग्रहण करती है। उनके पात्र मुखरता से अधिक मौन में अपनी पीड़ा और उलझन व्यक्त करते हैं।कहानी-शिल्प के स्तर पर ज्ञानरंजन जी का लेखन अत्यंत संयत और सधा हुआ है। वे भाषा को अनावश्यक अलंकरण से दूर रखते हैं। कथन में संकेतात्मकता, संरचना में कसाव और अंत में खुलापन उनकी कहानियों की प्रमुख विशेषताएँ हैं। उनकी रचनाएँ किसी निष्कर्ष को थोपने के स्थान पर पाठक को विचार की प्रक्रिया में सम्मिलित करती हैं।

कथावस्तु के स्तर पर ज्ञानरंजन जी आधुनिक मध्यवर्ग के नैतिक संकट, पारिवारिक संबंधों की जटिलता, व्यक्ति और व्यवस्था के बीच की मूक टकराहट तथा समय के दबाव में बदलते मनुष्य की संवेदनाओं को गहराई से दर्ज करते हैं। उनकी दृष्टि आलोचनात्मक रही, पर उसमें संतुलन और मानवीय विवेक निरंतर बना रहा।

संपादक के रूप में ‘पहल पत्रिका’ के प्लेटफार्म पर ज्ञानरंजन जी ने हिंदी साहित्य को गंभीर और वैचारिक रूप से सजग रचनाओं का मंच दिया एवं कई लेखको और कथाकारों को जन्म दिया। यह पत्रिका किसी प्रवृत्ति या गुट की पहचान न बनकर साहित्यिक विवेक और बौद्धिक ईमानदारी का पर्याय रही। उनका संपादन रचना को उसके स्वाभाविक स्वर और गरिमा के साथ प्रस्तुत करता रहा।

आज ज्ञानरंजन जी का जाना हिंदी कथा-साहित्य में एक गहरी रिक्ति छोड़ गया है। उनकी कहानियाँ आगे भी यह स्मरण कराती रहेंगी कि साहित्य शोर नहीं करता, वह चुपचाप मनुष्य और समय के बीच संवाद रचता है।

ज्ञानरंजन जी को भावभीनी श्रद्धांजलि।●


एक टिप्पणी भेजें

1 टिप्पणियाँ

टिप्पणी-प्रकोष्ठ में आपका स्वागत है! रचनाओं पर आपकी गंभीर और समालोचनात्मक टिप्पणियाँ मुझे बेहतर कार्य करने की प्रेरणा देती हैं। अत: कृप्या बेबाक़ी से अपनी राय रखें...

एक टिप्पणी भेजें