पानी भीतर पनसोखा



‘पानी भीतर पनसोखा’ सुशील कुमार का पाँचवाँ कविता-संग्रह है। यह संग्रह समकालीन हिंदी कविता में जनपद, जीवन और संघर्ष की एक सघन और अर्थवान उपस्थिति दर्ज करता है। सुशील कुमार की कविता जीवन-मूल्यों से निर्मित है और समय व समाज के यथार्थ से गहरे जुड़ाव के साथ पाठक से संवाद करती है।


इस संग्रह का शीर्षक गहरे प्रतीकात्मक अर्थों को समेटे है। ‘पानी’ जीवन और जनता का संकेत है, जबकि ‘पनसोखा’ सत्ता, शोषण और संसाधनों के दोहन का रूपक बनता है। यह शीर्षक हमारे वर्तमान समाज की उस विडंबनापूर्ण स्थिति को रेखांकित करता है जहाँ जीवन के स्रोत सूखते जा रहे हैं और उन्हीं स्रोतों से वैभव और सत्ता रची जा रही है। नदी, जंगल, पहाड़, झील और आदिवासी समाज इस कविता-संसार के केन्द्रीय बिम्ब हैं।


सुशील कुमार की कविताओं में निजी अनुभव और सामाजिक यथार्थ एक-दूसरे में इस तरह घुलते हैं कि कविता मार्मिक प्रभाव छोड़ती है। ये कविताएँ अदृश्य को दृश्य बनाती हैं और दृश्य के भीतर छिपे संघर्ष, विडंबना और असमानता को सामने लाती हैं। सत्ता-संरचना, पूँजी और तथाकथित विकास के नाम पर हो रहे विनाश को ये रचनाएँ संवेदनशीलता और विवेक के साथ उजागर करती हैं।


इस संग्रह में श्रमशील समाज का जीवन, उसकी पीड़ा, उसका सौंदर्य और उसकी जद्दोजहद प्रमुख रूप से उपस्थित है। आदिवासी समाज का विस्थापन, जल-जंगल-जमीन की लूट, प्रवासी मजदूरों की त्रासदी और महामारी के समय का मानवीय अनुभव इन कविताओं में दर्ज है। कविता यहाँ केवल यथार्थ का बयान नहीं, बल्कि मनुष्य और धरती के पक्ष में खड़े होने की चेतना है।


प्रेम, प्रतिबद्धता और प्रतिरोध—इन तीनों से मिलकर सुशील कुमार की कविता की दुनिया आकार लेती है। ‘पानी भीतर पनसोखा’ कठिन समय में कविता के माध्यम से जीवन और मनुष्यता को बचाने का एक सशक्त सांस्कृतिक हस्तक्षेप है।

कौशल किशोर, लखनऊ ( पुस्तक के आमुख से)