
हिंद युग्म से प्रकाशित पुस्तक ‘बाँसलोई में बहत्तर ऋतु’ समकालीन कविता में पर्यावरण को केंद्रीय कथ्य के रूप में प्रतिष्ठित करने वाली एक विशिष्ट कृति है। इस पुस्तक के प्रथम खंड में केदारनाथ सिंह, कुँवर नारायण, मंगलेश डबराल सहित साठ से अधिक समकालीन कवियों की रचनाओं के आलोक में पर्यावरण-संचेतना को सूक्ष्मता से समझने का प्रयास किया गया है। द्वितीय खंड में कवि-लेखक सुशील कुमार की चौंसठ पर्यावरण-निबद्ध कविताएँ चार सर्गों: पहाड़, जंगल, नदी और तराई में संयोजित हैं। ये कविताएँ प्रकृति की पीड़ा, उसके दुर्द्धर्ष संघर्ष और आशा का एक सुदीर्घ आख्यान रचती हैं तथा समकालीन कविता में पर्यावरण और पारिस्थितिक विमर्श का एक नया आयाम खोलती हैं, जहाँ कटते जंगल, सूखती नदियाँ और टूटते पहाड़ की करुण, आत्मीय गाथा मौजूद है। यह हिंदी साहित्य में पर्यावरण विषयक रचना-दृष्टि की एक अनूठी पहल है।
यह पर्यावरण साहित्य के पाठकों, शोधार्थियों और चिंतकों के लिए एक बहुपयोगी और प्रासंगिक कृति है। में बहत्तर ऋतु’ समकालीन कविता में पर्यावरण को केंद्रीय कथ्य के रूप में प्रतिष्ठित करने वाली एक विशिष्ट कृति है। इस पुस्तक के प्रथम खंड में केदारनाथ सिंह, कुँवर नारायण, मंगलेश डबराल सहित साठ से अधिक समकालीन कवियों की रचनाओं के आलोक में पर्यावरण-संचेतना को सूक्ष्मता से समझने का प्रयास किया गया है। द्वितीय खंड में कवि-लेखक सुशील कुमार की चौंसठ पर्यावरण-निबद्ध कविताएँ चार सर्गों: पहाड़, जंगल, नदी और तराई में संयोजित हैं। ये कविताएँ प्रकृति की पीड़ा, उसके दुर्द्धर्ष संघर्ष और आशा का एक सुदीर्घ आख्यान रचती हैं तथा समकालीन कविता में पर्यावरण और पारिस्थितिक विमर्श का एक नया आयाम खोलती हैं, जहाँ कटते जंगल, सूखती नदियाँ और टूटते पहाड़ की करुण, आत्मीय गाथा मौजूद है। यह हिंदी साहित्य में पर्यावरण विषयक रचना-दृष्टि की एक अनूठी पहल है।
यह पर्यावरण साहित्य के पाठकों, शोधार्थियों और चिंतकों के लिए एक बहुपयोगी और प्रासंगिक कृति है। में बहत्तर ऋतु’ समकालीन कविता में पर्यावरण को केंद्रीय कथ्य के रूप में प्रतिष्ठित करने वाली एक विशिष्ट कृति है। इस पुस्तक के प्रथम खंड में केदारनाथ सिंह, कुँवर नारायण, मंगलेश डबराल सहित साठ से अधिक समकालीन कवियों की रचनाओं के आलोक में पर्यावरण-संचेतना को सूक्ष्मता से समझने का प्रयास किया गया है। द्वितीय खंड में कवि-लेखक सुशील कुमार की चौंसठ पर्यावरण-निबद्ध कविताएँ चार सर्गों: पहाड़, जंगल, नदी और तराई में संयोजित हैं। ये कविताएँ प्रकृति की पीड़ा, उसके दुर्द्धर्ष संघर्ष और आशा का एक सुदीर्घ आख्यान रचती हैं तथा समकालीन कविता में पर्यावरण और पारिस्थितिक विमर्श का एक नया आयाम खोलती हैं, जहाँ कटते जंगल, सूखती नदियाँ और टूटते पहाड़ की करुण, आत्मीय गाथा मौजूद है। यह हिंदी साहित्य में पर्यावरण विषयक रचना-दृष्टि की एक अनूठी पहल है।
यह पर्यावरण साहित्य के पाठकों, शोधार्थियों और चिंतकों के लिए एक बहुपयोगी और प्रासंगिक कृति है।
यह पर्यावरण साहित्य के पाठकों, शोधार्थियों और चिंतकों के लिए एक बहुपयोगी और प्रासंगिक कृति है। में बहत्तर ऋतु’ समकालीन कविता में पर्यावरण को केंद्रीय कथ्य के रूप में प्रतिष्ठित करने वाली एक विशिष्ट कृति है। इस पुस्तक के प्रथम खंड में केदारनाथ सिंह, कुँवर नारायण, मंगलेश डबराल सहित साठ से अधिक समकालीन कवियों की रचनाओं के आलोक में पर्यावरण-संचेतना को सूक्ष्मता से समझने का प्रयास किया गया है। द्वितीय खंड में कवि-लेखक सुशील कुमार की चौंसठ पर्यावरण-निबद्ध कविताएँ चार सर्गों: पहाड़, जंगल, नदी और तराई में संयोजित हैं। ये कविताएँ प्रकृति की पीड़ा, उसके दुर्द्धर्ष संघर्ष और आशा का एक सुदीर्घ आख्यान रचती हैं तथा समकालीन कविता में पर्यावरण और पारिस्थितिक विमर्श का एक नया आयाम खोलती हैं, जहाँ कटते जंगल, सूखती नदियाँ और टूटते पहाड़ की करुण, आत्मीय गाथा मौजूद है। यह हिंदी साहित्य में पर्यावरण विषयक रचना-दृष्टि की एक अनूठी पहल है।
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